ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल

चुनाव खत्म हो गए हैं, लेकिन सियासी घमासान अब तक जारी है। उत्तरप्रदेश में पराजय का मुंह देखने वाली बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने कहा है कि उन्हें मोदीजी ने नहीं, मशीन ने हराया है।...

देशबन्धु
ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल
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चुनाव खत्म हो गए हैं, लेकिन सियासी घमासान अब तक जारी है। उत्तरप्रदेश में पराजय का मुंह देखने वाली बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने कहा है कि उन्हें मोदीजी ने नहीं, मशीन ने हराया है। मायावती का आरोप है कि उत्तरप्रदेश के चुनावों में ईवीएम के इस्तेमाल में धांधली से भाजपा ने चुनाव जीता है। उनके इस आरोप पर अखिलेश यादव ने भी कहा है कि जब बात उठी है तो जांच होनी चाहिए। उधर गोवा और पंजाब में सरकार बनाने की आस लगाई आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने भी ऐसे ही आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा है कि पंजाब में उनके हिस्से के वोट अकाली दल और कांग्रेस को मिल गए। केजरीवाल ने दिल्ली के आगामी नगर निगम चुनावों में ईवीएम की जगह बैलेट पेपर के इस्तेमाल की मांग की और कुछ ऐसी मांग कांग्रेस की ओर से अजय माकन ने की। हालांकि इन मांगों को अस्वीकृत करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि मतदान ईवीएम से ही होंगे, लेकिन विवाद का समाधान अभी होना बाकी है। भारत में चुनाव सुधार प्रणाली के तहत ईवीएम का इस्तेमाल किया गया, ताकि मतदाता को यह भरोसा दिलाया जा सके कि चुनाव निष्पक्ष ढंग से संपन्न हो रहे हैं। जब मतपत्र पेटी में डालने की प्रणाली थी, तो उसमें धांधली की शिकायतें आम थीं। राजनैतिक दलों के बूथ प्रबंधन के नाम पर कई मतदान केेंद्रों में दबंग लोग डरा-धमका कर अपने पक्ष में वोट डलवाया करते थे। ईवीएम में इस तरह की गड़बड़ी की गुंजाइश नहींहोगी, इन उम्मीदों के साथ इसका इस्तेमाल प्रारंभ किया गया था।
 भारत में ईवीएम का पहली बार इस्तेमाल मई, 1982 में केरल के परूर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के 50 मतदान केन्द्रों पर हुआ। 1983 के बाद इन मशीनों का इस्तेमाल इसलिए नहीं किया गया कि चुनाव में वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल को वैधानिक रुप दिये जाने के लिए उच्चतम न्यायालय का आदेश जारी हुआ था। दिसम्बर, 1988 में संसद ने इस कानून में संशोधन किया तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में नई धारा-61 ए जोड़ी गई जो आयोग को वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल का अधिकार देती है। संशोधित प्रावधान 15 मार्च 1989 से प्रभावी हुआ। नवम्बर, 1998 के बाद से आम चुनाव/उप-चुनावों में प्रत्येक संसदीय तथा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में ईवीएम का इस्तेमाल किया जा रहा है। 2004 के आम चुनाव में देश के सभी मतदान केन्द्रों पर 10.75 लाख ईवीएम के इस्तेमाल के साथ भारत में ई-लोकतंत्र आ गया और तब से सभी चुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन अब कई सारे दल इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं तो यह एक और मौका चुनाव आयोग के समक्ष है कि वह निर्वाचन प्रणाली की पारदर्शिता और निषपक्षता को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कदम उठाए। हालांकि निर्वाचन आयोग यह नहींमानता है कि ईवीएम के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ संभव है। इसमें इस्तेमाल की जाने वाली वास्तविक कोड प्रणाली, इसका किसी बाहरी कम्प्यूटर से न जुड़ा होना ऐसी कुछ तकनीकी विशेषताओं के कारण आयोग इसे पूर्णत: सुरक्षित मानता है। लेकिन यह विचारणीय है कि देश में मुद्रा भी इसी तरह अतिसुरक्षित ढांचे में आरबीआई छापता है, बावजूद इसके नकली नोट किसी न किसी तरह बाजार में आ ही जाते हैं। जहां तक सवाल मशीन की सुरक्षा का है तो ईमेल से लेकर बैंक अकाऊंट तक रोजाना हैकिंग के नित नए प्रकरण सामने आते हैं, ऐसे में यह सोचकर निश्चिंत नहींहुआ जा सकता कि हमारी ईवीएम में कोई सेंध नहींलगा सकता है। बसपा, आप और कांग्रेस अगर ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं, तो इसे केवल विरोधियों का राजनीतिक स्टंट कहना भी गलत होगा। इससे पहले 2009 में लालकृष्ण आडवानी ने ऐसे ही सवाल उठाए थे और गुजरात विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत के बावजूद सुब्रमण्यम स्वामी ने कांग्रेस पर ईवीएम से छेड़छाड़ का आरोप लगाया था। लोकतंत्र में जनता के विश्वास से बड़ी कोई चीज नहींहोती और अभी जो घटनाक्रम चल रहा है, उससे मतदाता यह शंका कर सकता है कि उसके वोट का गलत इस्तेमाल तो नहींहुआ। लिहाजा यह जरूरी है कि हर कीमत पर मतदाता के भरोसे को बनाए रखा जाए।


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