प्रदूषण : परलोक पहुंचाने का शार्टकट

चिन्मय मिश्र,पिछले कुछ दिनों से प्रदूषण खासकर वायु प्रदूषण के बढ़ते खतरे को लेकर खूब खबरें छप रहीं हैं।...

चिन्मय मिश्र

चिन्मय मिश्र
दोस्तों के साथ जी लेने का मौका दे दे ऐ खुदा,                                            
तेरे साथ तो मरने के बाद भी रह लेंगे।                                      
-गालिब

पिछले कुछ दिनों से प्रदूषण खासकर वायु प्रदूषण के बढ़ते खतरे को लेकर खूब खबरें छप रहीं हैं। कुछ का मत है कि चीन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित है, कुछ कहते हैं भारत! भारत में वायु प्रदूषण बहुत तेजी से विनाश या महामारी का रूप लेता जा रहा है। दिल्ली जैसे शहरों के लाखों निवासियों के फेफड़े ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। कैंसर व श्वांस की दमा जैसी बीमारियों के प्रभावितों की संख्या इकाई, दहाई नहीं कई-कई गुना वृद्धि दर्शा रही है।  परंतु हमारा शासन व प्रशासन इस तथ्य से संभवत: वाकिफ ही नहीं है। वैसे केंद्र में पर्यावरण एवं वन नामक एक मंत्रालय भी है। वह क्या करता है और उसे क्या करना चाहिए इसे लेकर हमेशा विवाद और भ्रम बना ही रहता है। अभी हाल ही में मंत्रालय ने अपने अशासकीय विषय विशेषज्ञों पर तगड़ी लगाम कसी विभाग के जो प्रमुख वैज्ञानिक पर्यावरण स्वीकृति देने के मामलों की पड़ताल करते थे, उनका थोकबंद तबादला कर दिया। साथ ही मंत्री ने स्पष्ट कहा कि विकास से कोई समझौता नहीं होगा। जल्दी से जल्दी पर्यावरणीय स्वीकृति दे दी जानी चाहिए। सवाल उठता है कि जब सरकार की मंशा इतनी साफ है। (पर्यावरण को लेकर) तो फिर इस मंत्रालय और इसके भारी-भरकम प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता ही क्या है। बस एक सील बनवा लें और प्रत्येक आवेदन पर लगाते जाएं।
वनों से खदेडऩे पर विभाग मौन है, नदियों के प्रदूषिण होने पर विभाग मौन है, बढ़ते वायु प्रदूषण पर विभाग मौन है, घटते वन भूभाग पर विभाग मौन है, औद्योगिक प्रदूषण पर विभाग मौन है, वाहनों से बढ़ते प्रदूषण पर भी विभाग मौन है, खदानों से होते प्रदूषण पर विभाग मौन है यानी एक गहन अंधकार वहां छाया हुआ हैं। लाखों लोगों के असमय मारे जाने पर कोई ग्लानि का सुर नहीं है बल्कि अहंकार बढ़ता न•ार आ रहा है। हम से ग्लानि का अतिरेक भी मान सकते हैं। हम सभी जानते हैं कि भारत अपने संविधान के दिशानिर्देशों के तहत संचालित होता है। संविधान में प्रदत्त मूल अधिकारों के अन्तर्गत अनुच्छेद 21, साफ लिखता है कि, ‘किसी व्यक्ति को उसके प्राण एवं या दैहिक स्वतंत्रता, से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के द्वारा ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।’ परंतु हमारी प्रक्रिया जिसके अन्तर्गत तमाम पर्यावरणीय स्वीकृतियां दी जा रही हंै, वही प्राणघातक सिद्ध हो रही है। गौरतलब है निम्न न्यायालय से यदि एक निरपराध व्यक्ति दंडित हो जाता है तो उसे ऊपरी कचहरी में न्याय की उम्मीद बनी रहती है। परंतु हमारा पर्यावरण मंत्रालय तो पूरे नागरिक समाज को अपनी समीक्षा के अधिकार से ही वंचित कर देना चाहता है।
आज दुनिया में पर्यावरण संकट से बड़ा कोई संकट नहीं है। आतंकवाद और परमाणु संकट भी नहीं। परंतु हमने विकास की ढपली को इस तरह से बजाना सीख लिया है कि उसकी गूंज हमेशा कानों में गूंजती ही रहती है। पर्यावरणविद अनुपम जी कहते थे, ‘विकास की इस आधुनिक प्रक्रिया में हम रोज कुछ नया सोचते, करते हैं। उसके बाद जब उसकी ठोकर लगती है तो उसको बदल लेते हैं। यह एक स्वस्थ चिंतन नहीं है। तो रोज बिना सोचे प्रयोग करने का उदाहरण हुआ कि यह करके देखते हैं, इसमें फंस गए तो फिर वह करेंगे। आज ट्यूबवैल लगा दिए। सारा पानी उलीच दिया। फिर संकट आया तो ट्यूबवैल पर प्रतिबंध तक की बात चल पड़ी। लेकिन दूसरी तरफ हमारा पूर्व वाला समाज है, जो ऐसा सोचता है कि पानी को जरूरत से ज्यादा उलीचना नहीं है।’ दिन रात गांधी के नाम की दुहाई देने वाले शासक वर्ग को समझना होगा कि विकास को किस तरह से समझें व समझाएं। अनुपमजी ने लिखा भी है आप अगर पुराने नेताओं के भाषण पढ़ेंगे, संपूर्ण गांधी वाङमय, जो कई खंडों में चलता है, उसमें, विकास शब्द आसानी से नहीं मिलना चाहिए। देश की चिंता गांधीजी को भी कम नहीं थी, लेकिन एक भी जगह उन्होंने यह नहीं लिखा कि देश का विकास होना चाहिए। यह इलाका बड़ा पिछड़ा है। इस शब्द ने अपने समाज के माथे पर एक खास तरह की मोहर लगा दी है और यह प्राय: पिछड़ेपन की मोहर है। उसमें हम विकास के कुछ टापू दिखाते हैं।
