नाम दे देने से आदर्श नहीं बन जाते गांव

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपनी कार्यशैली है। काम चाहे जैसा भी हो उन्हें नाम बनाना खूब आता है।...

देशबन्धु
नाम दे देने से आदर्श नहीं बन जाते गांव
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपनी कार्यशैली है। काम चाहे जैसा भी हो उन्हें नाम बनाना खूब आता है। उन्हें लगा कि अगर सांसद अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में गांवों को गोद लेकर उन्हें आदर्श गांव के रुप में विकसित करने का बीड़ा उठाएं तो यह ग्राम विकास की दिशा में एक नई पहल होगी। ऐसे गांवों के विकास में सांसद विकास निधि की राशि का इस्तेमाल किया जा सकता है। प्रधानमंत्री ने सांसद आदर्श ग्राम की परिकल्पना की और भाजपा शासित राज्यों ने इससे प्रभावित होकर विधायक आदर्श ग्राम की भी योजना बना ली। इन आदर्श ग्रामों की स्थिति में क्या परिवर्तन आया है, यह अलग बात हैं। सडक़ें आज भी वैसी हैं। पानी की समस्या बनी हुई है। बिजली भी कम ही रहती है। विपक्षी पार्टियों के विधायकों का कहना है कि उनके गोद लिए गांवों के विकास के प्रस्तावों को स्वीकृति नहीं मिल रही है।   इन गांवों के लिए विधायकों को अलग से कोई निधि नहीं दी गई है। सांसदों को क्षेत्रीय विकास निधि के रुप में सालाना 5 करोड़ और विधायकों को एक करोड़ मिलता है। इस एक करोड़ रूपए में से 25 लाख रूपए मंत्री की अनुशंसा पर खर्च किए जाते हैं। यह निधि काफी कम है क्योंकि उन्हें पूरे क्षेत्र के लोगों की अपेक्षाओं का ख्याल रखना होता है। सांसद आदर्श ग्राम के लिए राशि का अलग से कोई प्रावधान नहीं हैं। सरकार का ग्राम विकास पर विशेष जोर होता है। यदि वह संासद, विधायकों के प्रस्तावों को मंजूरी प्राथमिकता के आधार पर दे तो इन गांवों के विकास को गति मिल सकती है। एक आदर्श ग्राम सिर्फ नाम दे देने से आदर्श नहीं बन सकता, उसे आदर्श ग्राम के रुप में विकसित करने के लिए वहां की जरुरतों और स्थितियों के अनुसार विकास की योजना भी बनाई जानी चाहिए। आदर्श ग्राम कहे जा रहे गांव के लोगों में असंतोष कुछ ज्यादा है क्योंकि आदर्श ग्राम कह देने से उनकी अपेक्षाएं बढ़ गई हैं। यह स्थिति राजनैतिक दृष्टि से सक्रिय और प्रभावशाली नेताओं के निर्वाचन क्षेत्रों में भी है। जहां का राजनैतिक प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कमजोर है, वहां के आदर्श गांवों में विकास का कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हुआ। सूरजपुर जिले के उदयपुर ब्लाक के एक गांव बकोई को भी आदर्श गांव के रुप में विकसित करने के लिए गोद लिया गया है। यह गांव सडक़ संपर्क के मामले में पक्की सडक़ों से नहीं जुड़ पाया है। दूसरी बुनियादी सुविधाओं की स्थिति भी आम गांवों से तरह ही है। अगर इन गांवों को आदर्श गांव बनाना है तो इसके लिए सांसदों-विधायकों के लिए लक्ष्य तय कर देना चाहिए। इस लक्ष्य के साथ सरकार को भी यह जिम्मेदारी लेनी चाहिए कि ऐसे किसी आदर्श गांव की ग्रामसभा विकास के जो भी निर्णय लेती है, उस पर तत्काल काम शुरू कराया जाएगा। इससे एक जनप्रतिनिधि के रुप में सांसद-विधायक का मान बढ़ेगा और ग्राम विकास की नई अवधारणा को आगे बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।्र


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