हार्वर्ड और हार्डवर्क

अक्टूबर-दिसंबर की तीसरी तिमाही में भारत की जीडीपी 7 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ी। हालांकि यह पिछली तिमाही (7.4 प्रतिशत) के मुकाबले कमजोर दिखी,...

देशबन्धु
हार्वर्ड और हार्डवर्क
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अक्टूबर-दिसंबर की तीसरी तिमाही में भारत की जीडीपी 7 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ी। हालांकि यह पिछली तिमाही (7.4 प्रतिशत) के मुकाबले कमजोर दिखी, लेकिन नोटबंदी के बाद जीडीपी में गिरावट की जो आशंकाएं अर्थशास्त्रियों ने जतलाई थीं, वे खारिज हो गई हैं। अगर सचमुच ऐसा है तो देश को प्रसन्न होना चाहिए कि अब अच्छे दिन आ ही जाएंगे। लेकिन आंकड़े हमेशा सच बोलते हों, ऐसा नहींहै। देश के आम आदमी की माली हालत जीडीपी के आंकड़ो से भी ज्यादा उलझी हुई है। उसके लिए भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, यात्रा हर चीज दिन ब दिन महंगी होती जा रही है। अगर देश उन्नति कर रहा है, तो उसे अपने खर्च काट-काट कर क्यों जीना पड़ रहा है, यह उसके लिए सबसे कठिन सवाल है। देश के पूर्व प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह, नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री डा.अमत्र्य सेन और कई अर्थशास्त्रियों ने नोटबंदी को मोदी सरकार का गलत फैसला बताया था। उस वक्त जिस तरीके की तकलीफेें आम जनता को सहनी पड़ींऔर जिनसे वो आज भी उबर नहींपायी है, उससे इन आर्थिक विशेषज्ञों की बात सही लग रही थी। लेकिन अब सरकार कह रही है कि जीडीपी ने गति पकड़ी है, तो मान लेना चाहिए कि नोटबंदी एक सही फैसला था। कम से कम प्रधानमंत्री यही चाहते हैं। इसलिए उत्तरप्रदेश में चुनावी रैली में उन्होंने फिर गरीब का बेटा बनकर हुंकार भरी कि देश अब हार्वर्ड की सोच से नहीं, हार्डवर्क से आगे बढ़ रहा है। नोटबंदी का विरोध करने वाले अर्थशास्त्रियों और विपक्ष को निशाने पर लेते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि मंगलवार को आए जीडीपी के ताजा आंकड़ों ने स्थिति साफ कर दी है। भारत दुनिया में सबसे तेज गति से बढऩे वाली अर्थव्यवस्था है। उन्होंने जीडीपी के स्थिर रहने का श्रेय देश की मेहनतकश जनता को दिया और कहा कि हार्वर्ड और आक्सफोर्ड के नाम पर सालों से अर्थजगत में महत्वपूर्ण स्थान बनाकर रखने वाले बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों की भविष्यवाणी फेल हो गई है। पता नहींमोदीजी किस बात की खुंदक निकाल रहे थे। अपनी डिग्री और आलोचना करने वाले अर्थशास्त्रियों की डिग्री के कारण उनमें कोई हीनभाव आ गया या यह बात कचोट रही है कि वे हार्वर्ड या आक्सफोर्ड में नहींपढ़े? वैसे यह ज्ञान उन्हें कैसे और कहां से मिला कि हार्वर्ड में पढऩे वाले हार्डवर्क नहींकरते हैं? अगर ऐसा है तो अपने मंत्रिमंडल के तमाम उच्चशिक्षित लोगों से उन्हें दूरी बना लेनी चाहिए, क्या पता वे भी हार्डवर्क न करते हों? दरअसल बातों को उलझाने की कला मोदीजी खूब जानते हैं। उत्तरप्रदेश में चुनावों में साख दांव पर लगी है। पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों में जीत मिलने पर कहा गया कि नोटबंदी का असर नहींहुआ। लेकिन असली इम्तिहान उत्तरप्रदेश में है, जहां नोटबंदी का असर भाजपा पर पड़ सकता है। कई उद्योगधंधों पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ा, किसानों-मजदूरों, गृहणियों, व्यापारियों को तकलीफ हुई। ऐसे में मोदी सरकार के लिए यह बताना जरूरी था कि नोटबंदी से जीडीपी अप्रभावित रही।
