पाकिस्तान की जनता से जुडि़ए

डा. भरत झुनझुनवाला कौटिल्य कहते है कि राजा को अपने प्रतिद्वन्द्वी देश में जासूस भेज कर वहां की जनता को अपने पक्ष में मोडऩा चाहिए। इस मंत्र को लागू करने की जरूरत है। पाकिस्तान में इस मंत्र को लागू करना...

डॉ. भरत झुनझुनवाला

डा. भरत झुनझुनवाला
कौटिल्य कहते है कि राजा को अपने प्रतिद्वन्द्वी देश में जासूस भेज कर वहां की जनता को अपने पक्ष में मोडऩा चाहिए। इस मंत्र को लागू करने की जरूरत है। पाकिस्तान में इस मंत्र को लागू करना आसान है चूंकि वहां की जनता सरकार से उत्पीडि़त है। जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर चुनिंदा परिवारों के शिकंजे को तोड़ दिया था। उन्होंने जमींदारी प्रथा को समाप्त किया। ग्रामीण क्षेत्रों में जमींदारों के पास सैकड़ों एकड़ जमीन को अधिग्रहीत करके आम आदमी को वितरित किया। इससे राजाओं एवं जमींदारों की कमर टूट गई। साथ-साथ उन्होंने प्रमुख औद्योगिक परिवारों पर भी निशाना साधा। उन्होंने अर्थव्यवस्था की बागडोर को सार्वजनिक इकाइयों के सुपुर्द किया। इन दो कदमों के कारण देश की जनता पर बड़े लोगों का वर्चस्व टूट गया। देश के किसान और उद्यमी को खुली हवा में फलने- फूलने का अवसर मिला।
पाकिस्तान में ऐसा नहीं हुआ। वहां ग्रामीण क्षेत्रों में जमींदारी प्रथा बरकरार रही। औद्योगिक जगत पर मुट्ठी भर चुनिंदा परिवारों का वर्चस्व बना रहा। राजनीतिक पार्टियों में इन जमींदारी एवं उद्यमी परिवारों का वर्चस्व स्थापित हो गया। फलस्वरूप आम आदमी दबाव में रहा। पूर्व में इंग्लैंड के राजा और ईस्ट इंडिया कंपनी का बोलबाला था। स्वतंत्र पाकिस्तान में चुनिंदा जमींदारी एवं उद्यमी परिवारों का बोलबाला स्थापित हो गया।  जनता पूर्ववत पिसती रही।
जनता का ध्यान बंटाने के लिए इस सत्तारूढ़ गठबंधन ने कश्मीर मुद्दे को उठाया। इस कार्य के सम्पादन में गठबंधन में तीसरे सदस्य के रूप में सेना जुड़ गई। कश्मीर के मुद्दे की आड़ में सेना को प्रभुत्व एवं धन दोनों हासिल हुए। जनता का ध्यान चुनिंदा परिवारों के वर्चस्व से हो रहे उत्पीडऩ से हट गया। बल्कि इन्हीं परिवारों के सहयोग से जनता ने कश्मीर को हासिल करना चाहा। इन जमींदारों, उद्यमियों एवं सेना के गठबंधन को पाकिस्तान की राजनीतिक पार्टियां पोसती रहीं।
बीते दो दशक में अफगानिस्तान में तालिबान के उभरने से इस गठबंधन को एक और अवसर प्राप्त हुआ। अमेरिका के निशाने पर अलकायदा एवं तालिबान थे। अपने इस मुहिम में अमेरिका ने पाकिस्तान का सहयोग चाहा।  इस सहयोग के एवज में अमेरिका ने पाकिस्तान को भारी मात्रा में सैन्य मदद दी जिससे पाक सेना संतुष्ट हुई। साथ-साथ अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने पाकिस्तान के प्रमुख उद्यमी परिवारों से समझौते किए। इससे ये परिवार संतुष्ट हुए। अफगानिस्तान की आड़ में पाकिस्तान के सत्तारूढ़ गठबंधन में चौथे सदस्य के रूप में अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां जुड़ गई। पाकिस्तान की जनता पूर्ववत दबी रही। असमानता एवं आर्थिक विकास के मुद्दे पर्दे के पीछे पड़े रहे। सामने कश्मीर का मुद्दा छाया रहा। जनता जिहादियों के साथ खड़ी हो गई और भारत को अपना दुश्मन मानने लगी।
इस परिस्थिति में भारत पाकिस्तान पर दबाव बना रहा है कि वह जिहादियों के विरूद्ध कारगर कार्रवाई करे। पाकिस्तान के सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए ऐसा करना संभव नहीं है। जनता का ध्यान समाज में व्याप्त असमानता से हटाने में जिहादियों की अहं भूमिका है। पाकिस्तान सरकार यदि जिहादियों के विरूद्ध कार्रवाई करेगी तो जनता का ध्यान चुनिंदा परिवारों के वर्चस्व पर जाएगा और सत्तारूढ़ गठबंधन की नींव हिलने लगेगी। इसलिए कश्मीर और जिहादी संगठनों को छोडऩा सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए संभव नहीं है।
