समानता से वंचना

फ्रॉम जंकेट टू जेएनयू, यह एक संभावित किताब का शीर्षक था, जिसे लिखने की चाह संभावनाओं से भरे एक युवक की थी। ...

देशबन्धु
समानता से वंचना
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फ्रॉम जंकेट टू जेएनयू, यह एक संभावित किताब का शीर्षक था, जिसे लिखने की चाह संभावनाओं से भरे एक युवक की थी। दोस्तों के बीच रजनी कृष नाम से चर्चित मुथुकृष्णनन जीवानंदम का शव मुनीरका के एक घर में मिला। जब सब लोग होली के जश्न में मगन थे, तब रजनी कथित तौर पर अवसाद का शिकार होकर फांसी के फंदे पर झूल गए। पुलिस इसे आत्महत्या बता रही है। हालांकि कोई सुसाइड नोट बरामद नहींहुआ है। रजनी के सहपाठी और परिचित यह स्वीकार नहींकर पा रहे हैं कि उन्होंने निराश होकर मौत को गले लगा लिया। वे उन्हें जिंदगी और हिम्मत से भरपूर इंसान मानते हैं। रजनी के अभिभावक भी उनकी आत्महत्या पर सदमे में हैं। उनके पिता का कहना है कि दो दिन पहले हुई बात में उसने कहा था कि परीक्षा के बाद वह घर आएगा। इधर रजनी के कुछ मित्रों ने उनके फेसबुक पोस्ट साझा किए हैं, जिनमें वह लगातार दलितों को पेश आने वाली कठिनाइयों और भेदभाव का जिक्र करते रहे हैं। पुलिस का कहना है कि ये निजी कारण से आत्महत्या का मामला है। अभी इसे विश्वविद्यालय से जोडऩे का कोई आधार नहींदिख रहा है। रजनी की सोशल मीडिया पर लिखी गई टिप्पणियों को भी पुलिस उनकी मौत से जोडक़र नहींदेख रही है, लेकिन इनकी जांच की जाएगी, ऐसा उसका कहना है। ऐसा लग रहा है कि हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की मृत्यु की तरह ही रजनी की मौत भी जांच और रिपोर्टो में उलझ कर रह जाएगी। पुलिस अपना काम इन दायरों में ही कर सकती है, लेकिन कुछ जिम्मेदारी समाज को भी निभानी होगी।
रजनी फेसबुक पर माना नाम से एक सीरीज में कहानियां लिख रहे थे। इन कहानियों में वो एक दलित छात्र के जीवन संघर्ष को बयान करने की कोशिश कर रहे थे। इस सीरीज में किए गए अपने अंतिम पोस्ट में उन्होंने समानता के मुद्दे को उठाया था। उन्होंने लिखा था, एम. फिल/पीएचडी दाखिलों में कोई समानता नहीं है, मौखिक परीक्षा में कोई समानता नहीं है। सिर्फ समानता को नकारा जा रहा है। प्रो$फेसर सुखदेव थोराट की अनुशंसा को नकारा जा रहा है। एडमिन ब्लॉक में छात्रों के प्रदर्शन को नकारा जा रहा है। वंचित तबके की शिक्षा को नकारा जा रहा है। समानता से वंचित करना हर चीज से वंचित करना है। इस अंतिम पंक्ति में दलितों के जीवन में पेश आने वाली सारी कठिनाइयों और संघर्ष का फलसफा बयान हो रहा है। रजनी ने कभी मजदूर की तरह काम कर, कभी दीवारों पर पेंटिंग कर पैसे जोड़े। पैसे बचाने के लिए दिल्ली से चेन्नई तक के सफर में कुछ खाया नहीं। मेहनत कर अंग्रेजी सीखी और कई प्रयासों के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। एक जगह उन्होंने लिखा कि मैं हौसला नहींहारना चाहता था और मैं सोचता था कि मेहनत कभी बेकार नहींजाती है। जेएनयू में अपने साक्षात्कार के बारे में उन्होंने लिखा है कि आखिरी इंटरव्यू में 11 मिनट बाद एक मैडम ने मुझसे कहा कि मैं सरल भाषा बोल रहा हूं। इस बार के साक्षात्कार में मैं आठ मिनट तक बोला और सभी सवालों के जवाब दिए। तीन प्रो$फेसरों ने मुझसे कहा कि मैंने अच्छे