क्या सोचते हैं मोदीजी

जो साल का सोचते हैं वो अनाज बोते हैं, जो दस साल का सोचते हैं वो फलों के वृक्ष बोते हैं, जो पीढिय़ों का सोचते हैं वो इंसान के निर्माण के बारे में सोचते हैं। ...

देशबन्धु
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जो साल का सोचते हैं वो अनाज बोते हैं, जो दस साल का सोचते हैं वो फलों के वृक्ष बोते हैं, जो पीढिय़ों का सोचते हैं वो इंसान के निर्माण के बारे में सोचते हैं। ये उद्गार देश के महान प्रधानसेवक और पद से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हैं, जो उन्होंने 2014 में शिक्षक दिवस के अवसर पर विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए थे। नरेन्द्र मोदीजी का यह शिक्षक दिवस सेलीब्रेशन कई मायनों में ऐतिहासिक था। पहली बार किसी प्रधानमंत्री को देश भर के विद्यार्थियों ने लाइव सुना। सरकारी स्कूलों में सारा तामझाम कर लाइव टेलीकास्ट की व्यवस्था करवाई गई थी। इस अवसर पर मोदी जी ने बहुत सी बातें बच्चों से सीधे और बड़ों से इशारों में की थीं, जो अब समझ आ रही हैं। उन्होंने कहा था कि व्यक्ति का अनुभव ही उसकी सबसे बड़ी शिक्षा है, लेकिन अनुभव भी अच्छी शिक्षा पर ही निर्भर करता है। मोदीजी पीढिय़ों के बारे में क्या सोचते हैं, इंसान के निर्माण के बारे में क्या सोचते हैं और अच्छी शिक्षा की उनकी परिभाषा क्या है, यह सब हमारे शैक्षणिक संस्थानों में चल रही गतिविधियों, हंगामों, विवादों से समझा जा सकता है। चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता, पुणे, जोधपुर, दिल्ली इन तमाम शहरों के नामी-गिरामी उच्च शिक्षा संस्थान, जो वैचारिक धरातल के लिए प्रसिद्ध थे, अब विवादों का केेंद्र बन गए हैं। हैदराबाद में रोहित वेमुला की मौत को राजनीति और जाति की उलझनों में फंसा कर असल मुद्दे से ध्यान हटाया गया, जेएनयू में सरकार के मिजाज से अलग बातें हुईं तो यह उसे रास नहींआया और देशद्रोह बनाम देशप्रेम का वितंडा खड़ा किया गया, जोधपुर की जय नारायण व्यास यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी की सहायक प्रोफेसर राजश्री राणावत को पिछले हफ्ते 16 फरवरी को यूनिवर्सिटी ने बर्खास्त कर दिया गया, उनका कसूर महज इतना था कि उन्होंने जेएनयू की प्रोफेसर निवेदिता मेनन को व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया था। प्रो.मेनन जेएनयू प्रकरण के वक्त भी तथाकथित राष्ट्रप्रेमियों के निशाने पर थींऔर अब उन पर आरोप लगा दिया गया कि उन्होंने जोधपुर में कश्मीर और सैनिकों के बारे में गलत बातें कहीं। प्रो.मेनन ने ऐसा बयान कब दिया, इसका कोई प्रमाण नहींहै, केवल दो स्थानीय समाचारपत्रों में यह छपा है। प्रो.मेनन ने किसी भी तरह की गलतबयानी से इंकार किया है।               
