आर्थिक विकास हेतु स्वच्छ प्रतिस्पर्धा को दें बढ़ावा

डॉ. हनुमन्त यादव भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग द्वारा मार्च के पहले सप्ताह में अर्थशास्त्र से संबंधित दो कार्यक्रम आयोजित किए गए। पहला कार्यक्रम 2 एवं 3 मार्च को भारतीय प्रतिस्पर्धा कानून का अर्थशास्त्र के...

डॉ. हनुमंत यादव

डॉ. हनुमन्त यादव
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग द्वारा मार्च के पहले सप्ताह में अर्थशास्त्र से संबंधित दो कार्यक्रम आयोजित किए गए। पहला कार्यक्रम 2 एवं 3 मार्च को भारतीय प्रतिस्पर्धा कानून का अर्थशास्त्र के नाम से राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन था, जिसमें  तीन  संस्थाओं की ज्ञान भागीदारी थी। पहला भागीदार, दिल्ली स्कूल आफ इकोनामिक्स का अर्थशास्त्र विभाग, दूसरा भागीदार, भारतीय सांख्यिकी संस्थान दिल्ली तथा तीसरा भागीदार, दिल्ली स्थित टेरी के नाम लोकप्रिय संस्थान,  जिसका  वर्तमान नाम इनर्जी रिसोर्स इंस्टीट्यूट है। दूसरा कार्यक्रम, इकोनामिस्ट कॉनक्लेव नामित  अर्थशास्त्रियों की बैठक थी जिसका आयोजन 4 मार्च को किया गया था। पहले कार्यक्रम में 50 से अघिक अर्थशास्त्रियों ने हिस्सा लिया जिनमें दिल्ली विश्वविद्यालय, भारतीय सांख्यिकी संस्थान, ऊर्जा संसाधन संस्थान, भारतीय प्रबंधन संस्थान एवं भारतीय विधि संस्थान से जुड़े लगभग 25 आमंत्रित अर्थशास्त्रियों के साथ ही भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग से जुड़े लगभग 25 युवा अर्थशास्त्रियों का  समूह भी था जो आयोजन में सक्रिय भूमिका निभा रहा था।  इस सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले सभी प्रतिभागी 4 मार्च को आयोजित इकोनामिस्ट कॉनक्लेव में भी प्रतिभागी थे। 4 मार्च के इकोनामिस्ट कॉनक्लेव में  प्रख्यात वकील एएन हक्सर व अमित सिब्बल ने भी हिस्सा लिया।
भारतीय प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 के तहत 14 अक्टूबर 2003 को  केन्द्र सरकार द्वारा विनियामक संस्थान के रूप में स्थापित भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग का कार्य अधिनियम के उद्देश्यों एवं अधिनियम की विभिन्न धाराओं में दिए गए कार्यों का क्रियान्वयन करना है। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग अपने कर्तव्यों के सुचारू रूप से निवर्हन हेतु कानूनविदों तथा  उद्योगपतियों के संगठनों के सहयोग से उद्योगपतियों एवं व्यवसायियों के सम्मेलन लगभग हर पखवाड़े में करता रहा  है। इसके अलावा कानून के छात्रों के ज्ञानवर्धन हेतु विधि संस्थानों में सेमीनार व मूटकोर्ट प्रतिस्पर्धाएं नियमित रूप से प्रायोजित कर रहा है। पिछले कुछ सालों से आयोग द्वारा यह महसूस किया जाता रहा था कि आयोग के कर्तव्यों के सुचारू रूप से निर्वहन हेतु आयोग के युवा अर्थविदों की टीम ही पर्याप्त नहीं है बल्कि अन्य संस्थानों से जुड़े अर्थविदों को भी जोडऩा जरूरी है। इस विचार को अमलीजामा पहनाने के लिए आयोग के वर्तमान अध्यक्ष देवेन्द्र कुमार सीकरी की पहल पर आयोग के वर्तमान सदस्य आगस्टाइन पीटर के निर्देशन में आयोग द्वारा पहली कड़ी के रूप में 3 मार्च 2016 को भारतीय प्रतिस्पर्धा कानून का अर्थशास्त्र पर एक दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया गया था  जिसमें आयोग की भूतपूर्व सदस्य डॉ. गीता गौरी की भी सक्रिय भागीदारी थी।   