जवाब दिए हैं। मैं सेलम जिले से जेएनयू में चयनित होने वाला अकेला छात्र हूं। इस पोस्ट में रजनी ने लिखा, ये पल मेरे लिए ऐतिहासिक है, मैं किताब लिखूंगा- फ्रॉम जंकेट टू जेएनयू। इन टिप्पणियों को पढक़र लगता है कि रजनी आशावादी थे और अपनी मेहनत पर उन्हें यकीन था। फिर वे कौन सी परिस्थितियां थीं, जिसमें उन्हें मौत का शिकार होना पड़ा, इसकी विस्तृत जांच जरूरी है। रजनी की तरह इस देश के लाखों दलित छात्र प्राथमिक शिक्षा संस्थानों से लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों में तरह-तरह की दिक्कतों से गुजरते हैं। जो हालात बाबा अंबेडकर के वक्त थे, उनसे ओमप्रकाश वाल्मिकी को भी गुजरना पड़ा और आज के दलित विद्यार्थी भी उनका सामना कर रहे हैं, तो यह स्थिति बताती है कि एक समाज के रूप में अभी हम पूरी तरह से सभ्य नहींहुए हैं। बेशक हमारे संविधान ने हमें सभ्य होने की सारी संभावनाएं प्रदान की हैं, लेकिन समाज ने इसका उपयोग भी अपने नफे-नुकसान के हिसाब से करने की आदत बना ली है। प्रो.थोराट की अनुशंसाओं का पालन न होने की बात रजनी ने की है और अब भी कई दलित छात्र ऐसी शिकायत करते हैं। दरअसल एम्स में अजा, जजा विद्यार्थियों के साथ कथित भेदभाव को लेकर 2007 में प्रोफेसर सुखदेव थोराट के नेतृत्व में एक कमेटी बनी थी, जिसने ने विस्तृत अध्ययन कर, भेदभाव मिटाने के संबंध में कई सि$फारिशें की थीं। कमेटी ने कहा था कि संस्थानों में अजा/जजा छात्रों के लिए अंग्रेजी और अन्य बेसिक विषयों की विशेष कोचिंग या रेमेडियल क्लासेस की व्यवस्था करनी चाहिए। छात्रों और शिक्षकों के बीच संबंधों को सुधारने के लिए विशेष कोशिशें करनी चाहिए. इसके लिए औपचारिक शेड्यूल की व्यवस्था की जानी चाहिए। लिखित और प्रायोगिक में पक्षपात से बचने के लिए वैकल्पिक प्रश्नों की संख्या को अधिक और लिखित को कम से कम किया जाए, इसके अलावा वायवा के नंबर को न्यूनतम स्तर पर लाना चाहिए। कक्षा में भेदभाव पर अंकुश लगाने के लिए कक्षा प्रतिनिधियों की संख्या दो की जाए, जिसमें एक अजा/जजा से हो। गवर्निंग बॉडी को छात्रों, शिक्षकों और रेजिडेंट्स की एक संयुक्त कमेटी बनानी चाहिए, जो कैंपस और निजी मेसों में सामाजिक विभाजन की समस्या को ख़त्म करने पर ध्यान दे। अजा/जजा और ओबीसी छात्रों से जुड़े मुद्दों को निपटाने के लिए एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति की जाए. इसी की निगरानी में रेमेडियल कक्षाएं चलाई जाएं। इसी कार्यालय के द्वारा अजा/जजा छात्रों की शिकायतों और अन्य समस्याओं का निवारण किया जाए। छात्रों से जुड़े मसलों को हल करने के लिए बनने वाली सभी कमेटियों में अजा/जजा छात्रों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। और शिक्षकों की नियुक्ति के मामले में आरक्षण के प्रावधानों का पालन किया जाए। कहने की आवश्यकता नहींकि अगर इन सिफारिशों को ईमानदारी से लागू किया जाए तो दलित छात्रों के साथ भेदभाव को काफी हद तक रोका जा सकता है। पुलिस रजनी की मौत के कारणों की तह में जाए और सरकार व प्रशासन यह देखें कि थोराट कमेटी की सिफारिशें शिक्षा संस्थानों में किस तरह लागू हो रही हैं, ताकि समानता से वंचना किसी और की मौत का कारण न बने।


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