राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति से उम्मीदें

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2015 को आखिरकार दो वर्ष बाद मंजूरी मिलना एक स्वागतेय कदम है। इस नीति के तहत जो उम्मीदें देशवासियों को बंधाई गई हैं, अगर वे फलीभूत होती हैं तो देश का स्वास्थ्य परिदृश्य ही बदल ...

देशबन्धु
राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति से उम्मीदें
देशबन्धु

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2015 को आखिरकार दो वर्ष बाद मंजूरी मिलना एक स्वागतेय कदम है। इस नीति के तहत जो उम्मीदें देशवासियों को बंधाई गई हैं, अगर वे फलीभूत होती हैं तो देश का स्वास्थ्य परिदृश्य ही बदल जाएगा। किंतु पूर्व में इसी तरह की अच्छी-अच्छी बातों वाली योजनाओं का जमीन पर जो हश्र हुआ है, उसमें आशंका होना स्वाभाविक है कि आखिर राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का कितना लाभ देशवासियों को मिल पाएगा। इस नीति के मुताबिक हर भारतवासी स्वास्थ्य लाभ का अधिकारी है। स्वास्थ्य पर अभी सकल घरेलू उत्पाद का महज 1.04 प्रतिशत खर्च होता है, जिसे बढ़ाकर 2.5 प्रतिशत करने का सरकार का इरादा है। सरकार का लक्ष्य है कि देश के 80 प्रतिशत लोगों का इलाज सरकारी अस्पताल में पूरी तरह मुफ्त हो, जिसमें दवा और जांच भी शामिल है। स्वास्थ्य नीति में सभी मरीजों को बीमा का लाभ देने का भी प्रावधान है। उन्हें निजी अस्पताल में भी इलाज करवाने की छूट मिलेगी। स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत निजी अस्पतालों को ऐसे इलाज के लिए तय रकम दी जाएगी। जिला अस्पताल और इससे ऊपर के अस्पतालों को सरकारी नियंत्रण से अलग किया जाएगा और इसे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप में शामिल किया जाएगा। देखने-सुनने में यह सब बहुत लुभावना लगता है कि अब गरीब, असहाय लोगों को इलाज के लिए दर-दर भटकना नहींपड़ेगा। अगर सरकारी अस्पताल में आराम से इलाज होगा तो मरीज निजी अस्पतालों की मनमानी क्यों सहेंगे? निजी अस्पतालों में भी गरीबों को इलाज की छूट मिलेगी तो क्या सचमुच अमीर-गरीब एक जैसी सुविधा पाएंगे? तब निजी अस्पतालों, क्लिीनिकों में रोग की तरह पसर गई कट प्रैक्टिस का क्या होगा, जिसमें बिना जरूरत डाक्टर तरह-तरह की जांच करवाते हैं, आपरेशन करते हैं और लंबे-चौड़े बिल ऐंठते हैं। इनमें दवा कंपनियों, जांच प्रयोगशालाओं, डाक्टरों, दलालों सबका हिस्सा निर्धारित रहता है। बीते कुछ बरसों में निजी क्षेत्र की बीमा कंपनियां स्वास्थ्य बीमा करने में काफी सक्रिय हुई हैं। बिना जरूरत व्यक्ति अपना और अपने परिवार का बीमा करवाता है, सालाना रकम भरता है, ताकि जब जरूरत हो तो उसे इलाज के लिए पैसे की तंगी न हो। इस व्यापार के बारे में सरकार क्या सोचती है? देश में सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा किसी से छिपी नहींहै।
यह विडंबना ही है कि एक ओर मेडीकल टूरिज्म में खूब बढ़ोत्तरी हुई है, दूसरी ओर सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों, नर्सों व सहायकों की कमी है, जिसके कारण वहां कार्यरत लोगों पर काम का अतिशय बोझ पड़ता है। विभिन्न सरकारी अस्पतालों में न जाने कितने बार जूनियर डाक्टर या नर्सें हड़ताल पर जाते हैं। बड़े शहरों में स्थिति खराब है तो छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में और दयनीय है। कितने ही स्वास्थ्य केेंद्रों या अस्पतालों में न डाक्टर नियुक्त हैं, न चिकित्सा उपकरण या अन्य सुविधाएं उपलब्ध हैं। निजी चिकित्सा संस्थानों में ऊंची कैपिटेशन फीस देकर डाक्टर बनने वाले निजी पै्रक्टिस कर अपने डाक्टर बनने की लागत वसूलना चाहते हैं। सरकारी संस्थानों से पढ़े डाक्टर भी सरकारी अस्पतालों की जगह निजी प्रैक्टिस को ही तवज्जो देते हंै, क्योंकि उसमें मुनाफा ज्यादा है। यह अकारण नहींहै कि इस समय देश में लगभग पांच लाख डॉक्टरों की कमी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार प्रति एक हजार आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए, लेकिन भारत में 1,674 लोगों पर एक डॉक्टर उपलब्ध है। ग्रामीण अंचलों और दुर्गम स्थानों में डाक्टरों की ऐसी कमी कितनी जानलेवा साबित होती है, इसका अंदाज उन खबरों से लगाया जा सकता है, जो हर साल बारिश, गरमी या सरदी के मौसम में आती हैं। कभी मलेरिया से लोग मरते हैं, कभी दिमागी बुखार से, कभी कुपोषण से, कभी निमोनिया से। मरने के अनेक कारण आम जनता के सामने हैं, जबकि स्वस्थ रूप से जिंदा रहने के विकल्प गिने-चुने हैं। जिस तरह शिक्षा वर्गभेद का शिकार है कि जिसके पास धन होगा, वह अच्छी शिक्षा का अधिकारी होगा और गरीब इसमें दया का पात्र रहेगा, वही स्थिति स्वास्थय के क्षेत्र में भी हो गई है। बड़ी आबादी स्वास्थ्य खर्च को वहन कर पाने में समर्थ नहीं है, ऐसे में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए सकारात्मक नीतिगत प्रयासों पर ही उसके स्वस्थ रहने की उम्मीदें टिकी हुई हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति से यह उम्मीद बढ़ी है और ऐसे में सरकार का यह दायित्व हो जाता है कि वह जनता को झूठी आशाओं पर जिंदा न रखे, बल्कि उन्हें सच कर बताए। स्वास्थ्य राज्य का विषय माना जाता है, जिसके कारण पिछड़े राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली नजर आती है। इस स्थिति को बदलने की जरूरत है। राज्य के बजट में स्वास्थ्य को प्राथमिकता दिए जाने से ही बेहतरी की उम्मीद की जा सकती है।


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