वैचारिक पराजय का प्रदर्शन

पिछले सालों में स्वतंत्रचेता लेखकों, कलाकारों और पत्रकारों के जीवन को खतरे लगातार बढ़ते गये हैं, जबकि उनके हत्यारों को कानून के हवाले करने के काम में कोई मुस्तैदी नहीं दिख रही...

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वैचारिक पराजय का प्रदर्शन
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-  कृष्ण प्रताप सिंह 

पिछले सालों में स्वतंत्रचेता लेखकों, कलाकारों और पत्रकारों के जीवन को खतरे लगातार बढ़ते गये हैं, जबकि उनके हत्यारों को कानून के हवाले करने के काम में कोई मुस्तैदी नहीं दिख रही। 13 मई, 2016 को सीवान में पत्रकार राजदेव रंजन की गोली मारकर की गई हत्या की सीबीआई जांच अभी भी किसी परिणति तक नहीं पहुंची है, जबकि उससे पहले मई, 2015 में मध्य प्रदेश में व्यापम घोटाले की कवरेज करने गये टीवी पत्रकार अक्षय सिंह की झाबुआ के पास मेघनगर में संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत भी अभी रहस्यों के घेरे में ही है। 

नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे और एमएम कलबुर्गी के बाद कर्नाटक से प्रकाशित कन्नड़ साप्ताहिक 'गौरी लंकेश पत्रिके' की दक्षिणपंथ विरोधी संपादक व सामाजिक कार्यकर्ता गौरी लंकेश को भी अपने शाब्दिक अभिव्यक्तियों व सक्रियताओं की कीमत जान देकर चुकानी पड़ी है, तो उन महानुभावों को अचानक सांप-सा सूंघ गया है, जो सितम्बर, 2015 में कई वरिष्ठ साहित्यकारों द्वारा ऐसी हत्याओं को नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा पाली-पोसी जा रही कट्टरताओं व असहिष्णुताओं का नतीजा बताकर शुरू किये गये पुरस्कार वापसी के सिलसिले के बाद से ही 'हाथ कंगन को आरसी' मांगते और कहते आ रहे थे कि उन्हें तो ऐसी कट्टरताएं और असहिष्णुताएं कहीं दिखाई नहीं देतीं। 

अब, जब इन कट्टरताओं व असहिष्णुताओं ने अपना मुंह बड़ा करने के लिए एक बार फिर देश की सबसे पुरानी पार्टी द्वारा शासित उस राज्य को ही चुना है, जिसके आगे आ रहे विधानसभा चुनाव में दक्षिणपंथी शक्तियां अपने सारे अरमान एक साथ निकालने की उतावली में हैं, और गौरी लंकेश द्वारा इस 'सबसे तेज बढ़ती जमात' की आलोचना को ही उनकी हत्या का सबब बना दिया है तो चूंकि बड़ी से भी बड़ी बेशर्मी की भी एक हद होती ही है, सांप का यह सूंघना लाजिमी है। लेकिन आश्चर्य नहीं होना चाहिए, अगर ये महानुभाव जल्दी ही पल्टी मारकर पहले से कहीं ज्यादा 'मुखर' होकर गौरी के हत्यारों की कारस्तानी को सही ठहराने पर तुल जायें। आखिरकार वे दंगों और नरसंहारों तक का औचित्य सिद्ध करने वाले लोग हैं। अकारण नहीं कि इस हत्या के शक की सुई माओवादियों की ओर घुमा देने के फेर में हैं और इस तथ्य की अनदेखी चाहते हैं कि गौरी इन दिनों किन शक्तियों के निशाने पर थीं और कैसे वे उन्हें खामोश कराकर लाभ की उम्मीद कर रही थीं?  

प्रसंगवश, 1962 में जन्मीं गौरी अपने दक्षिणपंथविरोधी विचारों को खुले तौर पर और निर्भीकतापूर्वक प्रकट करती रहती थीं। एक मित्र ने इसके खतरे गिनाते हुए उन्हें किंचित सावधान रहने की सलाह दी थी तो उन्होंने उन्हें यह कहकर टाल दिया था कि 'अगर हम भी चुप हो गये तो हक बात कौन बोलेगा?' गौरी समाज की मुख्य धारा में लौटने के इच्छुक नक्सलियों के पुनर्वास के लिए भी काम कर चुकी थीं और राज्य में सिटीजंस इनिशिएटिव फॉर पीस के संस्थापकों में थीं। कर्नाटक में उनके साप्ताहिक 'गौरी लंकेश पत्रिकेÓ को व्यवस्थाविरोधी, गरीब व दलित समर्थक प्रकाशन के रूप में जाना जाता है।

उनके घर में उन्हें जिस जगह उन्हें एक के बाद एक कई गोलियां मारी गयीं, उसके पास की एक इमारत में लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज से हत्यारों की पहचान में जुटी पुलिस भले ही अभी तक हत्यारों को नहीं पहचान पाई है, गौरी लंकेश के बचपन के मित्र और कन्नड़ लेखक के. मुरलीसिडप्पा साफ कहते हैं कि जिन लोगों ने तर्कवादी नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे और एमएम कलबुर्गी को मार डाला, उन्हीं लोगों ने गौरी लंकेश की भी हत्या की है।