इस परिस्थिति में हम कौटिल्य के मंत्र को अपना सकते हैं। वर्तमान परिस्थिति में पाकिस्तान के जमींदार, उद्यमी परिवार तथा सेना सभी संतुष्ट हैं। असंतुष्ट केवल वहां की जनता है। अत: हमें पाकिस्तान की जनता को अपने साथ लेना चाहिए। इस कार्य में गैरसरकारी संगठन हमारे सहायक हो सकते हंै। भारत को चाहिए कि अंतरर्राष्ट्रीय डोनरों को भारी रकम उपलब्ध कराए। इनके माध्यम से इस रकम को पाकिस्तानी गैरसरकारी संगठनों तक पहुंचाए। गैरसरकारी संगठनों को कहा जाए कि वे आम आदमी के सामाजिक एवं आर्थिक अधिकारों की बात उठाएं। जैसे भूमि सुधार की मांग उठाएं तो सत्तारूढ़ गठबंधन का जमींदारों का हिस्सा कमजोर पड़ेगा। आर्थिक अवसरों पर चुनिंदा परिवारों के कब्जे के मुद्दे को उठाएं तो सत्तारूढ़ गठबंधन का उद्यमियों का हिस्सा कमजोर पड़ेगा। तब पाकिस्तान सरकार का ध्यान घरेलू विषयों पर जाएगा और कश्मीर तथा जिहादियों को पोसते रहना उनके लिए जरूरी नहीं रह जाएगा।
पाकिस्तान में अमेरिका की भूमिका जटिल है। मेरी समझ से पाकिस्तान का आम आदमी अमेरिका को नकारात्मक दृष्टि से देखता है। वह अमेरिकी सरकार को पाक सेना का समर्थक एवं अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को चुनिंदा उद्यमी परिवारों के समर्थक के रूप में देखती है। अमेरिका को इस नकारात्मक छवि की काट करने के लिए सत्तारूढ़ गठबंधन चीन से हाथ मिलाने को आतुर है। चीन भी भारत के विरोध में पाकिस्तान का साथ दे रहा है। पाकिस्तान की जनता अमेरिका को दुश्मन एवं चीन को दोस्त के रूप में देखती है। इसके विपरीत भारत में अमेरिका को दोस्त एवं चीन को दुश्मन के रूप में देखा जाता है। पाकिस्तान और भारत की जनता का मन इस कारण नहीं मिल पाता है। पाकिस्तान की जनता के लिए उनके मित्र चीन का शत्रु भारत, पाकिस्तान का शत्रु है तथा उनके शत्रु अमेरिका का मित्र भारत, पुन: उनका शत्रु है। इसलिए पाकिस्तान की जनता को भारत के पक्ष में मोडऩा कठिन है।
हमें चीन तथा अमेरिका के प्रति अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करना चाहिए। दोनों की दोस्ती के लाभ हानि का ठंडे दिमाग से आकलन करना चाहिए। मेरी समझ से अमेरिका की दोस्ती लाभप्रद नहीं है। चीन का उदाहरण हमारे सामने है। अमेरिका का राजनायिक विरोध करते रहने के बावजूद चीन ने आधुतिकतम औद्योगिक तकनीकों को अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों से हासिल कर लिया है। साथ-साथ आधुनिक सैन्य तकनीकों का स्वयं विकास कर लिया है। अत: हम यदि अमेरिका को छोड़ दें तो आसमान टूट कर गिरने वाला नहीं है। बल्कि भारत तथा चीन के गठबंधन के सामने अमेरिका ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व थरथर कांपेगा। हम चीन से दोस्ती करेंगे तो पाकिस्तान की जनता भी हमारे साथ आ सकती है।
मूल बात है कि भारत एवं पाकिस्तान के बीच उपलब्ध गतिरोध का कारण पाकिस्तान के जमींदारों, उद्यमी परिवारों एवं सेना का गठबंधन है। इस गठबंधन ने जिहादियों एवं कश्मीर के मुद्दे को भडक़ा रखा है। इस गठबंधन को तोड़े बिना पाकिस्तान के साथ सामान्य संबंध बनाना संभव नहीं है। इस गठबंधन को तोडऩे का छिद्र उनके द्वारा लागू की जा रही जनविरोधी नीतियां हंै। अत: हमें पाकिस्तान की जनता को सत्तारूढ़ गठबंधन के विरूद्ध खड़ा करना होगा। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय डोनरों के माध्यम से पाकिस्तान के गैरसरकारी संगठनों को मदद पहुंचानी चाहिए। साथ-साथ चीन से मैत्री करनी चाहिए। पाकिस्तान की जनता चीन को अपना मित्र समझती है। हम भी चीन से मैत्री कर लें तो पाकिस्तान, भारत और चीन का गठबंधन बनाकर शेष विश्व से जीत सकते हैं।


 

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