संविधान की भावना के खिलाफ

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कल गुजरात के मुख्यमंत्री के शपथग्रहण समारोह में शामिल हुए और आज हिमाचल प्रदेश में इसी सिलसिले में पहुंचे...

देशबन्धु
संविधान की भावना के खिलाफ
Narendra Modi
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कल गुजरात के मुख्यमंत्री के शपथग्रहण समारोह में शामिल हुए और आज हिमाचल प्रदेश में इसी सिलसिले में पहुंचे। उनकी तमन्ना यही है कि देश के हर राज्य में वे भाजपा की सरकार बनवाएं और अपनी पसंद के मुख्यमंत्री बनाकर उन्हें शपथ लेता देखें। शपथग्रहण में शपथ लेने वाले व्यक्ति को यह कहना ही पड़ता है कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा। लेकिन अगर केन्द्रीय राज्य मंत्री अनंत कुमार हेगड़े का बस चले तो वे इस अनिवार्यता को खत्म करवा दें। कम से कम उनके बयान से तो यही संकेत मिलते हैं। अमूमन भाजपा, संघ और तमाम दक्षिणपंथी लोगों को सेक्युलिरज्म यानी धर्मनिरपेक्षता शब्द पर खासी आपत्ति है। वे अक्सर बहस करते हैं कि संविधान में इसे क्यों रखा जाना चाहिए। पर श्री हेगड़े ने तो एक कदम आगे बढ़ाते हुए इसे भविष्य में बदले जाने के संकेत भी दे दिए।

कर्नाटक के कोप्पल में रविवार को ब्राह्मण युवा परिषद के कार्यक्रम में बोलते हुए सेक्युलरिज़्म शब्द को उन्होंने निशाने पर लिया और कहा कि कुछ लोग कहते हैं कि सेक्युलर शब्द है तो आपको मानना पड़ेगा। क्योंकि यह संविधान में है, हम इसका सम्मान करेंगे लेकिन यह आने वाले समय में बदलेगा। संविधान में पहले भी कई बदलाव हुए हैं। अब हम हैं और हम संविधान बदलने आए हैं।

वे यहीं नहीं रूके बल्कि इसके आगे बेहद आपत्तिजनक बात उन्होंने कही कि सेक्युलरिस्ट लोगों का नया रिवाज आ गया है। अगर कोई कहे कि वो मुस्लिम है, ईसाई है, लिंगायत है, हिंदू है तो मैं खुश होऊंगा। क्योंकि उसे पता है कि वो कहां से आया है। लेकिन जो खुद को सेक्युलर कहते हैं, मैं नहीं जानता कि उन्हें क्या कहूं। ये वो लोग हैं जिनके मां-बाप का पता नहीं होता या अपने खून का पता नहीं होता। इस बयान के जरिए उन्होंने न केवल संविधान की भावना का अपमान किया बल्कि उन तमाम हिंदुस्तानियों का अनादर किया है जो इसकी गंगा-जमुनी तहजीब निभाते हुए देश के धार्रि्मक-सांप्रदायिक सौहार्द्र को बचाए हुए हैं। जब से मोदी सरकार ने देश की सत्ता संभाली है, धर्मनिरपेक्षता को कई जख्म मिले हैं।

अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव और अत्याचार की घटनाएं बढ़ी हैं। सामान्य लोगों के बीच अकारण संदेह बढ़ा है। फिर भी यहां की सहनशील जनता समझदारी का परिचय देती रही है। लेकिन सरकार के बड़बोले, निरंकुश मंत्रियों और सांसदों को शायद यह सहनशीलता, सद्भाव और शांति रास नहीं आ रहे हैं, तभी वे ऐसे आपत्तिजनक देते रहते हैं। अभी कुछ दिन पहले राजस्थान में भाजपा विधायक ज्ञानदेव आहूजा ने कहा था कि गौकशी करोगे तो ऐसे ही मरोगे। क्या मोदीजी को अपनी पार्टी के विधायकों, सांसदों की ऐसी बातें सुनाई नहीं देती हैं? क्या संविधान की आत्मा को चोट पहुंचाने वाले ऐसे बयानों पर उनके आंसू नहीं छलकने चाहिए? हाल ही में उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने सेक्युलरिज़्म को संविधान से भी पहले बताते हुए कहा था कि यह हमारे डीएनए में है। श्री नायडू के इस बयान पर शायद आरएसएस को असहमति हो, क्योंकि उसकी भी मंशा संविधान में बदलाव की शुरु से रही है। 


बीते सितंबर हैदराबाद में एक कार्यक्रम में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि भारतीय संविधान में बदलाव कर उसे भारतीय समाज के नैतिक मूल्यों के अनुरूप किया जाना चाहिए। कहने की आवश्यकता नहीं कि इनकी नैतिकता का दायरा हिंदू राष्ट्र से शुरु होकर उसी पर खत्म भी होता है। अब सवाल यह है कि क्या किसी के चाहने से संविधान को बदला जा सकता है? संविधान में संशोधन का प्रावधान तो है, लेकिन क्या संसद संविधान के किसी भी हिस्से को रद्द, संशोधित और बदल सकती है?

1973 के केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले में हमें इस सवाल का जवाब मिला है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय की 13 न्यायाधीशों की पीठ ने कहा था कि संविधान संशोधन के अधिकार पर एकमात्र प्रतिबंध यह है कि इसके माध्यम से संविधान के मूल ढांचे को क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के मामले में 68 दिन तक सुनवाई हुई। और 24 अप्रैल 1973 को, चीफ जस्टिस सीकरी और उच्चतम न्यायालय के 12 अन्य न्यायाधीशों ने न्यायिक इतिहास का यह सबसे महत्वपूर्ण निर्णय दिया कि संसद की शक्ति संविधान संशोधन करने की तो है लेकिन संविधान की प्रस्तावना के मूल ढांचे को नहीं बदला जा सकता है। कोई भी संशोधन प्रस्तावना की भावना के खिला$फ नहीं हो सकता है। और सेक्युलर शब्द तो संविधान की प्रस्तावना में शुरु में ही है। अपने तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद यह सिद्धांत अभी भी कायम है और संविधान के संशोधनों पर नजर रखने का काम कर रहा है। रैलियों और सभाओं में धार्मिक भावनाएं भुनाने से पहले भाजपा के नेताओं को थोड़ा राजनैतिक, न्यायिक और संसदीय इतिहास पढ़ लेना चाहिए। 

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