खुलासों के बावजूद नोटबंदी से जुड़े अनेक सवाल अनुत्तरित

डॉ. हनुमन्त यादव वित्त मंत्रालय के दिग्गज अधिकारी राजस्व सचिव हसमुख अधिया एवं आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास अपने सहयोगियों के साथ केवी थॉमस की अगुवाई वाली संसदीय लोक लेखा समिति की बैठक में गत ...

डॉ. हनुमंत यादव

डॉ. हनुमन्त यादव
वित्त मंत्रालय के दिग्गज अधिकारी राजस्व सचिव हसमुख अधिया एवं आर्थिक मामलों के सचिव  शक्तिकांत दास अपने सहयोगियों के साथ केवी थॉमस की अगुवाई वाली  संसदीय लोक लेखा समिति की बैठक में गत 11 फरवरी को  हाजिर हुए तथा समिति के सवालों के जवाब दिए। इन अधिकारियों ने समिति को बताया कि नोटबंदी के फलस्वरूप जाली नोटों की तस्करी पूरी तरह रुक गई है। नोटबंदी की उपलब्धियां गिनाते हुए इन अधिकारियों ने यह बताया कि भारत में 15 लाख रजिस्टर्ड कम्पनियां हैं जिनमें से केवल 6 लाख कम्पनियां ही विभाग को आयकर रिटर्न दाखिल कर रही हैं। इसका मतलब यह हुआ कि 60 फीसदी रजिस्टर्ड कम्पनियां आयकर का भुगतान करना तो दूर की बात है वे आयकर रिटर्न  भी आयकर विभाग को दाखिल नहीं कर रही हैं।
12 फरवरी को मध्यप्रदेश  प्रवास के दौरान मुझे दिन में 2 घंटे बस यात्रा तथा 7 घंटे रेल यात्रा करनी पड़ी। रेलवे प्रतीक्षालय, रेलवे कोच एवं बस में यात्रीगण बड़े अचरज से इस बात पर चर्चा कर रहे थे कि नोटबंदी के बाद 2017 में सरकार के आयकर विभाग, प्रवर्तन निर्देशालय, वित्त मंत्रालय सभी को यह जानकारी हो पाई कि 15 लाख कम्पनियों में से केवल 6 लाख आयकर भर रही हैं। व्यक्तिगत कर वसूली के संबंध में कुछ यात्रियों का कहना था कि नौकरी पेशा व्यक्ति के मासिक वेतन भुगतान के समय ही नियोक्ता स्रोत पर आयकर की कटौती कर लेते हैं जबकि 9 लाख रजिस्टर्ड कम्पनियां आयकर भुगतान करना तो दूर की बात है आयकर रिटर्न तक नहीं भरती है।  इसका मतलब यह भी हुआ कि वे अपने कर्मचारियों के वेतन में से आयकर की  कटौती करके आयकर विभाग को भुगतान भी नहीं करती होंगी।  इस प्रकार कारपोरेट सेक्टर में काला धन के प्रचलन के लिए सरकार स्वयं जिम्मेदार है। लोगों का कहना था कि यदि नोटबंदी नहीं की जाती तो संभवत: सरकार इस जानकारी से वंचित रहती एवं संसदीय समिति की संज्ञान में भी नहीं लाती।
11 फरवरी को ही रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने पत्रकारों को बताया कि 500 रुपए एवं 1000 रुपए के वापस किए जाने वाले नोटों की गिनती का काम चल रहा है इसलिए उसमें से कितना बेहिसाबी नोट या काला धन है  यह बताना संभव नहीं है।  वित्त मंत्रालय के  वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार नोटबंदी के बाद आयकर विभाग ने 10 जनवरी 2017 तक जो 515 करोड़ रुपए की नकदी जब्त की थी उसमें से 114 करोड़ के 2000 रुपए तथा 500 रुपए के नए नोट थे। प्रधानमंत्री व वित्तमंत्री द्वारा द्वारा नोटबंदी के बाद अघोषित आय या काला धन उजागर होने की जो उपलब्धियां गिनाई जा रही हैं वे वस्तुत:  प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों के सघन छापों  से उजागर हुई हैं। नोटबंदी और आयकर विभाग के छापे दो अलग-अलग कार्रवाईयां हैं । 15 लाख रजिस्टर्ड कम्पनियों में से 6 लाख द्वारा आयकर रिटर्न भरने की जानकारी मिलने का श्रेय नोटबंदी को देना नितान्त गलत है । यह तो वित्त विभाग के अधिकारियों की अकर्मण्यता का प्रतीक है कि वे इस कम्प्यूटर एवं सूचना प्रौद्योगिकी के आधुनिक युग में इस बात से अंजान रहे कि 9 लाख रजिस्टर्ड कम्पनियां आयकर रिटर्न नहीं दाखिल कर रही हैं। इसके लिए न केवल वर्तमान वित्तमंत्री बल्कि पूर्व वित्तमंत्री लोग भी जवाबदेह होने चाहिए।
