दबंगई का नया उदाहरण प्रजापति

ऐसा कहा जाता है कि कानून के हाथ लंबे होते हैं। लेकिन कई बार कानून को अंधा भी कहा जाता है। और अभी उत्तरप्रदेश की पुलिस के हाल देखकर ऐसा प्रतीत होता है ...

देशबन्धु
दबंगई का नया उदाहरण प्रजापति
देशबन्धु

ऐसा कहा जाता है कि कानून के हाथ लंबे होते हैं। लेकिन कई बार कानून को अंधा भी कहा जाता है। और अभी उत्तरप्रदेश की पुलिस के हाल देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो दृष्टिदोष के साथ-साथ उसके हाथ इतने छोटे हो गए हैं कि वह एक गंभीर अपराध के आरोपी को नहींतलाश कर पा रही है। आरोपी कोई मामूली इंसान नहींहै। वह उत्तरप्रदेश सरकार में केबिनेट मंत्री है, चुनाव में समाजवादी पार्टी का प्रत्याशी है. उसे वाई श्रेेणी की सुरक्षा मिली हुई है, यानी सुरक्षाकर्मी उसके इर्द-गिर्द रहते हैं, फिर भी उत्तरप्रदेश की पुलिस तमाम तरह की कोशिशों के बावजूद उसे हाथ तक नहींलगा पाई। गायत्री प्रजापति, यह नाम भारत में कानून के ऊपर दबंगई का नया प्रतीक बन कर उभरा है। यह कोई पहली बार नहींहै कि कानून को धता बताते हुए पैसे, शक्ति या सत्ता का रौब दिखाते हुए कोई आरोपी खुला घूमता रहे या देश से बाहर चला जाए और पुलिस हाथ मलती रह जाए। सुप्रीम कोर्ट अक्सर ऐसे मामलों में चिंता जाहिर करता रहा है। लेकिन स्थिति बदलेगी, ऐसी कोई सूरत नजर नहींआती। गायत्री प्रजापति पर एक महिला के साथ बलात्कार और उसकी नाबालिग लडक़ी के साथ बलात्कार की कोशिश का गंभीर आरोप है। कायदे से ऐसे व्यक्ति का सरकार में कोई स्थान नहींहोना चाहिए। लेकिन मुलायम सिंह और शिवपाल सिंह के करीबी गायत्री प्रजापति को अखिलेश यादव हटा नहींपाए। एक बार कोशिश की, लेकिन फिर न जाने किस मजबूरी में सरकार में वापस लेना पड़ा। इतना ही नहींउसे चुनाव में सपा ने अपना प्रत्याशी भी बनाया और अखिलेश यादव उसके प्रचार के लिए भी गए। मुलायम सिंह से अलग अखिलेश यादव की छवि एक साफ-सुथरे राजनेता की है, उन्होंने पार्टी और सरकार से दागी लोगों को दूर करने की कोशिश भी की है। लेकिन इस कोशिश पर गायत्री प्रजापति जैसे लोगों की मौजूदगी पानी फेर देती है। चाहे जिस तरह की राजनैतिक मजबूरी हो, नैतिकता को प्राथमिकता देते हुए अखिलेश यादव को प्रजापति को अपनी सरकार से और पार्टी से तत्काल बर्खास्त करना चाहिए। अगर अदालत उसे निर्दोष करार दे, तो फिर भले वापस ले लें। फिलहाल तो प्रजापति कानून की नजर में फरार है, इसलिए बलात्कार मामले में दोषी हो न हो, कानून की अवमानना का आरोप तो है ही।
गायत्री प्रजापति के खिलाफ आईजी पुलिस अमिताभ ठाकुर और उनकी एडव्होकेट पत्नी नूतन ठाकुर ने बलात्कार पीडि़ता की ओर से एफआईआर दर्ज करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट में याचिका रद्द हुई तो पीडि़ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां से निर्देश मिलने के बाद अब उत्तरप्रदेश पुलिस गायत्री प्रजापति को गिरफ्तार करने के लिए सक्रिय हुई है। उसके खिलाफ गैर जमानती वारंट निकाला गया है, विदेश भागने की आशंका से पासपोर्ट रद्द कराया गया है, तीन दर्जन से अधिक ठिकानों पर छापेमारी की जा चुकी है, लेकिन गायत्री प्रजापति का कोई सुराग उत्तरप्रदेश पुलिस को नहींमिल पा रहा है। माना जा रहा है कि अब पुलिस उसकी संपत्ति कुर्क करने का आदेश हासिल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट जा सकती है। उत्तरप्रदेश पुलिस को आठ मार्च तक गायत्री प्रजापति की गिरफ्तारी के संबंध में सुप्रीम कोर्ट में जवाब देना है, जबकि खुद प्रजापति के पास पुलिस के समक्ष पेश होने के लिए सोमवार तक का वक्त था। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक तो वह गिरफ्तारी से बचा हुआ है। इधर पीडि़ता ने आरोप लगाया है कि कुरुक्षेत्र में पढ़ाई कर रही उसकी बेटियों को उप्र पुलिस परेशान कर रही है। समाजवादी पार्टी के शासन में कानून-व्यवस्था पर लगातार सवाल खड़े होते रहे हैं, ऐसे में गायत्री प्रजापति का मामला कई गंभीर सवालों को जन्म देता है। अखिलेश यादव ने प्रजापति को आत्मसमर्पण करने की सलाह सार्वजनिक रूप से दी थी, जिसे मानने में प्रजापति की कोई दिलचस्पी नहींदिखी। अब राज्यपाल राम नाईक ने गायत्री प्रजापति के मंत्रिमंडल में बने रहने के औचित्य पर सवाल उठाए हैं, जो सही हैं। कानून पर और पुलिस पर लोगों का भरोसा कायम हो, इसके लिए जरूरी है कि गायत्री प्रजापति जैसे लोगों पर कानूनी शिकंजा कसे।


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