जानलेवा होती शिक्षा

यह दुखद ही है कि हमारी व्यवस्था ने बहुत चालाकी से हम सबका ध्यान शिक्षा की विषयवस्तु से हटाकर विद्यार्थियों की भौतिक या शारीरिक सुरक्षा पर केन्द्रित करा दिया है...

जानलेवा होती शिक्षा
Deadly education
चिन्मय मिश्र

यह दुखद ही है कि हमारी व्यवस्था ने बहुत चालाकी से हम सबका ध्यान शिक्षा की विषयवस्तु से हटाकर विद्यार्थियों की भौतिक या शारीरिक सुरक्षा पर केन्द्रित करा दिया है। यह भी अनिवार्य है,परंतु बालक/बालिका का विद्यालय जाने का निमित शिक्षा ग्रहण करना है और उस पर पालकगण न के बराबर बात करते हैं। लाखों रुपए सालाना फीस के बदले वे एक फलहीन शिक्षा की वकालत करते नजर आ रहे हैं। दूसरी ओर हमारी नई शासन व्यवस्था ने तो जैसे भारत को आदिम अवस्था में ले जाने की ठान सी ली है। शिक्षा उनके लिए सबसे मुफीद है जिसे वे अपने हित में ढाल देना चाहते हैं। इसलिए किसी भी तरह की कोई वैज्ञानिक सोच का अभाव अब साफ नजर आ रहा है। दिल्ली पब्लिक स्कूल की बस में मारे गए चार मासूम बच्चे सिर्फ हमारी लापरवाही का प्रतीक नहीं है बल्कि प्रतीक है हमारी उस क्रूरता का जो हम अपने बच्चों के साथ कर रहे हैं और पूरी बेशर्मी से यह दोहराते हैं कि हमने अपना सब कुछ उनके बेहतर भविष्य के लिए दांव पर लगा दिया है।


आज भारत का दुर्भाग्य है कि यहां ज्ञान और कर्म के बीच मेलजोल नहीं रहा। काम करने वाले के पास ज्ञान नहीं पहुंचता और जिनका बौद्धिक विकास हुआ है वे काम नहीं करते। इसलिए चिन्तन को बुनियाद नहीं मिलती। ऐसा राहू-केतु का समाज आज है। एक को केवल सिर है, उसको हाथ-पांव नहीं और दूसरे को हाथ-पांव हैं, परन्तु सिर नहीं। ईश्वर की ऐसी योजना होती तो वह सबको सिर और हाथ-पांव दोनों क्यों देता?'

- विनोबा  

मध्यप्रदेश के सबसे बड़े शहर इन्दौर में पिछले दिनों दिल्ली पब्लिक स्कूल की एक बस स्पीड गवर्नर लगा होने के बावजूद अंधाधुंध रफ्तार से दौड़ते हुए 6 लेन वाली सड़क के डिवाइडर को उलांघती हुई दूसरी दिशा से आ रहे एक ट्रक से जा टकराई। बस के परखच्चे उड़ गए। इसमें सवार तमाम बच्चों में से 4 मारे गए। ड्राइवर भी मारा गया। मां-बाप स्कूल को कोस रहे हैं। शासन-प्रशासन को लानत-मलामत भेज रहे हैं। शहर का अतिसंवेदनशील वर्ग हाथों में मोमबत्तियां लेकर हमेशा की तरह तैयार था।

प्रशासन अपनी तरह से सचेत हुआ। वह दुर्घटना के अगले ही दिन स्कूल बसों पर टूट पड़ा और उसने तमाम खामियां उजागर कर दीं। दो-तीन छुटभैये भागीदारों की गिरफ्तारी भी हो गई। ऐसा लगा कि जैसे पुरानी व खटारा बसें स्कूल के प्रबंधन के नहीं वहां के चौकीदार के आदेश पर खरीदी गई हों। अधिकारियों को फिटनेस देने की हेतु कथित रिश्वत स्कूल के चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों ने चंदे से इकट्ठी की है। अयोग्य ड्राइवरों की भर्ती स्कूल के अध्यापकों के आदेश से की जाती है! शोक मनाने मुख्यमंत्री भी आए। राजस्व आयुक्त की आंखों में आंसू आ गए। परिवहन अधिकारी का तबादला हो गया। प्रशासन यानी जिलाधीश एकाएक सजग हुए और उन्होंने शहर भर में आटोरिक्शा व अन्य छोटे वाहनों से बच्चों को लाने ले जाने पर बिना किसी पूर्व सूचना या नई व्यवस्था के रोक लगा दी। तमाम पालक अपने बच्चों को अब खुद स्कूल पहुंचा रहे हैं। प्रशासन को कोस रहे हैं। आटोरिक्शा चालकों ने पूर्ण हड़ताल कर दी है और आम लोग मारे-मारे फिर रहे हैं! आपको लग रहा होगा कि ऐसा क्या है, जो कि उपरोक्त पंक्तियों में नया लिखा गया है।

