आतंकवाद का फैलाव

उत्तरप्रदेश में आखिरी चरण के मतदान के एक दिन पहले राजधानी लखनऊ में संदिग्ध आतंकी के साथ घंटों चली मुठभेड़ एक गंभीर घटना है। ...

देशबन्धु
आतंकवाद का फैलाव
देशबन्धु

उत्तरप्रदेश में आखिरी चरण के मतदान के एक दिन पहले राजधानी लखनऊ में संदिग्ध आतंकी के साथ घंटों चली मुठभेड़ एक गंभीर घटना है। मंगलवार सुबह मध्यप्रदेश में भोपाल-उज्जैन पैसेंजर ट्रेन में धमाका हुआ, जिसमें 10 लोग घायल हुए और रात तक यह खबर आई कि इस घटना के तार आईएस से जुड़े हैं और उसका एक आतंकवादी लखनऊ के ठाकुरगंज के एक मकान में छिपा है। मकान को चारों ओर से घेरकर पुलिस यह कोशिश करती रही कि किसी तरह उस आतंकी को जिंदा पकड़ सके, लेकिन अंतत: उसकी लाश ही हाथ लगी। पुलिस को पहले संदेह था कि दो आतंकी मकान में छिपे हैं, लेकिन एक व्यक्ति का ही शव बरामद हुआ है। मप्र ट्रेन धमाके के सिलसिले में मप्र के पिपरिया और उप्र में कानपुर व इटावा से भी गिरफ्तारियां हुई हैं। पुलिस के मुताबिक इस घटना के पीछे आईएस के खुरसान माड्यूल का हाथ है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान में सक्रिय इस माड्यूल का गठन तहरीक ए तालिबान के बड़े हिस्से ने किया है, ये बांग्लादेश में भी आतंकियों को तैयार करता है। भारत में आईएसआईएस से जुड़े आतंकी बांग्लादेश जाकर इस समूह से जुड़ते हैं या फिर ये आतंकी इन्हें ऑनलाइन ट्रेनिंग देकर भारत में हमलों की साजिश करते हैं। मप्र ट्रेन धमाके की जांच में लगी एजेंसियों को पता चला कि ये आईएसआईएस की ओर से बड़े हमले के लिए एक ट्रायल था और फिर इसी दिशा में जांच आगे बढ़ाई गई तो तीन आतंकी पकड़े गए और उनसे पूछताछ के आधार पर उप्र में कई जगह छापेमारी की गई। लखनऊ में मारे गए संदिग्ध आतंकी सैफुल्ला तक भी पुलिस इसी सूचना के आधार पर पहुंची। मप्र और उप्र के अलावा तेलंगाना और केरल से भी इस घटना के तार जुड़े हैं। तेलंगाना पुलिस 2011 से भारत में आईएस की संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रख रही है और अपनी सूचनाएं अन्य राज्यों से साथ साझा करती रही है। केरल पुलिस भी अपने यहां के युवाओं के आईएस में शामिल होने के मामले की जांच में लगी हुई है। इन राज्यों से ही मप्र और उप्र में खुरसान माड्यूल की जानकारी मिली और संदिग्ध लोगों पर नजर रखकर, उनकी आनलाइन गतिविधियों की जांच कर सैफुल्ला तक पुलिस पहुंच पाई। सैफुल्ला के शव के पास से आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) और पुलिस को 8 पिस्तौल, 650 राउंड गोलियां, विस्फोटक, सोना, कैश, पासपोर्ट, सिम कार्ड्स और ट्रेनों के टाइम टेबल मिले हैं। ऐसा संदेह है कि आईएस भारत में किसी बड़ी घटना को अंजाम देने की फिराक में था। एटीएस के मुताबिक उन्होंने सैफुल्ला को जिंदा पकडऩे की कोशिश की थी, ताकि उससे जानकारियां हासिल की जा सकेें, लेकिन ऐसा नहींहो पाया। यह पूरा घटनाक्रम किसी फिल्मी पटकथा की तरह लगता है, लेकिन आतंकवाद हमारे समय की एक कड़वी और भयावह सच्चाई है, इससे इंकार नहींकिया जा सकता। एटीएस और तमाम राज्यों की पुलिस ने खुफिया जानकारियां साझा कर जिस तरह कार्य किया है, उसके लिए वे बधाई के पात्र हैं। लेकिन अभी कई सवाल हैं, जिनके जवाब तलाशने होंगे।
उत्तरप्रदेश में चुनावों के वक्त राजधानी में एक आतंकी इतने सारे हथियारों के साथ किस तरह रह रहा था? क्या सुरक्षा व्यवस्था में कोई बड़ी चूक थी, जिसका लाभ उसने उठाया? क्या सैफुल्ला की तरह कुछ और लोग भी होंगे, जिनके बारे में अभी पता नहींहै, या जानकारी होने के बावजूद उन पर कार्रवाई के लिए सही मौके का इंतजार किया जा रहा है?आतंकियों ने कम तीव्रता का धमाका ही क्यों किया और इसके लिए भोपाल-उज्जैन पैसेंजर को ही क्यों चुना? मप्र में विगत माह ही आईएसआई के कुछ संदिग्धों की गिरफ्तारी हुई थी, उन पर आरोप है कि वे सेना की गुप्त सूचनाएं पाकिस्तान पहुंचा रहे थे। मप्र में आतंकवाद से जुड़े विभिन्न संगठन आखिर किस तरह पैर पसार रहे हैं? पिछले साल ही मप्र में सिमी के आठ लोगों को जेल तोडऩे के अपराध में मुठभेड़ में मार दिया गया था। यह सारा घटनाक्रम भी ऐसी ही तेजी के साथ हुआ था, जैसा अभी हुआ है। आतंकी घटनाओं में ऐसा कम ही होता है कि सुबह घटना हुई हो और शाम तक आरोपी पकड़ में आ जाएं। पर अब ऐसा हो रहा है तो इसके लिए हमारी सुरक्षा एजेंसियों की प्रशंसा होनी चाहिए। लेकिन इस बात का विशेष ध्यान रखने की जरूरत है कि आतंकवाद में संलिप्तता के संदेह में किसी को धर्म या जाति के आधार पर प्रताडि़त न किया जाए। फर्जी मुठभेड़ों के कई दुखद प्रकरण देश ने देखे हैं और निरपराधों को सालोंसाल अकारण जेल में रखने के मामले भी सामने आए हैं। इन घटनाओं से जांच एजेंसियों, पुलिस की साख पर सवाल उठते हैं और उसके जायज काम भी संदेह की दृष्टि से देखे जाते हैं। आतंक की दुनिया में गुमराह कर युवकों को धकेले जाने से रोकना और आतंकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने की दोहरी चुनौती पुलिस पर है।


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