कला की परिपूर्णता का उत्सव

चिन्मय मिश्र : खजुराहो नृत्य समारोह इस आपाधापी और विचलित कर देने वाले समय में एक ठंडी बयार की मानिंद प्रस्फुटित हैं।...

चिन्मय मिश्र

चिन्मय मिश्र
समग्र और सार्वभौम सौन्दर्य-बोध और अपने संपूर्ण जीवन को पूरा-पूरा सुन्दर बनाना, यह एक संपूर्ण व्यक्ति और आदर्श समाज का आवश्यक चरित्र होना चाहिए।
-श्री अरविन्द

खजुराहो नृत्य समारोह इस आपाधापी और विचलित कर देने वाले समय में एक ठंडी बयार की मानिंद प्रस्फुटित हैं। मूलत: शास्त्रीय नृत्य शैलियों पर केन्द्रित यह समारोह पिछले तीन-चार बरसों में कुछ नए आयाम जैसे कला संबंधी व्याख्यान, आधुनिक चित्रकला प्रदर्शनियां, शिल्प  कार्यशाला को जोडक़र एक परिपूर्ण उत्सव की तरह स्वयं को गढ़ता जा रहा है।  अब आवश्यकता इस बात की है कि इस समारोह को महज समीक्षा के नजरिए से न बांच कर कुछ इस तरह से देखा जाए कि इसके अन्दर भारत कल्पनाशीलता भारतीय कला महोत्सवों को नई दिशा प्रदान कर सकते हंै। रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी ‘तोते की शिक्षा’ की शुरूआती पंक्तियां हैं, ‘किसी समय कहीं एक चिडिय़ा रहती थी। वह अज्ञानी थी। वह गाती बहुत मधुर थी, लेकिन शास्त्रों का पाठ नहीं कर पाती थी। वह फुदकती बहुत थी, लेकिन उसे तमीज न थी।’ हमारे कला महोत्सव भी कुछ ऐसे ही ढर्रे पर चल पड़े और अतिशास्त्रीयता के फेर में पडक़र कहीं न कहीं आम जनता से कटते चले गए। खजुराहो नृत्य समारोह के आयोजक, उत्पाद उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत व कला अकादमी जो म.प्र. शासन संस्कृति विभाग के अन्तर्गत कार्यरत है ने इस ढर्रे को तोड़ा है और चिडिय़ा को बंद पिंजड़े से बाहर निकाला है।
सायं 7 बजे मुख्य मंच पर शास्त्रीय नृत्यों की प्रस्तुति के पूर्व पूरे दिन कला व दर्शन संबंधी गतिविधियां समारोह परिसर में चलती रहती हंै। दिन की शुरूआत कला वार्ता, जिसमें कला व शिल्प व समीक्षा पर गंभीर पहचान होते हैं, से होती है। यह एक विचारणीय तथ्य है कि आ•ाादी के बाद यदि हमने सबसे अधिक कुछ खोया है तो वह अपना सौन्दर्यबोध। इसे हम अपने पहनावे से लेकर वास्तुशिल्प तक, सभी में देख सकते हैं। वहीं खजुराहो तो सौन्दर्य का खजाना है। भारतीय सौन्दर्यबोध की जिस परिष्कार से यहां अभिव्यक्ति हुई है वह अन्यत्र दुर्लभ है। चित्रकार अशोक भौमिक का कहना था कि रवीन्द्रनाथ टैगोर के पहले भारतीय चित्रकला ठहरी हुई थी। उन्होंने सन् 1928 में इसे एक मुक्त कला का स्वरूप दिया। इस कड़ी में वे अमृता शेरगिल को भी जोड़ते हंै। बंगलादेश से आई मणिपुरी नृत्यशैली की नर्तकी व विचारक लुबना मरियम ने कलाओं द्वारा सीमाओं के अतिक्रमण और दक्षिण एशिया की सांस्कृतिक एकता पर बात की। खजुराहो के लक्ष्मण मंदिर पर चर्चा करते हुए अनुराग शुक्ला ने इसे तत्कालीन नाटक प्रबोध चन्द्रोदय से जोड़ा। प्रख्यात नाट्य निदेशक रतन थियम का मानना है कि ‘जब मछलियां आकाश में आती हैं, तभी कला संभव होती है, वरना नहीं। हम जो सारी चीजें प्रकृति में देख रहे हैं, उन्हें उसी रूप में रखने में कोई कलात्मकता नहीं है।’ उनका यह भी कहना था कि ‘हमारे संकट का सबसे बड़ा कारण यह है कि हमने मानव व दैवीय ऊर्जा का प्रयोग न्यूनतम कर दिया है और कृत्रिम ऊर्जा पर पूरी तरह निर्भर हो गए हंै।’ उनका यह भी कहना था कि ‘ग्रामीण कलाकार पत्थर तोड़ रहे हैं।’ कला का सबसे पहला कार्य खुद को संतुष्ट करना है। लेखक एवं समालोचक उदयन वाजपेयी ने ‘कला में संकट’ विषय पर विस्तार से चर्चा की। उनके अनुसार, ‘समाज शब्द वात्सायन के कामसूत्र से आया है, जिसका अर्थ होता है, ऐसा समुदाय जो साथ में दुखी होता है और साथ में सुखी होता है।’  इस व्याख्या पर यदि हम अपने आज के समाज को तौलें तो स्पष्ट हो जाता है कि समाज ने किस हद तक स्वयं को विपन्न किया है। वहीं कला शिक्षक डॉ. दीपक कन्नल के  ‘कलाओं के परस्पर संबंध एवं इनकी समीक्षा’ पर बात करते हुए कहा कि मारकण्डेय ऋषि ने पहली बार कलाओं के अन्तर्संबंधों पर चर्चा की। उनका कहना था ‘काल के बीच का अवकाश ही दो घटनाओं के बीच का अंतर हो सकता है। अतएव समय असली नहीं है बल्कि स्थान (स्पेस) असली है।
