भाजपा : बाजीगर भी सिकंदर भी

हार कर जीतने वाले को बाजीगर कहते हैं, यह संवाद शाहरुख खान के कारण बहुत चर्चित हुआ था। जब सवाल केवल जीत और हार का हो, तो सारी मर्यादाएं, नैतिकता, मूल्य ताक पर रख दिए जाते हैं ...

देशबन्धु
भाजपा : बाजीगर भी सिकंदर भी
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हार कर जीतने वाले को बाजीगर कहते हैं, यह संवाद शाहरुख खान के कारण बहुत चर्चित हुआ था। जब सवाल केवल जीत और हार का हो, तो सारी मर्यादाएं, नैतिकता, मूल्य ताक पर रख दिए जाते हैं और जो जीता वही सिकंदर के ध्येय को अपना लिया जाता है। फिलहाल भाजपा बाजीगर और सिकंदर दोनों नजर आ रही है। उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में शानदार बहुमत से वह अपनी सरकार बना रही है, लेकिन गोवा का हाथ से फिसलना उसे मंजूर नहींथा और मणिपुर की सत्ता पाने की जो उम्मीदें थी, उसे नाकाम कैसे होने दिया जाता। लिहाजा दूसरे स्थान पर रहने के बावजूद भाजपा ने सरकार बनाने का दावा पेश किया, वहां के राज्यपालों ने इसे मंजूर किया और अब दोनों ही हारे हुए प्रदेशों की सत्ता भाजपा ने राजनीतिक दांवपेंचों से जीत ली है। सत्ता की इस दौड़ में कांग्रेस पता नहींखरगोश बनी या कछुआ, लेकिन आज की सच्चाई यह है कि उसने सरकार बनाने का हाथ आया मौका आसानी से जाने दिया। गोवा में मनोहर पार्रिकर के मुख्यमंत्री बनने के पहले कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया कि यहां उसे पहले अवसर मिलना चाहिए था। अदालत से उसे दो टूक जवाब मिला कि आपने पहले दावा पेश क्यों नहींकिया। मणिपुर में तो कांग्रेस ने राज्यपाल से भेंट भी की, लेकिन वहां भी वीरेन सिंह भाजपा की सरकार बनाने जा रहे हैं। गोवा में भाजपा को 16 तारीख को बहुमत साबित करना होगा और यही चुनौती कांग्रेस के सामने भी है। लेकिन जिस तेजी से भाजपा ने चालें चली हैं और कांग्रेस असमंजस की स्थिति में नजर आ रही है, उससे यही लगता है कि भाजपा को बहुमत दिखाने में कोई दिक्कत नहींहोगी। उधर मणिपुर में तो वह पहले ही दावा कर रही है कि उसके पास बहुमत है।
भारतीय लोकतंत्र में अब तक यही बताया जाता रहा है कि जो पार्टी सबसे बड़ी होती है, सरकार बनाने का मौका उसे ही मिलता है। लेकिन अब बहुत सारी बातें बदल रही हैं तो क्या आश्चर्य कि दूसरे स्थान पर रहने वाली पार्टी को सरकार बनाने का न्यौता राज्यपाल दे रहे हैं। कांग्रेस ने राज्यपाल की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। लेकिन यह स्थिति आज निर्मित नहींहुई है। बरसों से केेंद्र पर काबिज सरकारें प्रदेशों में अपनी पसंद का राज्यपाल नियुक्त करती हैं, ताकि जरूरत पडऩे पर वह उनकी इच्छा और सुविधा मुताबिक काम करे। पहले कांग्रेस सरकारों ने यही किया, अब भाजपा यही कर रही है। दरअसल बहुमत साबित न होने पर सरकार गठन की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए, इस बारे में हमारे संवैधानिक प्रावधानों की अस्पष्टता से ही राज्यपालों के मार्फत केेंद्र सरकार मनमाना खेल खेल सकती है। एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहींमिला है तो सरकार बनाने का दावा करने का हक किसे है? चुनाव पूर्व के गठबंधन, चुनावबाद के गठबंधन, सबसे ज्यादा सीटें हासिल करने वाली पार्टी या अधिक विधायकों के समर्थन का दावा करने वाली पार्टी, इनमें से किसे सरकार बनाने का हक है? इन सवालों पर संविधान में प्रावधान स्पष्ट नहींहैं। गोवा और मणिपुर में अगर भाजपा बहुमत का दावा कर रही है, तो उसमें कितनी नैतिकता है, इसका परीक्षण क्यों नहींहोना चाहिए? उसने जिन विधायकों के समर्थन का दावा किया है, क्या वे चुनाव के पहले उसके साथ थे? अगर नहींतो सरकार बनाने की बात पर साथ क्यों आए हैं? अगर इन सवालों के जवाब तलाशें जाएं तो सत्ता के लिए खरीद-फरोख्त का कड़वा सच सामने आएगा। राजनैतिक दल तो इसके उजागर होने में असुविधा महसूस करेंगे, लेकिन लोकतंत्र की रक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय को यह पहल करनी चाहिए थी।


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