राहुल गांधी की बहरीन यात्रा

दिल्ली में प्रथम प्रवासी सांसद सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी आदत के अनुसार कई मीठी-मीठी बातें कीं...

देशबन्धु
राहुल गांधी की बहरीन यात्रा
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दिल्ली में प्रथम प्रवासी सांसद सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी आदत के अनुसार कई मीठी-मीठी बातें कीं। प्रवासी भारतीयों का गुणगान किया कि वे ही सही मायनों में विदेशों में भारत के स्थायी दूत हैं। उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता भी जतलाई कि किस तरह आज भारतीय मूल के लोग मॉरीशस, पुर्तगाल और आयरलैंड में प्रधानमंत्री हैं। इसके अलावा पहले भी भारतीय मूल के लोग और भी बहुत से देशों में शासनाध्यक्ष और सरकार के मुखिया रह चुके हैं। हालांकि ऐसा कहते वक्त शायद वे यह याद नहीं रखना चाहते होंगे कि कैसे उनकी पार्टी के लोग भारत की बहू सोनिया गांधी का बार-बार विदेशी कहकर अपमान करते रहे हैं और भारतीय राजनीति में उनका दखल इन्हें कितना नागवार गुजरता है।

बहरहाल, मोदीजी ने इस सम्मेलन में अपनी तारीफ करने का मौका भी नहीं छोड़ा और कहा कि भारत में कारोबारी माहौल सुधरा है। आज वर्ल्ड बैंक, मूडीज जैसी संस्थाएं भारत की ओर देख रही हैं। उन्होंने कहा कि  21वीं सदी के भारत की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ट्रांसपोर्ट और इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ाया जा रहा है। रोजगार के नए अवसर बन रहे हैं। इन बातों में कितनी सच्चाई है, यह तो मोदीजी बखूबी जानते होंगे, वे सरकार के मुखिया जो हैं। उनकी ही सरकार के मंत्री संसद में बता चुके हैं कि बेरोजगारी कितनी बढ़ रही है। फिर इस तरह की भ्रामक बातें प्रधानमंत्री क्यों कह रहे हैं। अभी अपनी बहरीन यात्रा में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए रोजगार के अवसरों का जिक्र किया और सरकार के आंकड़ों के आधार पर बताया कि चीन हर 24 घंटे में 50 हजार रोजगार पैदा कर रहा है, जबकि भारत 400 नौकरियां ही पैदा कर रहा है।

मतलब जिस काम को चीन दो दिन में कर रहा है, उसे करने मे भारत को दो साल लग रहे हैं। राहुल गांधी ने यह भी कहा कि हर दिन 30 हजार युवा भारत के जॉब मार्केट में आ रहे हैं। नौकरी पैदा नहीं होने से लोगों में ग़ुस्सा है और इस महसूस भी किया जा रहा है। युवक सवाल पूछ रहे हैं कि उनके भविष्य का क्या होगा। जहां हमें नौकरी पैदा करने और विश्व स्तरीय शिक्षा की व्यवस्था करने पर काम करना चाहिए था वहां न$फरतें फैलाई जा रहीं हैं। अलग-अलग समुदायों के बीच खाई पैदा की जा रही है।

राहुल गांधी की इन बातों से असहमत होने का कोई कारण नजर नहींआता, क्योंकि बेरोजगारी के जो आंकड़े संसद में दिए जा रहे हैं, उसे झुठलाया नहींजा सकता। विभिन्न वर्गों के बीच तनाव बढ़ने की तस्वीर भी साफ-साफ देखी जा रही है। देश के कई विश्वविद्यालय, जो अब तक शिक्षा और शोध के लिए जाने जाते थे, अब असंतोष से उपजे आंदोलनों के कारण चर्चा में आ रहे हैं। समस्या यह है कि सरकार इस सच्चाई को जानबूझकर अनदेखा कर रही है और लोगों का ध्यान भटकाने के लिए नित नए प्रपंच रचे जा रहे हैं। देश में अगर बीते तीन सालों में खुशहाली आई रहती तो वह धरातल पर प्रकट भी होती। लेकिन अभी तो अधिकतर लोगों में तनाव, बेचैनी, गुस्सा ही नजर आ रहा है, जिसे राजनीतिक दल अपने-अपने तरीकों से भुनाने में लगे हैं। और इसका असर जल्द ही कर्नाटक, मध्यप्रदेश आदि विधानसभा चुनावों में देखने मिलेगा। 


कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए बहरीन को चुना तो इसके पीछे भी सियासी गुणाभाग नजर आता है। खाड़ी देशों में 30 लाख से ज्यादा भारतीय या भारतीय मूल के लोग रहते हैं, इनमें भी अधिकतर कर्नाटक या केरल से होते हैं। भारत के डिग्रीधारी बेरोजगार नौजवान अक्सर रोजगार की तलाश में खाड़ी देशों का रुख करते हैं। फिर चाहे यहां उन्हें कितनी भी कठिन परिस्थितियों में काम क्यों न करना पड़े। उनके बीच राहुल गांधी ने अपने भाषण मेंं रोजगार, शिक्षा और सेहत के लिए काम करने का जिक्र किया है तो इसे सियासी मुहिम से ही जोड़कर देखा जा रहा है।

खाड़ी देशों में भारतीय मुस्लिमों की भी बड़ी आबादी है, जो भारत में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे भेदभाव से निश्चित ही व्यथित होगी। राहुल गांधी का यह कहना कि मोदी सरकार लोगों को जाति एवं धर्म के आधार पर बांट रही है, वह इसी समुदाय को साधने की कोशिश नजर आती है। राहुल गांधी की बहरीन यात्रा का मकसद कितना सफल होता है, यह आने वाले चुनावों में नजर आ जाएगा। लेकिन भाजपा उनके इस दौरे से जितना बौखलाई है, उससे यह तो जाहिर है कि उन्होंने भाजपा की दुखती रग पर हाथ रख दिया है। 

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