मध्ययुग की ओर लौटाने वाला कानून

पूरी दुनिया में लड़कियों की स्थिति बेहतर करने के लिए, उनके शोषण को रोकने के लिए सरकारें बाल विवाह को रोकने के कानून बना रही हैं और सख्ती से उन पर अमल भी कर रही है,...

देशबन्धु
मध्ययुग की ओर लौटाने वाला कानून
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पूरी दुनिया में लड़कियों की स्थिति बेहतर करने के लिए, उनके शोषण को रोकने के लिए सरकारें बाल विवाह को रोकने के कानून बना रही हैं और सख्ती से उन पर अमल भी कर रही है, लेकिन बांग्लादेश ने अब ऐसा कानून बना दिया है, जो उसे लड़कियों के अधिकार और रक्षा के मामले में पीछे धकेल देगा। बीते सोमवार बांग्लादेश की संसद ने बाल विवाह से जुड़े कानून को मंजूरी दे दी। नए कानून में सामान्य तौर पर पुरुषों के लिए शादी की न्यूनतम आयु 21 और लड़कियों की 18 वर्ष ही रखी गई है। लेकिन लडक़ी के प्रेमी संग भाग जाने, दुष्कर्म या अवैध संबंधों के कारण संतान के जन्म लेने जैसी विशेष परिस्थितियों का हवाला देते हुए इसमें छूट दी गई है और इसका अर्थ यह है कि अभिभावकों की सहमति की शर्त पर 14 साल की लड़कियों के विवाह को कानूनी मंजूरी मिलेगी। इस नए कानून के खिलाफ मानवाधिकार संगठनों ने मंगलवार को प्रदर्शन किया। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि बाल विवाह की रोकथाम और महिलाओं-बच्चों के स्वास्थ्य के मामले में बांग्लादेश ने पिछले कुछ सालों में जो प्रगति की है, वह इस कानून से ध्वस्त हो जाएगी। चाइल्ड राइट्स एडवोकेसी ग्रुप के नूर खान ने कहा कि विशेष परिस्थितियों के मामले में शादी की कोई न्यूनतम आयु तय नहीं की गई है। इससे 14-15 साल की लड़कियों की शादियां आम हो जाएंगी। कम उम्र में शादी, शारीरिक शोषण पूरी दुनिया के बच्चों के लिए खतरा है, और इसलिए समय-समय पर इसके खिलाफ आवा•ा उठाई जाती रही है। यूनीसेफ ने भी इस संबंध में दिशा निर्देश जारी किए हैं। लेकिन कभी सामाजिक मान्यताओं की आड़ में, कभी आर्थिक परिस्थितियों की मजबूरी में तो कभी शारीरिक-मानसिक विकास का हवाला देकर बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड़ किया जाता रहा है। आज के बच्चे बेशक पहले की पीढिय़ों की तुलना में जल्दी परिपक्व हो रहे हैं, उन तक सूचनाएं भी अधिक तीव्र गति से पहुंच रही हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहींहै कि बाल विवाह की ओर लौटा जाए।
बांग्लादेश में बालविवाह पहले से एक गंभीर समस्या रही है। यूनीसेफ द्वारा 2016 में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक वहां15 साल से कम आयु में होने वाले विवाह 18 प्रतिशत हैं, जबकि 18 साल से कम आयु में होने वाले विवाह 51 प्रतिशत हैं। इधर पाकिस्तान में यह दर क्रमश: 3 और 21 प्रतिशत है, जबकि भारत में 15 साल से कम आयु में होने वाले विवाह 18 प्रतिशत और 18 साल से कम आयु में होने वाले विवाह 47 प्रतिशत हैं। बाल विवाह के मामले में विश्व में 11वां स्थान मलावी का आता है, जहां 15 और 18 की आयु से कम में होने वाले विवाह की दर क्रमश: 9 और 46 प्रतिशत है। लेकिन मलावी ने बच्चों के जीवन के साथ होने वाले इस खिलवाड़ को रोकने के लिए अपने संविधान से वह प्रावधान ही हटा लिया, जिसके तहत अबोध आयु के बच्चे अपने अभिभावकों की मर्जी से विवाह कर सकते थे। इस सख्ती से उसे बालविवाह की दर कम करने में मदद मिलेगी। लेकिन बांग्लादेश ने जो विपरीत कदम उठाया है, उसका उसे नुकसान झेलना पड़ेगा। 2005 में बालविवाह के मामले में बांग्लादेश का स्थान विश्व में चौथा था, जिसे बड़े प्रयासों के बाद 2016 में आठवें स्थान पर लाया गया। पर अब जिन विशेष परिस्थितियों का हवाला देते हुए विवाह का नया कानून बना है, उसमें लड़कियों की दुर्दशा के खतरे पहले से अधिक हो जाएंगे। जिस व्यक्ति ने दुष्कर्म किया है, उसके साथ विवाह करवाना लडक़ी को आजीवन सजा देने जैसा है। उसे जो मानसिक संताप होगा, इस बारे में संवेदनशीलता के साथ सोचने की जरूरत है। समाज में परिवार का सम्मान बनाए रखने के लिए लडक़ी के साथ ऐसा व्यवहार अनुचित होगा। इससे बलात्कार जैसी प्रवृत्ति को बल मिलेगा। बाल तस्करी, वेश्यावृत्ति आदि अपराधों में बढ़ोत्तरी की आशंका बनी रहेगी। विवाह अभिभावक की मर्जी से हो या लडक़ी की इच्छा से, 14 साल की आयु शारीरिक और मानसिक दोनों ही तौर पर विवाह के लिए सही नहींहै। इस कानून से दहेज आदि की मांग कम होने का भी हवाला दिया जा रहा है। पर यह विचारणीय है कि विवाह के वक्त दहेज न लेकर अगर लडक़ी को उसका पति बाद में प्रताडि़त करता है, उसे घर से निकालता है या दहेज लाने की धमकी देता है, तब उस लडक़ी का भविष्य क्या होगा? 14 साल में विवाह की मंजूरी से लडक़ी के पढऩे और आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनने की संभावनाएं भी खत्म होंगी। जिन विशेष परिस्थितियों का उल्लेख कर विवाह कानून में संशोधन किया गया है, बेहतर होता बांग्लादेश सरकार उन परिस्थितियों को सुधारने के प्रयास करती। दुष्कर्म, छेड़छाड़ जैसे अपराधों के खिलाफ सख्ती बरतती। मध्ययुग की ओर लौटाने वाले इस कानून पर बांग्लादेश को पुनर्विचार करना चाहिए।


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