आप सब एकदम ठीक सोच रहे हैं। परंतु मुद्दा यह है कि इतनी दर्दनाक दुर्घटनाओं के बावजूद स्थितियां लगातार प्रतिकूल बनी हुई हैं। एक मृत विद्यार्थी की मां ने मुख्यमंत्री को चुनौती देते हुए कहा कि इस दिखावे को बंद करिए क्योंकि चार दिन बाद सब कुछ पहले जैसा ही हो जाएगा। और वही हुआ। प्रशासन बजाय विद्यालयों को दिशानिर्देश देने के अल्पसंख्यकों के निवास वाली बस्ती मच्छी बाजार को तोड़ने में जुट गया जबकि उसने सर्वोच्च न्यायालय को आश्वासन दिया था कि वह 11 जनवरी  जिस दिन न्यायालय सुनवाई करेगा, तब तक तोड़-फोड़ नहीं करेगा। परंतु उसने अपने ही कौल का पालन किया। कायदा तो कहता है कि ऐसी लापरवाहीपूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था के चलते दिल्ली पब्लिक स्कूल के प्रधानाध्यापक या जो भी प्रबंधन का सर्वोत्तम जिम्मेदार अधिकारी है, को हिरासत में लेकर पूछताछ होनी थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ और तमाम पालकगण बजाय आर-पार की लड़ाई के समझौतावादी रुख अपनाकर ठंडा व्यवहार कर रहे हैं।


हेनरी जार्ज कहते हैं, 'समाज व्यवस्था में शोर मचाने और चिल्लाने, शिकायत करने और निन्दा करने, पार्टियां बनाने अपना क्रांतियां करने से सुधार नहीं होता, वह होता है भावना की जागृति और विचारों की प्रगति से। जब तक विचार ठीक न होगा, तब तक सही काम नहीं हो सकता और जब विचार ठीक होगा तो काम भी ठीक होगा।ज जबकि आज की वास्तविक समस्या विचारहीनता ही है। बस के स्पीड गवर्नर का काम न करना समस्या नहीं है वह तो प्रशासन की भृकुटि के हिलते ही ठीक हो जाएंगे। समस्या है भृकुटि हिलने के पीछे जिस विचार को उद्वेलित होना चाहिए वह हो पा रहा है या नहीं! राज्य शिक्षा बोर्ड और केंद्रीय शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की आपस में मित्रता नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा है। इसीलिए इस पूरे विवाद में शिक्षा अधिकारियों (राज्य के) का कोई मन्तव्य सामने नहीं आया और सीबीएसई  तो महामहिम हैं। वे तो सभी सवालों से ऊपर हैं।

दूसरी ओर पालकगण तो परमहंस अवस्था में हैं। हमारे जैसे अधिकांश पालक समझ ही नहीं पाते कि हमारा बच्चा पढ़ क्या रहा है और मन ही मन तय कर लेते हैं कि, यदि यह पाठ्यक्रम हम ही नहीं समझ पा रहे हैं तो निश्चित तौर पर यह अनूठा है और हमारे बच्चे के भविष्य के लिए श्रेष्ठ है। यदि बच्चे के पास पढ़ाई के अलावा खेलने का भी वक्त बचता है तो हम मान लेते हैं कि शिक्षा प्रणाली में कुछ खराबी आ गई है। छठी-सातवीं के बच्चे की आत्महत्या भी हमें झकझोर नहीं पाती। चार वर्ष आयु के बच्चे का दिन में दो घंटे बस में सफर हमें विचलित नहीं करता। सारे जमाने का प्रदूषण उसके नाजुक फेफड़ों को कैसे ठोस बना देगा यह बात हमारे दिमाग में ही नहीं आती। एक जुनून सा  हमारे ऊपर सवार हो गया है और हम खुद अपने बच्चों के सबसे बड़े दुश्मन बन गए हैं।