20 जनवरी को  रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल द्वारा संसद की लोक लेखा समिति को दी गई जानकारी से एक बात साफ हो गई है कि नोटबंदी का प्रस्ताव रिजर्व बैंक का नहीं, बल्कि सरकार का था जो  जनवरी 2016 से नोटबंदी पर रिजर्व बैंक से चर्चा कर रही थी किन्तु वह पूर्व गवर्नर रघुराम राजन को नोटबंदी के लिए राजी नहीं कर पाई थी इसलिए नोटबंदी नहीं की जा सकी। यह बात भी साफ हो गई है कि सरकार द्वारा रिजर्व बैंक को 7 नवम्बर को इस संबंध में एक टीप सहमति हेतु भेजी गई थी जिसके प्रत्युत्तर में रिजर्व बैंक ने 8 नवम्बर को संध्या 5.30 बजे संचालक मंडल की आपात बैठक आमंत्रित करके सहमति भेज दी। यह बात भी साफ हो चुकी है कि नोटबंदी की वजह से बाजार में होने वाली नकदी की कमी की पूर्ति के लिए कोई योजना न होने से रिजर्व बैंक समुचित व्यवस्था करने में असफल रही। जिस तरह से पुलिस द्वारा संदेह के आधार पर कुछ लोगों के पास से लाखों रुपये के नए नोट  बरामद किए गए उससे पता चलता है कि आम जनता को भले ही नोटबंदी से तकलीफ हुई हो नकदी के रूप में काला धन रखने वालों को पुराने नोटों के बदले नए नोट मिल चुके थे।
8 नवम्बर को नोटबंदी की घोषणा के बाद 9 नवम्बर को जिस प्रकार से अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों एवं भारत के बड़े कारपोरेट सेक्टर ने सरकार को इसके लिए बधाइयां दीं उससे संदेह होना स्वाभाविक है कि जिस प्रकार से बाहरी दबाव में आकर संसद को विश्वास में लिए बिना भारत का योजना आयोग भंग किया गया उसी प्रकार नोटबंदी भी बाहरी इशारे पर की गई। सवाल उठता है कि नोटबंदी बिना तैयारी के हड़बड़ी में क्यों की गई?  इस संबंध में केवल एक ही बात दिखाई देती है वह यह कि उत्तरप्रदेश की चुनावी राजनीति मुख्य कारक है।  पिछले तीन माह से एक ही बात चर्चा में है कि सरकारी सूचनातंत्र से प्रधानमंत्री को प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने विधानसभा चुनाव हेतु भारी मात्रा में नकदी जमा कर रखी है उसी को देखते हुए सरकार चुनाव घोषणा होने के कम से कम दो महीने में पहले दोनों पार्टियों की चुनाव हेतु एकत्रित नकदी को रद्दी कागज में बदलने के लिए जल्दबाजी में नोटबंदी  की।  यह एक अलग बात है कि उत्तरप्रदेश में दोनों ही पार्टियां जिस तरह से धन खर्च कर रही हैं उससे लगता नहीं है कि नोटबंदी से उनका चुनाव प्रभावित हुआ है।
दुनिया के अधिकांश देशों में डिजिटल ऑनलाइन भुगतान व लेेनदेन की लोकप्रियता इसकी खूबियों के कारण बढ़ी है उसके लिए किसी सरकारी प्रलोभन व दबाव का सहारा नहीं लेना पड़ा। भारत में भी स्टेट बैंक की ग्रामीण शाखाओं से भी ऑनलाइन भुगतान में बढ़ोतरी हो रही है। किन्तु भारत सरकार 8 नवम्बर के बाद से नोटबंदी का सहारा लेकर डिजिटल भुगतान के लिए एक प्रकार का मनोवैज्ञानिक दबाव डाल रही है। नोटबंदी से जनता की तकलीफों की ओर ध्यान आकर्षित करने वाले विरोधी दलों को सरकार द्वारा कालाधन समर्थक करार कर दिया जाता है। भारत सरकार द्वारा हड़बड़ी में की गई नोटबंदी तथा डिजिटल भुगतान प्रचार का प्रत्यक्ष रूप से फायदा पेटीएम, वन-97 तथा अली ग्रुप चीनी कम्पनी को हुआ है इसलिए अब विरोधियों ने कहना प्रारम्भ कर दिया है कि सरकार ने   पेटीएम व वन-97 को व्यवसायिक फायदा पहुंचाने के लिए नोटबंदी की है।


 

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