असहमति से शत्रुता तक का सफर

चिन्मय मिश्र पिछले कुछ अरसे से देश कुछ ऐसी घटनाओं का साक्षी बना जिसकी वजह से व्यापक प्रतिक्रियाएं सामने आईं। दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज विवाद के बाद गुरमेहर कौर के बयान से उठा बवंडर यदि ...

चिन्मय मिश्र

चिन्मय मिश्र


गजब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते,
वो सबके सब परीशां हैं, वहां पर क्या हुआ होगा।
-दुष्यंत कुमार

पिछले कुछ अरसे से देश कुछ ऐसी घटनाओं का साक्षी बना जिसकी वजह से व्यापक प्रतिक्रियाएं सामने आईं। दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज विवाद के बाद गुरमेहर कौर के बयान से उठा बवंडर यदि एक छोर है तो दूसरे छोर पर मध्यप्रदेश के उज्जैन में आरएसएस के सहप्रचार प्रमुख कुंदन चंद्रावत का बयान कि केरल के मुख्यमंत्री का सिर काटकर लाने वाले को वह 1 करोड़ रुपए इनाम देंगे और यह दावा कि ‘भूल गए क्या गोधरा को? छप्पन मारे थे 2000 कब्रिस्तान में चले गए। घुसा दिया उनको अंदर इसी हिन्दू समाज ने।’ बात गुजरात के सच और बलात्कार की धमकी भर की नहीं है। इन तात्कालिक अतिरेकों की वजह से समाज में विद्यमान मूलभूत प्रश्न और समस्याएं कहीं पीछे छूट जाती हैं। प्रसिद्ध समाजशास्त्री श्यामाचरण दुबे लिखते हैं, ‘हिन्दू समाज में यदि असहमति, विरोध और सुधार की परंपरा नहीं होती तो वह टूटकर अंतत: विखंडित हो गया होता। इन परंपराओं ने सुरक्षा कवचों का काम किया और समाज में वे अनुकूलन का माध्यम बनी, जिनके चलते समाज एक बना रहा।’ परन्तु आज परिस्थितियां जिस ओर इशारा कर रही हैं उससे तो लगता है कि देश का बहुसंख्य लगभग अपनी गतिशीलता को रोक रहा है। नई चुनौतियों से निपटने के बजाय वह तूफान में शुतुरमुर्ग की मानिंद रेत में अपनी गर्दन घुसेड़ रहा है।
गुरमेहर ने एक सर्वकालिक सत्य की ओर अत्यंत सहजता से कदम बढ़ाया था। सवाल सिर्फ जीत या हार का नहीं है और सही या गलत होने जितना सीधा भी नहीं है। सवाल मानवीयता और मानवीय मूल्यों का है। सबको नैतिकता और अनैतिकता के पैमाने पर अपने कार्य को तौलने का है। चौरा-चौरी कांड में पुलिस कर्मियों की हत्या के बाद बापू द्वारा आंदोलन वापस ले लेना कुछ के लिए सही और कुछ के लिए गलत था। परंतु गांधी इससे आगे जाकर इसे नैतिकता के पैमाने पर तौल रहे थे कि देश अभी अहिंसक क्रांति के लिए तैयार नहीं है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मन यातना शिविरों और बाद में सोवियत श्रम शिविरों के दौर में जब राष्ट्र भी समाप्त किए जा रहे थे, के काल में एक वृद्ध महिला ने उनसे कहा था, ‘एक समय आएगा जब मनुष्य धरती पर मनुष्य के पदचिन्हों को चूमेगा। गैस चैम्बरों और सामुदायिक कब्रों के बाद के समय में मनुष्य धरती का सबसे दुर्लभ खजाना बन जाना था। और मेरी बची-खुची पीढ़ी मनुष्य में भरोसा करने आई थी- समूची मनुष्यता में नहीं। और वह एक बार फिर ठगी गई।’ आज हम जिस विषादग्रस्त समय में जी रहे हैं उसमें मनुष्य एक बार पुन: संकट में है। इराक-अमेरिका युद्ध में पांच लाख से ज्यादा बच्चों का मारा जाना अब मनुष्य को विचलित नहीं करता। सीरिया के गृहयुद्ध में लाखों लोगों का मारा जाना, एक शरणार्थी समस्या भर बनकर रह गया है। आईएमआईएस के लोमहर्षक अत्याचारों को इस्लाम का हिस्सा मान लेने की भूल सारा विश्व कर रहा है। क्या हम इसका इतना सरलीकरण कर सकते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध में मारे गए 6 करोड़ लोग और उसके बाद बीते 72 बरसों में भी तमाम युद्धों व गृहयुद्धों में इतने ही लोग मारे गए हैं, तो इन सबको केवल हथियारों ने मारा है?
