आतंकवाद का धर्म

आतंकवाद को धर्म के चश्मे से देखने वालों के लिए दो खबरें हैं- पहली यह कि लखनऊ में पुलिस मुठभेड़ में मारे गए सैफुल्ला के शव को लेने से परिजनों ने इंकार कर दिया।...

आतंकवाद का धर्म
देशबन्धु

आतंकवाद को धर्म के चश्मे से देखने वालों के लिए दो खबरें हैं- पहली यह कि लखनऊ में पुलिस मुठभेड़ में मारे गए सैफुल्ला के शव को लेने से परिजनों ने इंकार कर दिया। उनका कहना है कि देश के खिलाफ काम करने वाले बेटे का शव उन्हें नहींचाहिए। दूसरी खबर यह कि अजमेर धमाके में आरोपी असीमानंद को अदालत ने बरी कर दिया है, हालांकि देवेन्द्र गुप्ता, भावेश पटेल और सुनील जोशी को दोषी करार दिया गया है। सुनील जोशी की मृत्यु हो चुकी है और साध्वी प्रज्ञा पर सुनील जोशी की हत्या का आरोप था, जिसमें अदालत ने उन्हें बरी कर दिया है। अगर आतंकवाद का कोई धर्म, कोई रंग, कोई रूप होता तो ये तमाम नाम यहां नहींलिखे होते। लेकिन राजनीति में फायदे के लिए, समाज को बांटने के लिए और धर्म की आड़ में स्वार्थ की दुकानदारी चलाने के लिए यही प्रचार किया जाता रहा है कि आतंकवाद का संबंध धर्म से होता है। ऐसा कहने वाले अपनी सुविधा के मुताबिक आतंकी घटनाओं की समीक्षा करते हैं। लेकिन ऐसा करते हुए वे भूल जाते हैं कि हर बार मरने वाला आम इंसान ही होता है। आतंकवाद चाहे जिस धर्म के नाम पर फैलाया जाए, अंतत: वह इंसानियत का ही खात्मा करता है। इसलिए सैफुल्ला के आतंकी होने पर यह विचार कतई नहीं पनपना चाहिए कि एक मुस्लिम युवक आतंकी निकला या असीमानंद के बरी होने पर यह नहींमानना चाहिए कि हिंदू अगर कट्टरपंथी हो, तब भी आतंकवादी नहींहो सकता। असीमानंद को छोडक़र जिन लोगों को दोषी माना गया है, वे भी हिंदू ही हैं और उन पर भी निर्दोषों की हत्या का इल्जाम है। हैदराबाद की मक्का मस्जिद और समझौता एक्सप्रेस धमाके में भी असीमामंद आरोपी है। समझौता एक्सप्रेस धमाके में 70 लोगों की जान गई थी। हालांकि अगस्त 2014 में इस मामले में असीमानंद को जमानत मिल गई थी। अभी भी जयपुर की विशेष अदालत ने असीमानंद समेत सात लोगों को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया है।
गौरतलब है कि साल 2011 में असीमानंद ने मजिस्ट्रेट को दिए इ$कबालिया बयान में कहा था कि अजमेर की दरगाह, हैदराबाद की मक्का मस्जिद और अन्य कई स्थानों पर हुए बम विस्फोटों में उनका और दूसरे हिंदू चरमपंथियों का हाथ था। बाद में वो अपने बयान से पलट गए और इसे एनआईए के दबाव में दिया गया बयान बताया था। साल 2014 में असीमानंद का नाम तब सुर्खियों में आया जब पत्रिका दि कारवां ने जेल में लिया गया उनका साक्षात्कार प्रकाशित किया। मैग्जीन का दावा था कि वर्तमान सरसंघ चालक मोहन भागवत समेत आरएसएस के पूरे शीर्ष नेतृत्व ने चरमपंथी हमले के लिए हरी झंडी दी थी। हालांकि असीमानंद ने इसका खंडन किया लेकिन पत्रिका ने उनके साक्षात्कार का ऑडियो टेप जारी किया था। बहरहाल, अब असीमानंद अदालत से बरी हो चुके हैं, लेकिन हिंदू कट्टरपंथ अब भी सवालों के घेरे में है। कुछ यही स्थिति इस्लामिक कट्टरपंथ की भी है। इस्लाम के नाम पर ही इस्लामिक स्टेट ने दुनिया भर में दहशतगर्दी का नया चलन शुरु किया है। लेकिन उसका शिकार अन्य धर्म के लोगों के साथ इस्लाम का शिद्दत और ईमानदारी से पालन करने वाले लोग भी होते हैं। इसलिए धर्म की सेवा का तर्क यहां सिरे से खारिज होता है। जहां तक हिंदुस्तान में आतंकवाद का प्रश्न है, तो यहां सैफुल्ला के पिता सरताज जैसे लोगों के उदाहरण से सीखने की जरूरत है। सैफुल्ला का आईएस से संबंध था या नहीं, अभी यह स्पष्ट नहींहै। उसने आतंकवाद की राह कब, क्यों और कैसे पकड़ी, यह भी अब उतना मायने नहींरखता। लेकिन उसकी मौत के बाद उसके घरवालों को जिस तरह के मानसिक और सामाजिक संताप से गुजरना पड़ेगा, यह बात मायने रखती है, विशेषकर तब, जबकि उसके पिता ने उसके देश के साथ गद्दारी करने के बाद उसके शव को लेने सी इंकार कर दिया है। एक समाज के नाते हमारी यह जिम्मेदारी होती है कि सैफुल्ला के परिजनों के साथ किसी भी तरह का पूर्वाग्रह नहींदिखाना चाहिए और न ही कोई भेदभावपूर्ण व्यवहार होना चाहिए।


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