बनारस : हार की जीत या जीत की हार

2014 में नरेन्द्र मोदी ने बनारस में कहा था, मुझे मां गंगा ने बुलाया है। 2017 में वे जनता से कह रहे हैं आपका प्यार और आशीर्वाद मुझे बार-बार खींचकर ले आता है। ...

देशबन्धु
बनारस : हार की जीत या जीत की हार
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2014 में नरेन्द्र मोदी ने बनारस में कहा था, मुझे मां गंगा ने बुलाया है। 2017 में वे जनता से कह रहे हैं आपका प्यार और आशीर्वाद मुझे बार-बार खींचकर ले आता है। लेकिन जानकारों का कहना है कि भाजपा के बागियों के तेवर ने प्रधानमंत्री को बनारस आने पर मजबूर कर दिया है। प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का तीन दिन तक बनारस में टिके रहना मामूली बात नहींहै। दरअसल भाजपा के लिए बनारस की जंग प्रतिष्ठा की जंग है, हालांकि यह लड़ाई आसान नहीं होगी। वाराणसी •िाले में वैसे तो कुल आठ विधानसभा सीटें आती हैं लेकिन 2012 में शहरी क्षेत्र की तीन सीटें ही उसके खाते में गई थीं। जानकारों के मुताबिक भाजपा के सामने इस बार इससे ज़्यादा सीटों को जीतने की जितनी चुनौती है, उससे कहीं ज़्यादा इन सीटों को बचाने की है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि इनमें से दो सीटों पर मौजूदा विधायकों को टिकट नहीं दिए गए हैं और नेताओं की तमाम कोशिशों के बावजूद यहां पार्टी कार्यकर्ताओं की नारा•ागी दिखती है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री समेत केंद्रीय मंत्रिमंडल के $करीब दर्जन भर मंत्रियों को यहां कैैंप करना पड़ा और भाजपा के कार्यकर्ता बनारस की गलियों में घूमकर, घर-घर जाकर वोट मांग रहे हैं। वाराणसी न सिर्फ़ प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है बल्कि पूर्वांचल की भी धुरी है। इस क्षेत्र का जितना ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व है, उतना ही राजनैतिक महत्व भी हो गया है। इसलिए न केवल प्रधानमंत्री बल्कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, उनके नए साथी राहुल गांधी, और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को भी बनारस में सभाएं व रोड शो करने पर मजबूर होना पड़ा। कांग्रेस- सपा गठबंधन की कोशिश प्रधानमंत्री मोदी को उनके संसदीय क्षेत्र में ही मात देकर मोदी लहर की बात को बेबुनियाद साबित करने की है। दरअसल उत्तरप्रदेश के सियासी महाभारत में बनारस का चुनाव पर्व अलग ही है। मोदी ने सात किलोमीटर, तो राहुल-अखिलेश ने समर्थकों की भारी भीड़ के साथ करीब आठ किलोमीटर तक रोड शो किया और इसमें डिंपल यादव भी अखिलेश के साथ रहीं। यादव दंपती ने काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा की, और उस पर भी राजनीति शुरु हो गई है। एक भाजपा नेता ने ट्वीट कर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पूजा के लिए बैठने की मुद्रा पर सवाल उठा दिया। सोशल मीडिया पर इसे नमाज की तरह बैठना कहा गया। पहले बिजली हिंदू-मुस्लिम में बंटी और अब पूजा के लिए बैठने की मुद्रा। चुनाव जीतने की बेचैनी ऐसी बातों से साफ जाहिर हो जाती है। बसपा प्रमुख मायावती ने भी शनिवार  को वाराणसी में रैली की और कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाराणसी रोड शो में दिखाई पडऩे वाले लोग सिर्फ दर्शक भर थे। जबकि हमारी विशाल रैली में यहां स्थानीय लोगों ने हिस्सा लिया, जो साबित करता है कि यह बसपा है, जिसे वास्तव में जनता का समर्थन हासिल है और राज्य में अगली सरकार बनाने को तैयार है। मायावती ने न पूजा की, न विकास के लंबे-चौड़े वादे किए, लेकिन जो बनारस अपनी गंगा-जमुनी संस्कृति के लिए जाना जाता है, वहां से उनकी यह रैली काफी मायने रखती है, क्योंकि इन चुनावों में उन्होंने प्रदेश भर में लगभग सौ मुस्लिम उम्मीदवार बसपा से उतारे हैं। दलित मतदाता के साथ-साथ मुस्लिमों को जोडऩे की यह रणनीति कितनी कारगर होती है, यह 11 मार्च को पता चलेगा। जीत और हार मतदाता के हाथ में है, लेकिन इनसे परे सबसे बड़ा सवाल पिछड़े वर्गों और पिछड़े क्षेत्रों के सर्वांगीण विकास का है।
शनिवार को प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उनका सपना बनारस को ऐसा शहर बनाना है जहां विरासत भी हो वाई-फाई भी हो, संस्कृति भी हो और सफाई भी हो। अलंकार, छंद और तुक के लिहाज से ऐसा वाक्य अच्छा लगता है, लेकिन चुनाव जीतने के लिए धरातल की सच्चाई को पहचानने का प्रयास प्रधानमंत्री को करना चाहिए। विरासत और संस्कृति बनारस की आत्मा है, उसके लिए प्रधानमंत्री के सपने की बनारस को जरूरत नहींहै। तीन साल पहले काशी के साथ क्योटो की तुक मिलाई गई थी, लेकिन वाई-फाई और सफाई तो दूर की बात, विकास की जो माला भाजपा और प्रधानमंत्री दिन-रात जपा करते हैं, बनारस में उसके निशान बड़ी मुश्किल से मिलते हैं। और कमोबेश यही हाल पूरे पूर्वांचल का है। 21वींसदी के भारत में पूर्वांचल की पहचान पिछड़े इलाके के रूप में बन चुकी है और इसके लिए सभी राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं, जो इस वक्त जीत के लिए एड़ी-चोटी एक किए हुए हैं।


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