मार्च 2016 में आयोजित प्रथम एक दिवसीय  अर्थशास्त्री सम्मेलन की सफलता से उत्साहित होकर भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग द्वारा द्वितीय अर्थशास्त्री  सम्मेलन का आयोजन दो दिनों के लिए 2 व 3 मार्च  को आयोजित किया गया । इसमें भारतीय अर्थविदों के साथ ही साथ विदेशों से प्रतिस्पर्धा कानूनी अर्थशास्त्र की 3 प्रमुख हस्तियां, संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रूड्यू विश्वविद्यालय के डॉ. जॉन कोन्नर, यूरोपीय संघ से एथेंस विश्वविद्यालय के डॉ. यानिस कात्सोलॉकोस तथा कनाडा प्रतिस्पर्धा ब्यूरो के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री श्याम खेमानी प्रमुख रूप से आमंत्रित थे। इस सम्मेलन में मुझे भी हिस्सा लेने का अवसर प्राप्त हुआ। दो दिवसीय सम्मेलन में विभिन्न बिन्दुओं पर की गई चर्चा मुख्य रूप से आयोग को उसके कर्तव्यों के निर्वहन के प्रति प्रभावी बनाए जाने वाले उपायों तथा अर्थशास्त्रियों को आयोग से जोडऩे पर केन्द्रित रही।
प्रतिस्पर्धा बाजार से संबंधित शब्दों एवं आर्थिक नियमों की गूढ़ता के अर्थविद तो ज्ञाता होते हैं किन्तु कानूनविद परिचित नहीं होते। लगभग यही स्थिति न्यायाधिकरणों व उच्चतम न्यायालय के न्यायविदों की होती है। प्रतिस्पर्धा आयोग द्वारा बाजार को तोडऩे मरोडऩे वाली अनुचित व्यवहार फर्मों को दंडित किए जाने पर न्यायाधिकरण व उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने पर अनेक बार निर्णय दोषी फर्म के पक्ष में चला जाता है। इसलिए बहुत जरूरी है कि प्रतिस्पर्धा अर्थशास्त्र के ज्ञाता अनुभवी अर्थविदों के द्वारा किए गए अध्ययन, अनुसंधान व विश्लेषण के आधार पर आयोग के प्रकरणों को पुख्ता बनाया  जाय। इस संबंध में प्रतिस्पर्धा आयोग द्वारा दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनामिक्स के डॉ. आदित्य भट्टाचार्य द्वारा आयोग के लिए दी गई सेवाओं का उदाहरण दिया गया। चर्चा में आयोग के लिए बनाए जाने वाले प्रतिवेदन एवं प्रलेखों में भाषा एवं शब्दों की सरलता पर भी जोर दिया गया जिससे कानूनविदों एवं न्यायविदों को समझने में सरलता हो।
भारतीय प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 में  2007 एवं 2009 में संशोधन किया गया था। इसलिए वर्तमान प्रतिस्पर्धा अधिनियम को प्रतिस्पर्धा संशोधन अधिनियम 2009 कहा जाता है। आर्थिक विकास हेतु प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने एवं उपभोक्ता के हित में जरूरत पडऩे पर इसमें आगे भी संशोधन किया जा सकता है। भारतीय प्रतिस्पर्धा अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य बाजार में स्वच्छ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना तथा उसको कायम रखना, उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए प्रतिस्पर्धा पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली पद्धतियों को रोकना है। प्रतिस्पर्धा आयोग  व्यापक लोकहित हेतु स्वच्छ प्रतिस्पर्धा के अपने सिद्धान्त के परिपालन हेतु चार बिन्दुओं: प्रतिस्पर्धा विरोधी समझौते, आधिपत्य स्थितियों का दुरुपयोग रोकना, संयोजन विनिमयन एवं प्रतिस्पर्धा वकालत पर ध्यान केन्द्रित करता है। प्रतिस्पर्धा कानून पूरा  प्रतिस्पर्धा के अर्थशास्त्र पर आधारित है खासकर बाजार के सबसे पुराने स्वरूप पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थापना के लक्ष्य पर आधारित है जो सैद्धांतिक रूप से उपभोक्ता तथा उत्पादक दोनों के हितों की पूर्ति करता है। इसमें कीमत निधार्रण उत्पाद की मांग एवं पूर्ति के सिद्धान्त के आधार पर होता है। क्योंकि बाजार व प्रतिस्पर्धा से संबंधित सम्पूर्ण शब्दावली, परिभाषाओं तथा व्याख्याओं को प्रतिस्पर्धा कानून की विभिन्न धाराओं एवं उपधाराओं में स्थान मिला है। प्रतिस्पर्धा अधिनियम उत्पादकों के मध्य प्रतिस्पर्धा-विरोधी समझौतों तथा कार्टल के गठन के विरूद्ध है। किसी भी उद्योग में जब भी कार्टल के गठन की स्थिति देखी गई है प्रतिस्पर्धा आयोग ने अर्थदंडित किया है, सीमेंट संघ पर भारी अर्थदंड  इसका ज्वलंत उदाहरण है।


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