डॉ. अमर्त्य सेन डाक्यूमेंट्री और सेंसर बोर्ड

डॉ. सेन के शब्दों पर प्रतिबंध लगाने का अर्थ सम्पूर्ण देश की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रतिबंध लगाने के समान है...

डॉ. अमर्त्य सेन डाक्यूमेंट्री और सेंसर बोर्ड
Amartya Sen
एल.एस. हरदेनिया

डॉ. सेन के शब्दों पर प्रतिबंध लगाने का अर्थ सम्पूर्ण देश की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रतिबंध लगाने के समान है। डॉ. सेन को अपनी बात कहने से इसलिए रोका जा रहा है क्योंकि वे दक्षिणपंथी विचारधारा के घोर विरोधी हैं और समय-समय पर इस तरह की प्रवृत्तियों के विरूद्ध आवाज उठाते रहे हैं।

अभी हाल में पश्चिम बंगाल में हुए साम्प्रदायिक घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इस घटनाक्रम के पीछे भाजपा का हाथ है, जो पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल करना चाहती है। सेन ने कहा कि यह साफ है कि हिन्दू-मुसलमानों के बीच हुए तनाव का पूरा लाभ भारतीय जनता पार्टी उठाती है क्योंकि इस तरह का तनाव उसे चुनाव जीतने में मदद करता है।

द्वितीय महायुद्ध प्रारंभ होने वाला था। इसी बीच ब्रिटेन के महान साहित्यकार जार्ज बर्नार्ड शॉ ने एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने यह सुझाव दिया कि ब्रिटेन को युद्ध रोकने के हर संभव प्रयास करना चाहिए और विभिन्न देशों के बीच जो भी समस्याएं हैं, उनके शांतिपूर्ण हल का रास्ता निकालना चाहिए।

जार्ज बर्नार्ड शॉ ने यह लेख 'द न्यू स्टेट्समेन’ नामक समाचारपत्र में छपने के लिए भेजा। परंतु 'न्यू स्टेट्समेन’ ने इस लेख को छापने में असमर्थता व्यक्त की। समाचारपत्र के संपादक का कहना था कि यदि यह लेख छापा जाता है तो देश की सेना और नागरिकों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

जार्ज बर्नार्ड शॉ इस समाचारपत्र के संचालक मंडल के सदस्य थे इसके बावजूद भी उनका लेख नहीं छापा गया। इस पर बर्नार्ड शा ने 'न्यू स्टेट्समेन’ के संपादक को सुझाव दिया कि वे इस लेख के संबंध में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विन्सटन चर्चिल की राय ले लें।

तदानुसार चर्चिल की राय के लिए यह लेख भेजा गया। चर्चिल ने लेख पढऩे के बाद 'न्यू स्टेट्समेन’ के संपादक को कहा कि यदि जार्ज बर्नार्ड शॉ के विचारों के प्रकाशन पर एक मिनट के लिए भी प्रतिबंध लगाया जाता है तो यह हमारे लोकतांत्रिक देश के लिए शर्म की बात होगी। 

इसी तरह का एक शर्मनाक फैसला हमारे देश में लिया गया है। नोबल पुरस्कार से पुरस्कृत महान लेखक और चिंतक डॉ. अमर्त्य सेन के बारे में एक डाक्यूमेंट्री तैयार हुई है। इस डाक्यूमेंट्री में डॉ. अमर्त्य सेन और कौशिक बसु के बीच लंबा वार्तालाप दिखाया गया है। कौशिक बसु स्वयं एक बड़े अर्थशास्त्री हैं और डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में वे भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार भी रहे थे। इस डाक्यूमेंट्री के प्रदर्शन के लिए सेन्ट्रल बोर्ड फॉर फिल्म सर्टिफिकेशन से अनुमति मांगी गई।

अनुमति देने के पूर्व बोर्ड की तरफ से यह सुझाव आया कि डाक्यूमेंट्री में से 'गाय’, 'गुजरात’, 'हिन्दू इंडिया’ और 'हिन्दुत्व व्यू ऑफ इंडिया’ शब्द हटा दिए जाएं। ये अत्यधिक निंदनीय कदम था। इसका पूरे देश में विरोध किया जा रहा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध का इससे घटिया उदाहरण नहीं हो सकता।