उम्मीद से बेहतर आर्थिक वद्धि के आंकड़ों से उत्साहित वित्त मंत्री अरूण जेटली ने भी कहा कि तीसरी तिमाही में 7 प्रतिशत वद्धि ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नोटबंदी के असर के बारे में बढ़ा चढ़ा कर पेश की जाने वाली बातों को झुठला दिया है। हालांकि अक्टूबर से दिसंबर तक के तीन महीनों के दौरान 7 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ के आंकड़े से कई अर्थशास्त्री हैरान हैं। उनका कहना है कि ये आंकड़े असल स्थिति से मेल नहीं खाते हैं और हो सकता है कि ये नोटबंदी के असल असर को छिपा रहे हों। ऐसी राय जताने वाले किसी विरोधी पार्टी के नेता नहींबल्कि एसबीआई, आईडीबीआई बैंक और बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच के अर्थशास्त्री इनमें शामिल हैं। इन विश्लेषकों का कहना है कि यह जीडीपी वृद्धि दर सालभर पहले के बेस पीरियड से जुड़े डेटा में भारी कटौती किए जाने की वजह से हासिल हुई है। आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि नोटबंदी की वजह से जीडीपी ग्रोथ में 1 प्रतिशत से ज्यादा गिरावट आई है।
जीडीपी पर सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है। लेकिन नोटबंदी के घोषित उद्देश्यों की पूर्ति पर अब भी बड़ा प्रश्नचिह्नï है। काला धन कितना वापस आया और कितना खत्म हुआ, इस पर सरकार चुप है। भ्रष्टाचार नहींरुका न नकली नोटों का धंधा बंद हुआ। सरकार के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए कि सरकारी बैंकों का एनपीए लगातार बढ़ता ही जा रहा है,1 जनवरी 2016 से 31 दिसंबर 2016 तक कि अवधि में सरकारी बैंकों के एनपीए में 56.4 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। इस वृद्धि के साथ अब सरकारी बैंकों का कुल एनपीए 6,14,72 करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। आने वाली दो तिमाही में इसके और अधिक बढऩे की आशंका है। इसका एक बड़ा कारण नोटबंदी भी है.जिसके कारण छोटी और मध्यम औद्योगिक इकाइयां अपनी किश्तों का भुगतान नहीं कर सकी हैं। उन पर तो सरकार और बैंक सख्ती बरत लेंगे, लेकिन विजय माल्या जैसे फरार अपराधियों को देश में वापस कब लाया जाएगा और कब उनसे ऋण वसूला जाएगा, इसका जवाब भी सरकार को देना होगा। केयर रेटिंग्स एजेंसी द्वारा एकत्रित आंकड़ों के अनुसार पिछले दो सालों में बुरे ऋण में 135 फीसदी की वृद्धि हो चुकी है। दो साल पहले यह बुरा ऋण 2,61,843 करोड़ रुपए थे, जो अब बढक़र 6,14,72 करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। मोदीजी चाहें तो इसका ठीकरा भी हार्वर्ड वालों पर फोड़ दें, लेकिन क्या यह दावा वे कर सकते हैं कि अपने हार्डवर्क से बैंकों का एनपीए कम करवा देंगे। अपने हार्डïवर्क से महंगाई कम करवा देंगे। इसके साथ क्या इतनी उदारता वे अब दिखाएंगे कि नोटबंदी के कारण अकाल मृत्यु का शिकार हुए लोगों के प्रति संवेदना के दो बोल कहें।


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