थलाइवा की राजनीतिक एंट्री

आखिरकार रजनीकांत ने फिल्मों में आने की घोषणा कर ही दी...

देशबन्धु
थलाइवा की राजनीतिक एंट्री
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आखिरकार रजनीकांत ने फिल्मों में आने की घोषणा कर ही दी। इस सप्ताह के शुरु में ही उन्होंने कहा था कि अपने राजनीतिक जीवन के फैसले के बारे में 31 दिसम्बर को बताएंगे और तब से ही सुगबुगाहट शुरु हो गई थी कि वे राजनीति में आने की घोषणा कर सकते हैं। थलाइवा ने राजनीति में आने का ऐलान भी सुपरस्टार वाले अंदाज में ही किया है और कहा है कि वे नई राजनीतिक पार्टी बनाने के साथ-साथ अगले विधानसभा चुनावों में सभी 234 सीटों पर अपने उम्मीदवार भी उतारेंगे। तमिल दर्शकों के लिए भगवान बन चुके सुपरस्टार रजनीकांत की राजनीति में एंट्री सियासी बाक्स आफिस पर कितनी हिट होती है और कितनी सीटों का कलेक्शन पहले चुनाव में कर पाती है, इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना तय है कि रजनीकांत की राजनीतिक पारी तमिल राजनीति में नए आयाम जरूर जोड़ेगी। तमिल राजनीति और फिल्मों का पुराना नाता रहा है। एम जी रामचंद्रन, जे.जयललिता फिल्मों में हिट होने के बाद राजनीति में भी हिट हुए।

करुणानिधि भी तमिल फिल्मों के पटकथा लेखक रह चुके हैं। अब रजनीकांत का नाम भी इस सूची में शामिल हो गया है। जयललिता के निधन के बाद तमिल राजनीति में प्रभाव डालने वाले मेगास्टार की जगह खाली थी, शायद रजनीकांत उसे भर सकेें। हालांकि बीते कुछ समय से तमिल राजनीति काफी उतार-चढ़ावों से गुजर रही है। पहले द्रमुक और अन्नाद्रमुक यानी करुणानिधि और जयललिता के बीच एक को चुनने का विकल्प जनता के सामने रहता था, अन्य पार्टियां छोटे-मोटे किरदारों की तरह ही रहती थीं। लेकिन अब अन्नाद्रमुक में पन्नीरसेल्वम, पलानीसामी का एक गुट है, दूसरा गुट शशिकला का है। उनके गुट से दिनाकरण ने हाल में आर.के.नगर का उपचुनाव निर्दलीय के रूप में जीता और यह संकेत दिया कि अम्मा के बाद चिनम्मा को ही जनता पसंद करती है। उधर द्रमुक में भी कनिमोझी और ए.राजा को टू जी घोटाला मामले में राहत मिलने से उनके समर्थकों में उत्साह है। 

भाजपा लंबे समय से तमिलनाडु में प्रवेश के लिए दरवाजे ढूंढ रही है। माना जाता है कि पन्नीरसेल्वम और पलानीसामी को एक करने में भाजपा की बड़ी भूमिका रही है। अन्नाद्रमुक के अलावा भाजपा द्रमुक को मित्र बनाने की संभावनाएं भी तलाश रही है। नवंबर में प्रधानमंत्री ने चेन्नै दौरे के वक्त द्रमुक सुप्रीमो करुणानिधि से मुलाकात की ही थी। 1999 से 2004 तक बाजपेयी सरकार की सहयोगी रही द्रमुक अगर फिर भाजपा की साथी बनती है, तो कोई आश्चर्य नहींहोगा। बनते-बिगड़ते इन राजनीतिक समीकरणों के बीच अब रजनीकांत का एंगल तमिल राजनीति में कहां फिट बैठता है, यह देखना दिलचस्प होगा। वैसे रजनीकांत ने राजनीति में आने की औपचारिक घोषणा अभी की है, लेकिन तमिल राजनीति में उनका दखल काफी पहले से है। 1996 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने जयललिता के विरोध में बयान दिया था और तमिल मनीला कांग्रेस के जी.के.मूपनार का समर्थन किया तो उस बार द्रमुक और टीएमसी की सरकार बनी, जबकि जयललिता बुरी तरह हारी थीं।


2002 में कावेरी जल विवाद पर उन्होंने 9 घंटों का अनशन किया कि कर्नाटक सरकार सुप्रीम कोर्ट का आदेश माने। 2004 में अपनी बेटी ऐश्वर्या की शादी में उन्होंने जयललिता को न्यौता भेजा और वे शामिल भी हुईं। 2011 के विधानसभा चुनावों के वक्त वे करुणानिधि के साथ एक फिल्म की स्क्रीनिंग पर दिखे, लेकिन यह पता नहीं चला कि उनका साथ द्रमुक को मिला या अन्नाद्रमुक को। 2014 के आम चुनावों में नरेन्द्र मोदी ने रजनीकांत को अपना दोस्त बताया था, जबकि रजनीकांत ने खुद को मोदी का शुभचिंतक बताया था। तो इस तरह एक कुशल अभिनेता और नेता की तरह रजनीकांत सभी के साथ, जब जैसी जरूरत रही,े नजर आए। उनके बारे में जो चुटकुले चलते हैं, उसमें बताया जाता है कि वे कैसे असंभव बातों को चुटकी में संभव कर दिखाते हैं। सभी नावों पर पैर रखने का असंभव काम वे शायद सुपरस्टार होने के नाते संभव करते आए। लेकिन अब उन्हें एक ही नाव पर पैर टिकाकर रखना होगा। तभी वे अपनी पार्टी के तीन मंत्र- सत्य, कार्य और विकास को अमल में ला पाएंगे। 

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