देश के अनेक कलाकारों, चिंतकों व साहित्यकारों ने बोर्ड के इस रवैये की अत्यधिक सख्त शब्दों में निंदा की है। डॉ. सेन उन विद्वानों में से हैं, जिनकी बात सारी दुनिया में सुनी जाती है। वे दुनिया के अनेक विश्वविद्यालयों में शिक्षक रहे हैं और आज भी हैं। डॉ. सेन के शब्दों पर प्रतिबंध लगाने का अर्थ सम्पूर्ण देश की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रतिबंध लगाने के समान है।

डॉ. सेन को अपनी बात कहने से इसलिए रोका जा रहा है क्योंकि वे दक्षिणपंथी विचारधारा के घोर विरोधी हैं और समय-समय पर इस तरह की प्रवृत्तियों के विरूद्ध आवाज उठाते रहे हैं। अभी हाल में पश्चिम बंगाल में हुए साम्प्रदायिक घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इस घटनाक्रम के पीछे भाजपा का हाथ है, जो पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल करना चाहती है। सेन ने कहा कि यह साफ है कि हिन्दू-मुसलमानों के बीच हुए तनाव का पूरा लाभ भारतीय जनता पार्टी उठाती है क्योंकि इस तरह का तनाव उसे चुनाव जीतने में मदद करता है।

इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर भी चिंता प्रकट की कि बंगाल में जिस प्रकार से मुसलमानों का तुष्टिकरण किया जा रहा है उससे अंतत: मुसलमानों का ही नुकसान होगा। ऐसा लगता है कि इस समय भाजपा आक्रामक रवैया अपनाकर उन राज्यों में सत्ता पर कब्जा करना चाहती है जहां अभी उसका राज नहीं है। बंगाल भी इसी तरह के राज्यों में से एक है। स्पष्ट है कि भाजपा को डॉ. सेन के इन तरह के कथन अच्छे नहीं लगते हैं। यही कारण है कि शायद सत्ताधारी दल के इशारे पर सेन्ट्रल बोर्ड फॉर फिल्म सर्टिफिकेशन ने डॉ. सेन पर बनी डाक्यूमेंट्री के प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी। 

वैसे हमारे देश में यह पहली बार नहीं हुआ है जब किसी प्रसिद्ध लेखक के विचारों पर प्रतिबंध लगाया गया हो। बरसों पहले अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त उपन्यासकार सलमान रुश्दी की किताब पर भी प्रतिबंध लगाया गया था क्योंकि उनके उपन्यास में कुछ ऐसी बातें थीं जो दकियानूसी मुसलमानों को पसंद नहीं थीं।

न सिर्फ सलमान रुश्दी की किताब पर प्रतिबंध लगाया गया वरन उन्हें हमारे देश में होने वाले आयोजनों में बोलने भी नहीं दिया गया। इसी तरह, मुसलमानों के एक वर्ग को प्रसन्न करने के पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने तसलीमा नसरीन को कोलकाता में रहने की इजाजत नहीं दी थी। इसके पहले भी हमारे देश में गजानन माधव मुक्तिबोध की एक किताब को प्रतिबंधित कर दिया गया था।

जिन सलमान रुश्दी की किताबों को प्रतिबंधित किया गया था उन्हीं को ब्रिटेन की सरकार ने अपने देश में रहने की इजाजत दी थी। उस समय वहां की प्रधानमंत्री श्रीमती थेचर थीं, जो स्वयं एक दक्षिणपंथी राजनीतिज्ञ मानी जाती थीं। उन्होंने सलमान रुश्दी को शरण देते हुए कहा था कि मेरे देश में रहते हुए यदि रुश्दी के खून की एक बंूद भी बहती है तो यह मेरे देश के प्रजातंत्र के लिए शर्म की बात होगी। 

विचारों पर प्रतिबंध लगाना एक परिपक्व लोकतांत्रिक देश के हित में नहीं होता है। हां, ऐसे विचारों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है जो सांप्रदायिक तनाव फैला सकते हैं, जो धर्मों के विरुद्ध नफरत फैलाते हैं या जो हिंसक क्रांति का आह्वान करते हैं। हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दावा करते हैं और इसलिए हमें सेन जैसे महान चिंतक के विचारों पर प्रतिबंध लगाने का नैतिक अधिकार कतई नहीं है।
 (लेखक वरिष्ठ पत्रकार व धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हैं) 

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