प्रशासकों का बदला स्वरूप

इन्दिरा मिश्र : जब भारत स्वतंत्र हुआ, उसके बाद भी आईसीएस के पहले से चले आ रहे सदस्य अपने को प्रशासक कम और शासक अधिक समझते थे। ...

इंदिरा मिश्र

इन्दिरा मिश्र
जब भारत स्वतंत्र हुआ, उसके बाद भी आईसीएस के पहले से चले आ रहे सदस्य अपने को प्रशासक कम और शासक अधिक समझते थे। उन्हें आम जनता से सीधे मुंह बात करना नहीं आता था। वे अपनी ऊंची तनख्वाहों और सुरक्षित जीवन की लय जीते अपने में लीन थे। उन्हें उनकी सब जरूरतें पूरी होने के बाद कुछ किसी की परवाह नहीं होती थी। क्लबों में टेनिस खेलना, या देर रात तक ताश खेलना, पिकनिक या शिकार पर जाना, बॉल रूम, डांस और बेशुमार शराब तथा खाना- ये सब उनके आम शौक थे। आम जनता के जीवन से वे बहुत दूर थे। बाद में शिकार की जगह जंगल सफारी ने ले ली। डांस की जगह जिम ने और ताश की जगह मोबाईल चेट, गेम्स, फेसबुक, व्हाट्स अप ने ले ली।
दफ्तर में वे एक बादशाह होते थे। उनके इर्द-गिर्द होते थे उनके मातहत दरबारी और दीन-दुखी। आज स्थिति बदल गई है। पहली बात तो आईसीएस की उत्तराधिकारी सेवा, आईएएस में आना, एक युद्ध जीतने के समान कठिन हो गया है। पहले जिसमें जन्मजात प्रतिभा होती थी ओर थोड़ा अंग्रेजी का ज्ञान होता था वह व्यक्ति आईएसएस अथवा उसके समकक्ष किसी भी सरकारी सेवा में स्थान पा जाता था। आज तो इस सेवा के प्रतिवर्ष खाली लगभग 100 स्थानों पर देश के 3 लाख प्रतिद्वन्द्वी घात लगाये बैठे होते हैं, एड़ी-चोटी का जोर लगाकर, दिन-रात एक किये रहते हैं। कोचिंग क्लास में प्रवेश के लिए बड़ी राशि देकर अपना घर छोड़ कोचिंग सेंटर वाले शहरों में एक-एक कमरे में चार-चार, पांच-पांच की संख्या में वर्षों रहते हैं। परीक्षा में कौन से विषय लेंगे इस पर सोची-समझी रणनीति अपनाकर चयन व बाद में तैयारी करते हैं। (आज यह याद करके हंसी आती है कि मैंने आईएएस परीक्षा देने के लिए मूल फार्म में भरे अपने विषयों में इन्टरनेशनल लॉ की अपेक्षा हिन्दी लेने के लिए 50 पैसे के एक अन्तर्देशीय पत्र पर यूपीएससी को पत्र भेजकर तसल्ली कर ली थी। उस पत्र की कोई अभिस्वीकृति भी नहीं ली थी और उस ऑफिस ने मेरी बात मान ली थी। शायद यदि नहीं मानते तो मैं चयनित भी न हो पाती।) जाहिर है कि आज का उम्मीदवार जब इतनी कड़ी चढ़ाई चढऩे के बाद सेवा में आ जाता है तो वर्षों उसका जश्न मनाने में अपना संतुलन खो देता है। पहले तो उसकी प्रवृत्ति यह होती है कि उसे पहले सहे दु:ख कष्ट के बदले आज तुरन्त सब सुख चाहिये, फिर चाहे वह कैसे भी मिले। परन्तु जब वह शुरू की अवधि गुजर जाती है तब वह जैसे नींद से जाग जाता है। वह पाता है कि वह आज जिस जगह है, वहां उससे ढेरों उम्मीदें हैं, उसकी अन्य अधिकारियों से तुलना है, उसे सूचना के अधिकार के तहत रहना है, उसे विधानसभा सदस्यों, मंत्रीगण वरिष्ठ अधिकारी वर्ग सब की आंखों में ऊंचा उठना है। उसे जनता द्वारा खेती की पैदावार बढ़ाने, गरीबों की आय बढ़ाने महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाने देश के स्वास्थ्य में स्वच्छता और खुशहाली रखने के लिए सतत सक्रिय और प्रयत्नशील रहना है। उसे कोई धरना, प्रदर्शन, घेराव या पुतला जलाने जैसी