अतएव यह साफ जाहिर है कि शासन-प्रशासन की वर्तमान कार्यप्रणाली न तो भारतीय संविधान को अपना आधार मान रही है और न भारतीय संस्कृति को! भारत की नई सरकार और उसके पर्यावरण मंत्री लगातार भारतीय संस्कृति की दुहाई देते हुए भूल जाते हैं कि वसुधैव कुटुंबकम् के अलावा जियो और जीने दो भी हमारी संस्कृति का मूलभूत आधार है। हमारी नीतियों के चलते यदि एक भी मौत अस्वाभाविक ढंग से होती है तो हमें अपनी शासन व्यवस्था में बदलाव के बारे में अत्यन्त गंभीरता से सोचना तत्काल प्रारंभ करना होगा। अपनी विरोधाभासी नीतियों से हमें छुटकारा पाना ही होगा। सारे सरकारी भवन वातानुकूलित (एयरकंडीशंड) होते जा रहे हैं और दूसरी ओर सरकार वातानुकूलित चिकित्सालयों पर सेवाकर व अन्य करों में 5 से 10 प्रतिशत की वृद्धि कर रही है। यानी प्रदूषण के कारण कैंसर ग्रसित या हृदयरोग का शिकार हुआ व्यक्ति भारत में अपने जन्म का अतिरिक्त खामियाजा भुगतने को अभिशप्त है। हम वाहनों से होने वाले प्रदूषण को रोकना चाहते हैं और दूसरी ओर मेट्रो, रेल एवं अन्य सार्वजनिक परिवहन की दरों में लगातार वृद्धि कर रहे हैं। इस आत्मघाती प्रवृति से शायद भगवान भी नहीं बचा पा रहे हैं। दिल्ली में बढ़ते पर्यावरणीय प्रदूषण के चलते वह वहां आ ही नहीं पा रहे होंगे।
भोपाल गैस कांड से हमने कोई सबक नहीं लिया। नर्मदा घाटी को डूबाने में हमें कोई संकोच नहीं है। हिमालय को छलनी करने से हमें कोई नहीं डिगा सकता। कुडनकुलम का विरोध हमें परमाणु नीति पर पुनर्विचार को मजबूर नहीं कर सकता। मलकानगिरी के आदिवासी हमें देश व विकास-विरोधी दिखाई पड़ते हैं। वेट लैंड समाप्ति का विरोध करने वालों पर गोली चलाने में हमारी ऊंगली नहीं कांपती। जीएम फसलों का विरोध करने वालों को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा पर हमला करने वाला बताया जाता है। वाहनों की संख्या नियंत्रित करने की मांग करने वाले दकियानूसी हैं। औद्योगिक प्रदूषण के खिलाफ लडऩे वाले औद्योगिकीकरण की राह में रोड़ा है। औद्योगिक कॉरिडोर बनाम खेती की बात करने वाले मूर्ख हैं। कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था के पैरोकार तो अर्थशास्त्र ही नहीं जानते। नमामि गंगे की असलियत बताने वाले तो ताडऩ के अधिकारी हैं ही। हिमालय को बारूद से छलनी और पहाड़ को समंदर बनाने का विरोध करने वालों की तो खैर नहीं। आधुनिक कृषि से फैलते जहर को लेकर सचेत करने वाले तो राष्ट्र-विरोधी है। पर्यावरण की रक्षा के लिए उठा प्रत्येक हाथ, संस्था, समुदाय, जनसंगठन, अंतत: राष्ट्रविरोधी करार दिया जाएगा। परंतु पर्यावरण वन मंत्रालय को समझना होगा कि उनकी वर्तमान हेठी उन्हें भविष्य में खलनायक ही निरूपित करेगी।
दिल्ली में बढ़ता वायु प्रदूषण और कैंसर से अनुपम जी की कष्टदायक मृत्यु दिमाग व आंखों से हट नहीं पा रही है। उनकी सीख कानों में गूंज रही है। वे कहते थे, ‘हम पर्यावरण दिवस मनाते हैं धरती दिवस मनाते हैं, जल दिवस मनाते हैं। सब दिवस मनाते हैं, लेकिन हम वर्ष नहीं मनाते। विद्वता की कोई कमी नहीं है, लेकिन हमारे यहां एक बहुत पुराना शब्द है, ‘बेदिया ढोर’। वेदों का बोझा ढोने वाला। एक तरह से  गधे जैसा काम है। चार वेद ऊपर रख लिए पीठ पर या दिमाग पर और आप कहोगे कि अनुपम मिश्र वेदों का जानकार है। तो पर्यावरण की जागरुकता का ऐसा बोझा अभी बहुत देखने को मिलेगा। पर वह हमारे व्यवहार व आचरण में नहीं होता। अब और क्या लिखें? लाखों मौतें यदि शासन प्रशासन को विचलित नहीं कर सकतीं तो ऐसे छोटे-मोटे लेख किसी का क्या बिगाड़ लेंगे।


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