पिछले साल सितंबर में इसी तरह हरियाणा के केंद्रीय विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग के दो शिक्षकों को विश्वविद्यालय ने प्रताडि़त किया था, क्योंकि उन्होंने महाश्वेता देवी के नाटक द्रौपदी का मंचन करवाया था। इसके लिए उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवाई गई। अब दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कालेज में देशप्रेमी नए सिरे से उठ खड़े हुए हैं। इस कालेज के एक सेमिनार में उमर खालिद को बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था। इस पर एबीवीपी ने हंगामा शुरु किया और जब इसका विरोध दूसरे छात्रों ने किया तो बात हिंसा तक जा पहुंची। दिल्ली पुलिस मौके पर मौजूद थी, लेकिन उसकी भूमिका पर कई सवाल उठ रहे हैं। एबीवीपी ने उमर खालिद को देशद्रोही कहा, जबकि अब तक उन पर किसी तरह का आरोप सिद्ध नहींहुआ है। भाजपा की छात्र इकाई देशप्रेम का प्रमाणपत्र बांटने के खुद को शायद अधिकृत मानती है, क्योंकि उसके बड़े भी यही काम कर रहे हैं। एबीवीपी के इस विरोध के बाद कारगिल शहीद मंदीप सिंह की बेटी गुरमेहर ने फेसबुक पर तख्ती पकड़े एक अपनी तस्वीर डाली है, जिस पर लिखा है कि मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा हूं। मैं तंग सोच की सियासी विचारधारा को अपने कैंपस और अधिकारों का अपहरण नहीं करने दूंगी। देश का हर छात्र मेरे साथ है। गुरमेहर लेडी श्रीराम कालेज की छात्रा हैं। विरोध का उनका यह अंदाज जल्द ही चर्चित हो गया और अब बहुत से छात्र-छात्राएं उनके साथ खड़े हैं। गुरमेहर ने कुछ और पोस्ट भी डाले थे, जिसमें उसके हाथ में एबीवीपी के विरोध के बैनर थे। एक तख्ती पर लिखा था कि मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं, युद्ध ने मारा है। लेकिन केेंद्र सरकार को यह शांतिपूर्ण विरोध भी खटक रहा है। गृह राज्य मंत्री किरेण रिजीजू ने ट्वीट कर कहा है - इस नौजवान लड़की के दिमाग में गंदगी कौन भर रहा है? एक मजबूत सशस्त्र बल युद्ध को रोकता है। भारत ने कभी किसी पर हमला नहीं किया, लेकिन भारत जब भी कमजोर था तब हमले हुए। श्रीमान रिजीजू यह भी बता दें कि क्या अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व में भारत कमजोर था? क्योंकि कारगिल युद्ध तभी हुआ था और गुरमेहर ने अपने पिता को तभी खोया था। गुरमेहर और उनके दोस्तों को सोशल मीडिया पर बलात्कार जैसी धमकियां मिल रही हैं। जाहिर है जब  विरोध का जवाब देने के लिए ठोस तर्क नहींहोते तो इसी तरह की निम्नस्तरीय सोच सामने आती है। मैसूर से भारतीय जनता पार्टी के सांसद प्रताप सिन्हा ने तो गुरमेहर कौर की तुलना दाऊद इब्राहिम से करते हुए ट्वीट किया कि 1993 में मैंने लोगों को नहींमारा है, बम ने मारा है। और कुछ इसी तरह का ट्वीट वीरेन्द्र सहवाग ने किया कि मैंने दो बार तिहरे शतक नहींबनाए, मेरे बल्ले ने बनाए हैं। भाजपा सांसद की सोच तो उनकी पार्टी के साथ ही रहेगी, लेकिन बेहतर होता अगर सहवाग मामले की संवेदनशीलता को समझ कर अपनी प्रतिक्रिया देते। सेमिनार रुकवाने के लिए जितनी तत्परता देशप्रेमियों ने दिखाई और गुरमेहर को धमकियां देने में जितनी उर्जा लगाई गई, काश जेएनयू के गुमशुदा छात्र नजीब के लिए भी यही जोश दिखाया गया होता, उसे ढूंढने के लिए दूसरे छात्र संगठनों के साथ खड़ा होने की हिम्मत दिखाई होती, तो क्या पता नजीब का कुछ पता चल जाता। लेकिन ऐसा नहींहुआ, क्योंकि यहां किसी पर देशद्रोह का इल्जाम नहींलगाना था, न ही देशप्रेमी होने का प्रमाणपत्र बांटना था। मोदीजी क्या सोचते हैं आप, क्या हमारे विद्यार्थियों को ऐसे अनुभवों के साथ ही शिक्षित होना चाहिए?


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