टू जी स्पेक्ट्रम पर यूपीए की जीत

यूं होता तो क्या होता, कुछ इसी तर्ज पर खड़ा हुआ था 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला, जिसे कई पत्रकार चीख-चीख कर देश का सबसे बड़ा घोटाला बताते रहे...

देशबन्धु
टू जी स्पेक्ट्रम पर यूपीए की जीत
2G spectrum scam
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यूं होता तो क्या होता, कुछ इसी तर्ज पर खड़ा हुआ था 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला, जिसे कई पत्रकार चीख-चीख कर देश का सबसे बड़ा घोटाला बताते रहे। 2010 में तत्कालीन यूपीए सरकार के खिलाफ लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोप का असर 2014 में देखने मिला, जब भ्रष्टाचार विरोध के नाम पर भाजपा सत्ता पर काबिज हुई।

लेकिन आज इस मामले पर सीबीआई की विशेष अदालत ने पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा और डीएमके सांसद कनिमोझी सहित सभी आरोपियों को सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा दायर दोनों मामलों में बरी कर दिया है। अदालत का कहना है कि सीबीआई आरोप साबित करने में नाकाम रही है। अब सवाल यह है कि जब आरोप साबित ही नहीं हुए, तो दूरसंचार में नीलामी से जुड़े इस मामले को महाघोटाला कैसे बना दिया गया। दरअसल 2008 में दूरसंचार विभाग द्वारा 2जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस आबंटन का कार्य शुरू किया गया था। 2010 में भारत के महालेखाकार और नियंत्रक विनोद राय की रिपोर्ट में कहा गया कि इस आबंटन में कथित तौर पर अनियमितता हुई है।

2जी स्पेक्ट्रम आबंटन में कंपनियों को नीलामी की बजाए पहले आओ और पहले पाओ की नीति पर लाइसेंस दिए गए थे, जिसमें  कैग के अनुसार सरकारी खजाने को अनुमानित एक लाख 76 हजार करोड़ रुपयों का नुक सान हुआ था। हालांकि सीबीआई ने जो आरोप दाखिल किया था उसमें लगभग 30 हज़ार करोड़ के नुकसान की बात कही थी। आरोप था कि अगर लाइसेंस नीलामी के आधार पर दिए जाते तो खज़ाने को कम से कम एक लाख 76 हज़ार करोड़ रुपए और हासिल हो सकते थे। मतलब साफ है कि कैग के आरोप इसी तरह के थे, कि ये होता तो ये हो सकता था। अब सवाल उठता है कि देश में इतने बड़े आरोप महज अनुमान के आधार पर कैसे लगाए गए और किस तरह इसे सबसे बड़ा घोटाला साबित करते हुए तत्कालीन सरकार के कई मंत्रियों और अफसरों को भ्रष्टाचारी बताया गया।

जानकारों का कहना है कि यह आरोप भ्रष्टाचार से ज्यादा राजनीति से जुड़ा था। इसमें अगर यूपीए सरकार के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर की साजिश भी हुई हो, तो आश्चर्य नहीं। सत्ता को हाथों में रखने के लिए पूंजीवादी ताकतें ऐसे खेल दुनिया भर में खेलती रही हैं। 


फिलहाल खबरें हैं कि इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालतों में अपील की जा सकती है। वहां आरोपियों पर क्या निर्णय आता है, यह देखने वाली बात होगी। अभी तो इस फैसले पर सत्ता और विपक्ष के बीच घमासान शुरु हो गया है। अपनी सरकार पर लगे इस दाग को रंगहीन बताए जाने पर पूर्व प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह खुश हैं, उन्होंने कहा कि कोर्ट के फैसले का सम्मान किया जाना चाहिए। मुझे खुशी है कि अदालत में यह बात साबित हो चुकी है कि यूपीए के खिलाफ जो प्रोपेगेंडा चलाया गया वह बिना किसी आधार के था।

ए.राजा और कनिमोझी भी फैसले से संतुष्ट हैं। लेकिन ऐसा लग रहा है कि भाजपा के लिए यह बड़ा झटका है, तभी वित्तमंत्री अरुण जेटली कह रहे हैं कि लाइसेंस आवंटन के लिए यूपीए सरकार का तरीका भ्रष्ट और बेईमानी भरा था, और 2012 में यह बात सुप्रीम कोर्ट में साबित हो चुकी है। उनका यह भी कहना है कि विपक्ष को इस फैसले को प्रमाणपत्र नहीं मानना चाहिए क्योंकि जीरो लॉस की थ्योरी पहले ही रद्द की जा चुकी है। श्री जेटली के इस बयान का अर्थ क्या यह लगाया जाए कि राजनैतिक लाभ लेने के लिए भाजपा अदालत के फैसले को भी खारिज कर सकती है। अगर अदालत के फैसले को प्रमाणपत्र न माना जाए, तो क्या उन पत्रकारों के फैसलों को स्वीकार किया जाए, जो चीखते हैं और चाहते हैं कि देश उनकी बात को ही अंतिम फैसला माने? 

विनोद राय इस अनुमानित भ्रष्टाचार को उजागर कर यूपीए विरोधियों के आंखों के तारे बन गए थे। कांग्रेस उनसे इस मुद्दे पर सफाई मांग रही है, जो स्वाभाविक है। जब सवाल उन्होंने खड़े किए थे, तो जवाब देने भी उन्हें सामने आना चाहिए।

आखिर में बात कांग्रेस की, जिसे गुजरात चुनाव में मिली हार का मलाल था, लेकिन अब यह फैसला बड़ी जीत की तरह ही सामने आया है। इसका असर तमिलनाडु की राजनीति में भी देखने मिलेगा, जहां द्रमुक उसकी सहयोगी है। 

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