यदि शास्त्रीय नृत्य संध्या पर बात करें तो सात दिनों (20 से 26 फरवरी) में कुल 26 प्रस्तुतियां हुईं। इनमें से 13 कत्थक की थीं। बाकी में भरतनाट्यम, ओडिशी, मणिपुरी, कुचिपुड़ी, मोहिनी अट्टम व मयूरभंज छाऊ थीं। कत्थक के प्रस्तुतकर्ताओं को अनावश्यक रूप से तालियों की आदत पड़ गई है। इसके अधिकांश प्रस्तुतकर्ता नृत्य में विद्यमान भाव व अभिनय के बजाय इसके तकनीकी पक्ष खासकर लगातार चक्कर लगाकर तालियां बटोरने में लग जाते हंै। इससे इस विधा पर संकट गहरा रहा है। बाकी नृत्य शैलियां अभी इस ‘रियल्टी शो’ जैसी बीमारी से बची है। वैसे कुचिपुड़ी ने तो अपने को और भी अधिक संप्रेषणीय और सुकोमल बनाया है। इस बार की प्रस्तुतियां पिछले वर्षों के मुकाबले तुलनात्मक रूप से काफी कमजोर थीं, खजुराहो नृत्य समारोह का मंच भारत के सर्वाधिक प्रतिष्ठित नृत्य मंचों में से है। अतएव यहां पर परिपक्वता के साथ ही साथ नृत्य के सभी गुणों तथा लावण्य रसिकता, अच्छी भाव-भंगिमा, अभिनय व सर्वश्रेष्ठ संगीत की अपेक्षा की जाती है। इस समारोह के 43 वर्ष हो गए हैं और कुछ दर्शक जो कि देश के विभिन्न हिस्सों से आते हैं, इसको 40 वर्षों से देख रहे हैं। उनका साफ कहना था कि चयन की प्रक्रिया को पूर्ववत किया जाए और यदि नवोदित या उभरते कलाकारों को मंच देना है तो एक ‘युवा खजुराहो नृत्य समारोह’ किन्हीं अन्य दिवसों में आयोजित किया जाए।
कहते हैं कोई सम्मेलन तभी सफल माना जाता है जबकि उससे कोई नई गतिविधि सामने आए। इस समारोह से आर्ट-मार्ट जिसमें कि देश भर के करीब 200 समकालीन कलाकार शिविर के माध्यम से जुटते हैं, एक नई गतिविधि है। इसी के समानांतर इन कलाकारों का भारतीय पारंपरिक शिल्पों से साक्षात्कार करवाने के लिए ‘हुनर’ के माध्यम से कार्यशाला का आयोजन किया जाता है। इस बार इसमें मिट्टी, धातु, लकड़ी, हाथकरघा, पारंपरिक वस्त्र छपाई, सोने पर कारीगरी जैसे तमाम लोक शिल्प मौजूद थे। पारंपरिक व आधुनिक दोनों कलाकारों ने आपस में विचारों और विधाओं का आदान-प्रदान किया। इसी दौरान राज्य स्तरीय कला प्रदर्शनी भी यहां आयोजित हुई जिसमें राज्य स्तरीय पुरस्कारों का वितरण किया गया।
नेपथ्य के माध्यम से छाऊ नृत्य परंपरा की सभी शैलियों के वस्त्र, मुखौटे एवं अन्य उपकरणों से साक्षात्कार हुआ। वहीं इससे इस नृत्य की बारीकियों को समझने में भी काफी मदद मिली। ‘नीलगर’ प्रदर्शनी ने प्राकृतिक नील (इंडिगो) के पुर्नस्थापन के प्रति रुचि व संभावना भी जताई। भारत में वैसे भोजन या पाक भी कला है। खजुराहो नृत्य समारोह में गांधी आश्रम छतरपुर, गांधी स्मारक निधि आदि ने पूर्णत: जैविक भोजन का रसास्वादन भी कराया।
हमारे समय की समस्या यह है कि हमने कला के प्रयोजन को ही कला का मूल्य मान लिया है। हम यह भूलते जा रहे हैं कि सौन्दर्य का अपना नैतिक पक्ष होता है और सुन्दरता की धारणा प्रत्येक व्यक्ति की अलग-अलग  होती है। हम हर वस्तु और स्थिति को अपने हिसाब या अनुकूल व्याख्यायित करना चाहते हैं। जबकि वाल्टर बेंजामिन कहते हैं, ‘हमेशा से कला का एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य रहा है, एक ऐसी मांग पैदा करना, जिसकी पूर्ति पूरी तरह से होने का समय अभी न आया हो।’ बात नृत्य और खजुराहो नृत्य समारोह की है तो कब देखते हंै कबीर नृत्य को कैसे समझते और समझाते हैं।
नाचु रे मेरे मन मत्त होय/राहु केतु नवग्रह नाचें
जन्म-जन्म आनन्द होई/ गिरी समुंदर धरती नाचें
लोक नाचै हंस रोई/सहस कलाकार मन मेरो नाचै

रीझै सिरजनहार।


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