जीत पर हावी होता प्रतिशोध

चिन्मय मिश्र : पिछले दिनों सम्पन्न हुए पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव सामने आए। परिणाम और उसके बाद गठित हुई सरकारों, खासकर गोवा व मणिपुर की नई सरकारों ने स्पष्ट कर दिया है ...

चिन्मय मिश्र

चिन्मय मिश्र
सबने पहना था बड़े शौक से कागज का लिहाफ,
जिस कदर लोग थे बारिश में नहाने वाले।
-कतील शिफाई

पिछले दिनों सम्पन्न हुए पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव सामने आए। परिणाम और उसके बाद गठित हुई सरकारों, खासकर गोवा व मणिपुर की नई सरकारों ने स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय राजनीतिक परिदृश्य से अब राजनीति की बिदाई हो गई है और अब यहां सिर्फ चुनाव का बुलडोजरी आतंक और उसके बाद नेस्तनाबूत नैतिकता पर खड़ी सरकारें ही शोभायमानहोंगी। प्रधानमंत्री ने सन् 2019 के भावी मतदाताओं यानी 12वीं के छात्रों के साथ मेल-जोल बढ़ाने की बात छेड़ दी है। होना तो यही चाहिए था कि इतनी बड़ी जीत के बाद सत्तारूढ़ दल सौजन्यता का प्रदर्शन करें। परन्तु गोवा में जिस तरह से सरकार बनी उससे लगा कि भारतीय जनता पार्टी का अंजाम डर दिन-प्रतिदिन गहराता जा रहा है। मुख्यमंत्री पद के लिए मनोहर पर्रिकर की वापसी भी शर्त और 10 घंटे पहले तक भाजपा को अपशब्द कहने वाले 7 विधायकों को मंत्री बनाकर ऐसी ऐसा मंत्रिमंडल का गठन करना जिसमें 90 प्रतिशत सदस्य चुनाव में विरोधी थे, साफ दर्शा रहा है कि कहीं कुछ है जो भाजपा को बजाय गंभीर व सहृदय बनाने के अधिकार प्रतिशोधात्मक बना रही है।
जनसंख्या के संबंध में प्रश्नों का जवाब देते हुए गांधी जी ने एक बार अपना धंधा ‘राजनीति’ बताया था। इस पर किसी ने कहा कि ‘मगर बापू, राजनीति तो नीति की हद तक एकदम लापरवाह होती है।’ बाद में बापू ने विस्तार से बताया, ‘मैंने अपना धंधा ‘राजनीति’ ठीक ही बताया था।  मैं लोगों के सुख-दुख को सदा सामने रखकर अपने काम करता हूं। सच्ची राजनीति भी लोगों के सुख को बढ़ाने और दुख को कम करने का काम करती है। लोगों के कल्याण को ध्यान में रखकर अपनी गतिविधियों को चलाना पवित्र काम है। मेरे लेखे तो यही धर्म है। अपने परिवेश में प्रेम का विस्तार कैसे करें, यह सिखाना, समझाना राजनीतिज्ञ का काम है।’ उन्होंने आगे कहा था, ‘चोट लगाने वाला खुद भी चोट खाता है और स्वार्थ एक रोग है। वह आत्मा की कमजोरी की निशानी है। जो मन से नीरोग है, वह जानता है कि उसके और पड़ोसियों के हित में कोई अंतर नहीं है। बांग्लादेश को लेकर भारत और पाकिस्तान का युद्ध सन् 1971 में हुआ। इसके बाद हुए चुनाव में इंदिरा गांधी को प्रचंड बहुमत मिला था। उसी के साथ भारत में अधिनायकवाद और भ्रष्टाचार का नया दौर भी प्रारंभ हुआ। सन् 1974 में जयप्रकाश नारायण का आंदोलन शुरू हुआ। सन् 1975 में आपातकाल लगा और सन् 1977 में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई। तब से अब तक पूरी तरह से उभर नहीं पाई है। परन्तु वर्तमान सत्ताधीश उससे सबक लेने की बजाय उसे आदर्श बना रहे हैं। गौरतलब है जयप्रकाश नारायण ने तब कहा था कि ‘हर क्रांति अपनी इबादत खुद लिखती है, समय का चयन करती है और अपने नेता को विकसित भी करती है। इसलिए बहुत हताश होने की बात भी नहीं है, सिर्फ लगातार प्रयत्नशील बने रहना होगा।’
प्रसिद्ध दार्शनिक कांट कहते हैं, ‘सारी मानवता को अपने भीतर अनुभव करो। और दूसरे के भीतर अनुभव करो। क्योंकि ऐसा अनुभव करना हमारा साध्य है, केवल साधन नहीं।’ दिल्ली-नई दिल्ली महानगरपालिका के चुनावों में ‘स्वराज’ नामक दल की भागीदारी की घोषणा के बाद भाजपा ने स्वराज के प्रवर्तक एवं प्रसिद्ध अधिवक्ता प्रशांत भूषण के ऊपर हमला करने वाले तेजिन्दर पाल सिंह बग्गा को अपना प्रवक्ता बनाकर यह स्पष्ट कर दिया है कि, उसकी भविष्य की दिशा क्या होगी। परन्तु जीत का अंहकार उन्हें यह नहीं सोचने दे रहा है कि कुछ समय बाद दल की दशा क्या होगी।  दिल्ली के भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी कहते हैं, ‘मैं इन आरोपों के बारे में नहीं जानता। मैं उन्हें एक समर्पित कार्यकर्ता के तौर पर देखता हूं जो अपना काम फुर्ती से करता है। इसीलिए मैंने उन्हें चुना।’ बिना पृष्ठभूमि जाने क्या चुनाव किया जाना संभव है या पृष्ठभूमि ही चुनाव का आधार है। गांधी ‘शठे प्रति शाठ्यम’ यानी ईट का जवाब पत्थर के बजाय ‘शठं प्रत्यपि सत्यम’ अर्थात हमें शठ के प्रति भी स्नेह और सत्य से भरा व्यवहार करना चाहिए। जब किसी ने आ•ाादी प्राप्त करने के लिए उनसे कूटनीति अपनाने को कहा तो उनका जवाब था कि देश की हालत आज से भी ज्यादा खराब क्यों न हो जाए, मैं धोखाधड़ी और चालाकी के रास्ते पर पांव नहीं धर सकता। सत्य और अहिंसा उनके लिए स्वतंत्रता से भी मूल्यवान थे। उनका कहना था कि यदि संसार में एकता और समानता का भाव नहीं रहता तो मैं जीवित नहीं रहना चाहूंगा।
आज गांधी विचारों के पैरोकारों एवं रचनात्मक संस्थाओं को खुलकर सामने आना ही होगा उत्तर प्रदेश चुनाव में आपसी खींचतान सांप्रदायिकता और अतिराष्ट्रवाद को जिस तरह से हवा दी जा रही थी, उसी दौरान हस्तक्षेप किया जाना चािहए था। आज देश को पुन: नैतिकता के स्तर पर जाग्रत करने की आवश्यकता है। बढ़ती असहिष्णुता को तो प्रेम और अनुराग से ही खत्म किया जा सकता है। पुन: उनकी जनगणना वाली टिप्पणी पर लौटते हैं। उन्होंने कहा कि ‘मैंने उस जनगणना करने वाले भाई को जवाब देते हुए अपने को धर्म संस्थापक नहीं कहा था; राजनीतिज्ञ कहा था। अहिंसा का स्थान तो सभी धर्मों में है। मगर राजनीति में शक्ति के विकेन्द्रीकरण के द्वारा जो अहिंसा स्थापित होगी, वह अपने आप में एक धर्म होगी।’ परन्तु आज भारत सहित दुनिया के अधिकांश देशों में सीमित तानाशाही की वकालत की जा रही है, यह कब परिपूर्ण तानाशाही में परिवर्तित हो जाती है इसका अंदाजा किसी को नहीं है। इस आसन्न संकट को आंके बिना भारत एक बार पुन: इंदिरा युग की ओर पलट यात्रा आरंभ कर चुका है। रास्ते में कोई नई संपूर्ण क्रांति या नए जयप्रकाश नारायण मौजूद हों ऐसा भरोसा नहीं किया जा सकता। व्यक्ति केन्द्रित राजनीति के तमाम नए चेहरे हमने पिछले 40 वर्षों में देखे हैं और यह सभी लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति बहुत जवाबदेह न•ार नहीं आते। कतील शिफाई के नजरिए से इन्हें देख लो:-
छत बना देते हैं, अब रेत की दीवारों पर,
कितने गाफिल हैं नए शहर बसाने वाले।

