आधार की गोपनीयता का सवाल

गोपनीय समझे जाने वाले आधार कार्ड की जानकारियां किस तरह 5 सौ रुपए में हासिल की जा सकती हैं...

देशबन्धु
आधार की गोपनीयता का सवाल
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गोपनीय समझे जाने वाले आधार कार्ड की जानकारियां किस तरह 5 सौ रुपए में हासिल की जा सकती हैं, इसका खुलासा करने वाली पत्रकार रचना खेरा पर यूनिक आईडेंटिफिकेशन अथारिटी आफ इंडिया यानी यूआईडीएआई ने एफआईआर दर्ज की है। रचना पर भारतीय दंड संहिता की धारा 419 (गलत पहचान दे कर धोखा देना), 420 (धोखाधड़ी), 468 (जालसाजा) और 471 (नकली दस्तावेज को सही बता कर इस्तेमाल करने) के तहत ए$फआईआर दर्ज की गई, इसके अलावा आधार अधिनियम की धारा 36/37 के तहत भी मामला दर्ज किया गया है।

एक पत्रकार की खोजी रिपोर्ट पर एफआईआर के इस कदम का व्यापक विरोध हुआ और इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बताया गया। अब इस बारे में यूआईडीएआई की सफाई आई है कि कुछ लोगों की तरफसे यह बात फैलाई जा रही है कि यूआईडीएआई ने एफआईआर दजर् कर मीडिया की स्वतंत्रता पर हमला किया है, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। यूआईडीएआई के प्रेस नोट में लिखा गया है, हम मीडिया की स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं, ट्रिब्यून की पत्रकार के खिलाफ हमारी तरफ से जो एफआईआर की गई है वह मीडिया पर हमला नहीं है। यूआईडीएआई का कहना है कि भले ही इस मामले में आधार से संबंधित जानकारियों में सेंध न लगाई गई हो, पर यूआईडीएआई हर आपराधिक मामले को काफी गंभीरता से लेता है. इस मामले में अनाधिकारिक सेंध लगाने की कोशिश के तहत आपराधिक प्रक्रिया शुरू की गई है। 

इधर रचना का मानना है कि एफआईआर दर्ज होने से मुझे कुछ हासिल हुआ है। उनका कहना है कि मुझे इस बात की खुशी है कि यूआईडीएआई ने मेरी रिपोर्ट पर एक्शन लिया, मुझे इस एफआईआर के बाद से कुछ उम्मीद जगी है। उन्होंने यह भी कहा, कि भारत सरकार अब इस संबंध में हर तरह से सेंध लगाने के मामलों की जांच करेगी और कड़े एक्शन लेगी। 

गौरतलब है कि चंडीगढ़ के अखबार दैनिक ट्रिब्यून में 4 जनवरी को रचना खेरा ने एक समाचार प्रकाशित किया था कि- 5 सौ रुपए, 10 मिनट और करोड़ों आधार कार्ड के विवरण आपकी पहुंच में हो सकते हैं। सुश्री खेरा ने लिखा कि नवंबर में यूआईडीएआई ने दावा किया था कि आधार डेटा पूरी तरह सुरक्षित और संरक्षित है और इसमें किसी तरह का लीक नहीं है। लेकिन अपनी खोजी पत्रकारिता के तहत रचना खेरा ने व्हाट्सऐप पर एक समूह से संपर्क किया, उसके एजेंट को पेटीएम के जरिए पांच सौ रूपए का भुगतान किया और दस मिनट के भीतर उन्हें एक लाग इन आईडी और पासवर्ड उपलब्ध हो गया, जिसके जरिए वे सौ करोड़ आधार कार्ड के विवरण खंगाल सकती थीं। इसमें यूआईडीएआई में दर्ज व्यक्तियों के नाम, पता, फोटो, ईमेल आदि के विस्तृत विवरण थे। इसके बाद द ट्रिब्यून की टीम ने 3 सौ रुपए का और भुगतान किया और उन्हें वह साफ्टवेयर भी उपलब्ध हो गया, जिसमें किसी व्यक्ति के आधार नंबर को लेकर उसका प्रिंट आउट निकाला जा सकता है। 


यह पूरी छानबीन किसी गंभीर घटना का संंकेत देती है। आधार कार्ड की गोपनीयता भंग होने और निजी जानकारी गलत हाथों में जाने की आशंकाएं इस परियोजना के प्रारंभ से जतलाई जा रही हैं। लेकिन इस पर सरकार हमेशा सुरक्षा का आश्वासन देती रही और इसके अनिवार्यता का दायरा बढ़ाती रही। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, कारोबार हर जगह आधार कार्ड को जरूरी बना दिया गया। देश और दुनिया में साइबर अपराध के नए-नए मामले रोज सामने आ रहे हैं, लेकिन पर्याप्त कानून और तकनीक न होने के कारण इन अपराधों से निपटना चुनौती बन गया है। पर सरकार है कि वह इस चुनौती को नजरंदाज कर रही है। इस मामले में भी रचना खेरा के खिलाफ तो मामला दर्ज किया गया है। लेकिन आधार डेटाबेस में किसी तरह की सेंध लगाए जाने की खबरों को यूआईडीएआई ने सिरे से खारिज कर दिया है और कहा है कि आधार कार्ड से जुड़ा बायोमेट्रिक डेटा पूरी तरह सुरक्षित है। प्राधिकरण का कहना है कि राज्य सरकार और कुछ $खास लोगों को नागरिकों की मदद करने के लिए डेटाबेस तक पहुंचा दी जाती है। रचना खेरा पर इस शिकायत निवारण सुविधा का दुरुपयोग करने का आरोप प्राधिकरण की ओर से लगाया गया है। फिलहाल पुलिस उस व्यक्ति को भी तलाश रही है जिसने आधार कार्ड से जुड़े पासवर्ड जारी किए। 

यह कहना कि पत्रकार रचना खेरा ने शिकायत निवारण सुविधा का दुरुपयोग किया, शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर घुसाने जैसा है। रचना खेरा ने तो यह साबित कर दिखाया कि आधार की गोपनीयता को भंग करना कितना आसान है। सरकार को उनकी रिपोर्ट पर और सावधान होने की जरूरत थी, लेकिन यहां तो उल्टा उन्हें ही मुलजिम बनाया जा रहा है। जो जानकारी एक पत्रकार ने हासिल कर ली, उस तक शातिर अपराधियों को पहुंचने में भला कितना वक्त लगेगा? और इससे वे कितने गंभीर अपराध कर सकते हैं? क्या ये सारी चिंताएं सरकार को नहीं होनी चाहिए। उसे शुक्रगुजार होना चाहिए ऐसे पत्रकारों का, जो समय-समय पर उसे उसकी कमजोरियों का अहसास कराते रहते हैं। लेकिन यहां तो सरकार मीडिया को ही कमजोर बनाने पर तुली हुई है।

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