घटना नहीं होने देना है। उसे बेस्ट प्रैक्टिसे•ा अपनानी है, उसे अपनी ज्ञात आय के साधनों से अधिक नहीं जुटानी है। पारदर्शिता बरतते हुए उसे डिजिटल पद्धति से ही अपने लिए धन लेना व देना है और तो और उसे इन तथ्यों के साथ जीना है कि देश के आठ व्यक्तियों के नाम देश की कुल संपत्ति का 50 प्रतिशत है। (आज की विषमताओं के चलते और इसे इनमें से एक बनने की जरा भी इच्छा नहीं रखनी है।) लेकिन उसे इस बात की तसल्ली भी बनाये रखना है कि एक जीवन में आदमी सीमित मात्रा में ही उपभोग कर सकता है। आखिर वह कितना खा लेगा, कितने सोने को पहन लेगा, कितने वस्त्रों को तन ढंकने के लिए अपने पर लाद सकेगा, कितनी कारों में कितने स्थानों पर चला जायेगा? कितने कमरों में रह लेगा, कितने सौन्दर्य का साहचर्य पा लेगा? उपभोग में उपयोगिता का ह्रास नियम तो लागू होता ही है। हमारी अमीर एनआरआई दोस्त भारत आकर अपनी बहन से कहती है, मुझे मूंग की दाल की खिचड़ी अपने हाथ से बना कर खिलाओ तो जानंू। वही सर्वश्रेष्ठ है। लेकिन एक बात और।
अभी पिछले हफ्ते ही छत्तीसगढ़ में आईएएस लोगों का एक सम्मेलन हुआ था। उसमें अंतरंग चर्चा में अपनी बात रखते हुए प्रख्यात चिंतक अजय शाह ने कहा कि निगमों व सार्वजनिक उपक्रमों में ही नहीं बल्कि सरकारी मामलों में भी जो कारगुजारियां होती हैं, उनमें गोपनीयता रखने के जमाने अब गये। आज तो आपके लिए एक सर्वमान्य नीति अपनाने और चिरस्थाई निर्णय लेनेे के लिए व्यापक चर्चा बहुत जरूरी है। आप जिस भी चीज पर विचार करना चाहते हो उसका विस्तृत मसौदा बनायें और प्राय: सभी को उसके ऊपर टिप्पणी करने का अवसर दें। उन्होंने बताया कि विदेश में तो कई निगम बाहर के भागीदारों को भी (लगभग उसने से 5000 रुपये लेकर) उन्हें अपने बोर्ड का एजेंडा भेज देते हैं और फिर बैठक में उनकी भागीदारी का स्वागत करते हैं। विरोध, चर्चा, मशविरा, बाद-विवाद और मीमांसा ये सब वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से ही हम अन्त में सही निर्णय पर पहुंचते हैं। एक संयुक्त परिवार के समान यदि हमें लम्बे समय तक साथ बने रहना है तो हमें विरोधी मतों का सामना करने से गुरेज नहीं होना चाहिये। अन्यथा होता यह है कि अक्सर हम पर खाप (पंचायत) वाली मनोवृत्ति हावी हो जाती है। अक्सर संयुक्त परिवार टूटने का कारण भी यही होता है कि घर का कद्दावर बूढ़ा-बूढ़ी अपनी ही मर्जी हर बात में चलाती है, जिस दूसरे लोग सहन करके खुश नहीं होते। हमारे प्रसिद्ध गुप्ता जी बड़े फख्र से कहते, हमें तो हमारी बहू सवेरे चार बजे उठकर चाय बनाकर पिलाती है। कोई बहू से भी सुने कि उसकी नींद हर रोज पूरी हो पाती है या नहीं? अपने हाथ से गुप्ताजी चाय बनाना क्यों नहीं सीख सकते?
आज दर्जनों विकास की योजनायें ऐसी हंै जो लोगों की गरीबी दूर कर सकती है परन्तु उन योजनाओं तक जनता की पहुंच बनाना प्रशासकों के लिये एक चुनौती है। वह उनका सबसे जरूरी काम है। प्रशासक अर्थात अखिल भारतीय सेवा या राज्य की सिविल सेवा के सदस्य ही नहीं, बल्कि उनके सभी मातहत। इनमें पनपती लालच की प्रवृत्ति पर उन्होंने अंकुश नहीं लगाया, तो कुछ नहीं किया। फिर जनता में भी आत्मविश्वास की कमी तथा कोई रिस्क नहीं लेंगे की मनोवृत्ति रही तो कोई नतीजा भी नहीं पायेंगे। फिर बाद में रिस्क लेने वाले पड़ोसी से रश्क करेंगे, कि उसके पास कैसे सब कुछ आ गया। यह नहीं देखेंगे कि उसने कितनी मेहनत की है।