राजनीति में बढ़ती आक्रामकता ने उन लोगों को भी हतोत्साहित किया जिनकी आस्था संसदीय लोकतंत्र में बनी हुई है। समस्या यह है कि किसी भी चुनाव में मुद्दे विषय नहीं बनते। विकास को मुद्दा बनाया जाता है लेकिन विकास की परिभाषा की पंचतंत्र की कहानी ‘अंधों का हाथी’ की याद दिलाती है। भाजपा के एक भी मुस्लिम को विधानसभा का टिकट न देना उत्तरप्रदेश में रणनीतिक तौर पर ठीक हो सकता है परन्तु यह सामाजिक विकास में बड़ा रोड़ा साबित हो सकता है। ठीक वैसे ही गोवा में अपने कट्टर विरोधियों के हाथ में सत्ता के सूत्र देखकर क्या पाना चाहते हैं यह तो समय ही बताएगा। इन विधानसभा चुनावों ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि कोई भी दल फिर वह भाजपा ही क्यों न हो कांग्रेस का विकल्प नहीं हो सकता उसे अपने आचार व्यवहार को कांग्रेसी बनाना ही होगा। ऐसे में कांग्रेस के पास अवसर है कि वह अपना विकल्प स्वयं तैयार करे। यह ऐसा कोई विकल्प भारतीय राजनीति के लिए अब अनिवार्यता भी बन गया है।
उद्देश्यहीन राजनीति की परिणिति अंतत: भ्रष्ट व लचर व्यवस्था में होती है। न्यायालयीन निर्णय, विभिन्न आयोगों व न्यायाधिकरणों द्वारा दी गई व्यवस्थाएं, नैतिक व स्थापित मापदंड तब किसी को भी उद्वेलित नहीं कर पाते। देश का लगातार ‘चुनावी मोड’ में रहना कटुता को चिरस्थायी बना देगा। इसकी वजह यह है कि सारी योजनाएं और रणनीतियां बहुजन हित में न होकर येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतने और सत्ता में स्वयं को अधिष्ठित करने तक सीमित हो जाती है और आम जनता तमाशबीन से ज्यादा कुछ नहीं रहती। फिर वह तो चाहती है उसे हफीज होशियारपुरी ने कुछ इस तरह बयां किया है,
वो नहीं, मौत सही, मौत नहीं नींद सही,
कोई आ जाए शबे गम का मुकद्दर बन के।


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