सुबह से शाम तक वर्तमान शिक्षा प्रणाली की बुराई सुनने में आती है, परंतु सुधार की दिशा में उठा एक भी कदम नजर नहीं आता। पश्चिम का अंधानुकरण करने वाला भारती समाज नेबरहुड स्कूल की बात तभी करता है, जबकि कुछ मासूमों की बलि चढ़ जाती है! शाम ढलते-ढलते उसकी आंखों से वह छवि धूमिल हो जाती है और वह पुराने ढर्रे पर आ जाता है और एक नई बस में अपने बच्चे को बैठाकर सावित्री-सत्यवान की कथा सुनने बैठ जाता है। वह समझना ही नहीं चाहता कि समस्या इस शिक्षा प्रणाली के अन्तरतम में बस गई है और इसे बदलना ही होगा क्योंकि अब इसमें सुधार की कोई संभावना ही नहीं बची है। मातृभाषा में शिक्षा की वकालत सभी करते हैं, लेकिन व्यावहारिक तौर पर चाहते हैं कि भगतसिंह उनके यहां नहीं, पड़ोसी के यहां ही पैदा होना चाहिए। महानगरों से लेकर छोटे कस्बों तक मां-बाप अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर भयभीत हैं। उन्होंने सामाजिक, पारिवारिक, सांस्कृतिक समाराहों में भागीदारी सीमित कर दी है। यदि मां-पिता के मन में बच्चों की शिक्षा को लेकर इतना खौफ है तो सोचिए उन्होंने बच्चों को कितना डरा रखा होगा? बच्चों के लिए अब अवकाश की कोई गुंजाइश ही नहीं।

मजेदार तो नहीं, हां यह दुखद ही है कि हमारी व्यवस्था ने बहुत चालाकी से हम सबका ध्यान शिक्षा की विषयवस्तु से हटाकर विद्यार्थियों की भौतिक या शारीरिक सुरक्षा पर केन्द्रित करा दिया है। यह भी अनिवार्य है,परंतु बालक/बालिका का विद्यालय जाने का निमित शिक्षा ग्रहण करना है और उस पर पालकगण न के बराबर बात करते हैं। लाखों रुपए सालाना फीस के बदले वे एक फलहीन शिक्षा की वकालत करते नजर आ रहे हैं। दूसरी ओर हमारी नई शासन व्यवस्था ने तो जैसे भारत को आदिम अवस्था में ले जाने की ठान सी ली है। शिक्षा उनके लिए सबसे मुफीद है जिसे वे अपने हित में ढाल देना चाहते हैं। इसलिए किसी भी तरह की कोई वैज्ञानिक सोच का अभाव अब साफ नजर आ रहा है।

दिल्ली पब्लिक स्कूल की बस में मारे गए चार मासूम बच्चे सिर्फ हमारी लापरवाही का प्रतीक नहीं है बल्कि प्रतीक है हमारी उस क्रूरता का जो हम अपने बच्चों के साथ कर रहे हैं और पूरी बेशर्मी से यह दोहराते हैं कि हमने अपना सब कुछ उनके बेहतर भविष्य के लिए दांव पर लगा दिया है। विचारशून्यता के इस चक्रव्यूह से हम कैसे निकल पाएंगे यह तो समय ही बता पाएगा। परंतु तात्कालिक उपाय के लिए आवश्यक है कि हम कम से कम पड़ोस के विद्यालय (नेबरहुड स्कूल) की दिशा में तो एक कदम बढ़ाएं शायद इसी के बाद कोई रास्ता खुले? गांधीजी की इस बात पर गौर करें, 'शिक्षा की प्रगति में एक चीज रुकावट डालती है। शिक्षक के बिना शिक्षा ली ही नहीं जा सकती, यह वहम समाज की बुद्धि को रोक रहा है।' आप क्या सोचते हैं?

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