जब तक हम सरलीकरण के मोह से बाहर नहीं निकलेंगे तब तक किसी समाधान पर पहुंच पाना भी असंभव होगा। सवाल मनुष्य के बचे रहने का है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा है, ‘प्रश्न अनादि है। प्रश्न नहीं बदलते। समय और काल के हिसाब से उत्तर बदल जाते हैं।’ परन्तु हम तो उत्तर को खोज भी नहीं कर रहे हैं। इस श्रमसाध्य प्रक्रिया को अपनाने की बजाय हम अपने को प्रतिक्रिया तक सीमित करते जा रहे हैं। सोचिए यदि कोई महिला से असहमति है तो क्या बलात्कार कोई उत्तर हो सकता है? यदि किसी पुरुष से असहमति है तो उसका कटा सिर कोई उत्तर बन सकता है? निश्चित तौर पर यह कोई उत्तर या समाधान नहीं हो सकता। डॉ. अम्बेडकर ने बंधुता के सिद्धांत की पैरवी करते हुए संविधान सभा में कहा था-‘बंधुता का अर्थ क्या है? बंधुता का अर्थ है सभी भारतीयों के सर्वमान्य भाईचारे की, सभी भारतीयों के एक होने की भावना। यही सिद्धांत सामाजिक जीवन को एकता तथा अखंडता प्रदान करता है। इसे प्राप्त करना कठिन है।’ चूंकि इसे प्राप्त करने कठिन है इसीलिए शायद हमने इस दिशा में प्रयत्न करना ही स्थगित कर दिया। आपसी टकराव हमें अधिक रुचिकर और फलदायी लगने लगा। समाज के अधिकांश तबके ने यह विचार करना ही छोड़ दिया कि इसकी अंतिम परिणति क्या होगी। जबकि हम तो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की परंपरा के संवाहक होने का दावा करते हैं और संविधान के अनुच्छेद 51 (नीति निदेशक सिद्धांतों) में इसका उल्लेख भी किया गया है।
इसी तरह संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता के अंत की बात करता है जो संविधान की प्रस्तावना वे निहित ‘व्यक्ति की गरिमा’ को संवैधानिक अधिकार देती है। परंतु हमने तो जैसे आपस में एक-दूसरे के तिरस्कार का ही प्रण ले लिया है। इस प्रकार न तो हम अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक व ऐतिहासिक परंपराओं से बंधना चाहते हैं और न ही संविधान व कानून से। तो फिर ऐसा क्या है जो हमें मनुष्य के रूप में मान्यता प्रदान कर सकता है। किसी से असहमति का प्रत्युत्तर यदि बलात्कार और हत्या ही है तो हम कैसे अपने को एक ऐसी सभ्यता और संस्कृति का संवाहक मान सकते हैं, जिसने बुद्ध, महावीर, नानक व गांधी जैसे सत्य और अहिंसा के पुराधाओं को विकसित किया है।
उत्तेजना के घोड़े पर चढक़र हम अपने समय की वास्तविकताओं की तरफ से आंख मूंद लेते हैं। महिला दिवस मनाते हैं और नारी को देवी की तरह पूजते हुए चौथे राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण को नजरअंदाज कर देते हैं। यह बताता है कि यूं तो आज आसाम में स्त्री-पुरुष अनुपात 1000:996 है जो कि अत्यंत सकारात्मक प्रतीत हो रहा है परंतु पिछले पांच वर्षों में जन्म लिए बच्चों में लड़कियों की संख्या महज 794 है। इसी तरह पश्चिम बंगाल में यह अनुपात 1000:991 है परंतु पांच वर्षों में जन्मी लड़कियां घटकर 902 ही रह गई है। हम अनावश्यक सी बातों को तूल देकर मुख्य समस्याओं को दृश्यपटल पर आने ही नहीं दे रहे। लड़कियों की संख्या दिल्ली, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, मेघालय, ओडिशा व आंध्रप्रदेश में भी तेजी से गिर रही है। वहीं महाराष्ट्र, हरियाणा, गुजरात, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, बिहार व पंजाब में स्थितियां सुधरी भी हैं। परंतु पिछले 30 महीने न मालूम किस प्रतिक्रिया में बीत गए। निर्मला पुतुल लिखती हैं, ‘ये वे लोग हैं जो / हमारे ही नाम पर / लेकर गटक जाते हैं / हमारे हिस्से का समुद्र।’ ऐसे लोगों से अपना हिस्सा वापस लेने के बजाय हम बचा-खुचा भी उन्हीं के हाथ में सौंप रहे हैं।
गुरमेहर कौर एक तरह से गुरु की कृपा की तरह हमारे सामने आई है जिसने इस खून से सने समय में भी आशा की किरण जगाई है। उसका दिल्ली छोडऩे पर मजबूर होना भारतीय लोकतंत्र पर मंडराते संकट की पूर्व सूचना है। यह छोटी घटना नहीं है। यदि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र अपनी राष्ट्रीय राजधानी में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा नहीं कर सकता तो, दूरदराज की स्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। नरेन्द्र जैन ने लिखा है, ‘कुछ लिखें इससे पहले ही चीखने लगती है कलम/ वहां होता आत्र्तनाद शब्द के उच्चारित होने के पहले / कोई संवाद अब पूरा नहीं होता / साफ-सुथरे चमकीले शब्दों से।’
 

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