पिछले हफ्ते के उसी सम्मेलन में बोलते हुए एक अन्य अनुभवी अधिकारी ने बताया कि देश में कार्बन डाइऑक्साइड कम करने के उद्देश्य से उन्होंने एक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लिया। उनके मंत्रालय ने उन्हें एक 14 पृष्ठीय आधारभूत जानकारी का मसौदा दिया, जबकि मीटिंग के दौरान एक निजी अन्तरराष्ट्रीय कम्पनी ने 86 पृष्ठ का मसौदा दिया, जिसको देखने से लगता था कि हां वास्तव में अब कोई भी बिन्दु अधूरी जानकारी के कारण सवाल बन कर लटकता नहीं रहेगा। इतनी सम्पूर्ण थी वह जानकारी। कहते भी हैं कि अगर किसी समस्या को हल करना हो तो ब्रह्म मूहूर्त में उठकर समस्या को खोल-खोल कर समझो। उसकी तरफ स्पष्ट और तीखी चेतना के साथ गौर करो, तो हल खुद-ब-खुद सामने आयेगा। प्रशासकों को भेस बदलकर जनता के बीच जाकर सही स्थिति का पता चलाना चाहिये। तभी प्रशासक को अपनी टीम की कमजोरियों को दूर करने की पे्ररणा मिलेगी। आज इतनी ढेरों विकास योजनाओं को लेने के लिए लोग क्यों सामने नहीं आते? वे कम पढ़े-लिखे होते हैं। उनमें आत्मविश्वास भी कम होता है। वे आज ऋण लेंगे तो कल ब्याज के जाल में फंसे होने के दुष्परिणामों से डरते हैं। उनमें हिम्मत लाने के लिए इन्हें उनका बड़ा भाई बनना होगा।
आज प्रशासक को किसी भी फोरम-मंच पर अपनी बात को समझाना, लोगों को मनाना, उन्हें किसी भी योजना की शक्ति, आवश्यकता, अवसर, लाभ और नुकसान या खतरे क्या है यह विस्तार से समझाना जरूरी है। तब वह सफल हो सकता है। कल को कौन सी समस्या आज के निर्णय के आधार पर उठ खड़ी होगी, उसका अनुमान करना बहुत उपयोगी है ताकि सोच-समझ कर निर्णय लिया जा सके और उक्त निर्णय व्यापक लोगों से परामर्श के आधार पर लिया गया हो। लोगों के पास परस्पर विरोधी विचार अभिमत हो सकते हैं, यह स्वाभाविक होता है। दूसरे, अपने साधनों की सीमा को देखते हुए ही किसी भी कार्य को प्रारंभ करना चाहिये। साधनों के प्रति व्यावहारिक रहने का लाभ यह होता है कि जिस दिन आप उस पद पर नहीं रहते उस दिन भी वह योजना उतने ही सुभीते से चलती रहती है। हर बात में स्वयं ही हर काम को करने की जिद भी अच्छी नहीं। अच्छी यह प्रद्धति होती कि अपने स्टाफ को उनका काम अच्छी तरह समझा दिया जाये। तब आप वहां भी नहीं रहेंगे तो काम रुकेगा नहीं।
इस बारे में एक जलपोत के कर्मचारियों और अधिकारियों का उदाहरण देते हुए वक्ताओं ने कहा कि जिस दिन आप जहाज के कप्तान को खुद बहुत ज्यादा व्यस्त देखेंगे उस दिन जान लीजिये कि वह जहाज जल्दी ही डूबने वाला है। चुंकि मुहावरा हे कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। आईएएस आदि बनने के लिये जो चढ़ाई उसने की थी वह सही थी। उसी आदत को जारी रखना उसकी नियति बन गई है। आज ठोस जमीनी हकीकत और तरक्की की प्रशंसाओं के बीच एक बड़ी खाई उभर आई है। इसे पार करना प्रशासनिक नेतृत्व पर निर्भर करता है।


 

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