यह हत्या इस अर्थ में कहीं ज्यादा दु:खद है कि गौरी ने कभी भी अपने लिए सरकारी सुरक्षा की मांग नहीं की। लेकिन इससे कर्नाटक की कांगे्रसी सरकार के इस अपराध की गम्भीरता कम नहीं हो जाती कि उसने उनके जीवन के खतरों को कम करके आंका, जो अंतत: जानलेवा सिद्ध हुआ। वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने ठीक ही कहा है कि उनकी हत्या जनतंत्र और इंसानियत के खिलाफ है और ऐसी हत्याओं का सिलसिला तब तक शायद ही रुके, जब तक कलबुर्गी, पानसरे और दाभोलकर जैसी विभूतियों के हत्यारों को उनके अंजाम तक नहीं पहुंचाया जाता। लेकिन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ट्वीट कर गौरी की हत्या पर दुख जताते हुए कहते हैं कि सच्चाई को कभी खामोश नहीं किया जा सकता, गौरी हमारे दिलों में जिंदा हैं, मेरी संवेदना और स्नेह उनके परिवार के साथ है और दोषियों को सजा होगी तो संदेह होता है कि वे इस बात को समझते भी हैं या नहीं कि इन दोषियों में उनकी पार्टी की कर्नाटक सरकार भी शामिल है, जो गौरी के जीने के अधिकार की रक्षा नहीें कर सकी। 


इस सरकार का कुसूर इस तथ्य की रौशनी में भी कम होने के बजाय बढ़ता ही है कि पिछले सालों में स्वतंत्रचेता लेखकों, कलाकारों और पत्रकारों के जीवन को खतरे लगातार बढ़ते गये हैं, जबकि उनके हत्यारों को कानून के हवाले करने के काम में कोई मुस्तैदी नहीं दिख रही। 13 मई, 2016 को सीवान में पत्रकार राजदेव रंजन की गोली मारकर की गई हत्या की सीबीआई जांच अभी भी किसी परिणति तक नहीं पहुंची है, जबकि उससे पहले मई, 2015 में मध्य प्रदेश में व्यापम घोटाले की कवरेज करने गये टीवी पत्रकार अक्षय सिंह की झाबुआ के पास मेघनगर में संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत भी अभी रहस्यों के घेरे में ही है। 

जून, 2015 में मध्य प्रदेश के ही बालाघाट जिले में अपहृत पत्रकार संदीप कोठारी को जिंदा जला दिया गया था और उनका शव महाराष्ट्र में वर्धा के करीब स्थित एक खेत में पाया गया था। 2015 में ही उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में पत्रकार जगेंद्र सिंह को जिंदा जला दिया गया था क्योंकि उन्होंने फेसबुक पर एक मंत्री के खिलाफ खबरें लिखी थीं। आंध्रप्रदेश में तेल माफिया ने 2014 में 26 नवम्बर को वरिष्ठ पत्रकार एमवीएन शंकर की हत्या करा दी, तो छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले में सांई रेड्डी की संदिग्ध हथियारबंद लोगों ने हत्या कर दी थी। रीवा में मार दिये गये पत्रकार राजेश का कसूर तो सिर्फ इतना था कि वे स्थानीय स्कूल में हो रही धांधली की कवरेज कर रहे थे।

इस सबके बावजूद जिन्हें बढ़ती कट्टरताएं व असहिष्णुताएं नहीं दिखतीं, उनके लिए फिलहाल यही कहा जा सकता है कि वे किसी हरे-भरे सावन में अपनी नेत्र ज्योति गंवा आये हैं। इसीलिए उस महादुर्घटना को नहीं देख पा रहे, जिसके बाद असहिष्णुताओं को ही सहिष्णुता की तरह परिभाषित कर देश का मौसम बना देने का मन्सूबा रखने वाली शक्तियां परिदृश्य को इतना विकट बनाने में सफल हो गई हैं कि प्रतिरोधी रचनाकर्मों के लिए सांस लेना दूभर हो  गया है।

इस महादुर्घटना के बीच कवि हरीशचंद्र पांडे की एक कविता याद आती है: ट्रक के नीचे आ गया एक आदमी/वह अपने बायें चल रहा था/एक लटका पाया गया/कमरे के पंखे पर होटल में/वह कहीं बाहर से आया था/एक नहीं रहा बिजली का नंगा तार छू जाने से/एक औरत नहीं रही/ अपने खेत में अपने को बचाते हुए/एक नहीं रहा डकैतों से अपना घर बचाते हुए/ये कल की तारीख में/लोगों के मारे जाने के समाचार नहीं/कल की तारीख में मेरे बचकर निकल जाने के समाचार हैं।

आगे चलकर इन  'बचकर निकल जाने' के समाचारों का भी टोंटा न पड़ जाये इसके लिए यह समझने का निश्चित रूप से यही सबसे उपयुक्त समय है कि विचारों का जवाब विचार हुआ करते हैं, हत्याएं और खूंरेजी नहीं। इस तथ्य से अवगत होने के बावजूद जो शक्तियां कायरतापूर्वक अपने प्रतिरोधी या विरोधी विचार रखने वालों की जान ले रही हैं, वे सिर्फ और सिर्फ अपनी वैचारिक पराजय का प्रदर्शन कर रही हैं। गौरतलब है कि उनकी यह पराजय इस स्थिति के बावजूद है कि उनके सिपहसालारों ने देश की सत्ता के साथ शीर्ष संवैधानिक पदों पर भी कब्जा कर रखा है। क्या पता, उनकी यह पराजय अभी उन्हें कितना और नीचे गिरायेगी!
 

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