भेड़ की पूंछ पकडक़र नदी पार करना

प्रभाकर चौबे : 7फरवरी मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा में भाषण दिया। उन्होंने कई बातें कीं। करनी भी चाहिये। लेकिन एक रोचक बात भी कही।...

प्रभाकर चौबे

प्रभाकर चौबे
7फरवरी मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा में भाषण दिया। उन्होंने कई बातें कीं। करनी भी चाहिये। लेकिन एक रोचक बात भी कही। उन्होंने कहा कि ‘मुझे देश की चिंता है, चुनाव की नहीं।’ है न रोचक बात। मोदीजी आप प्रधानमंत्री हैं। जनता ने चुना है। यह बात अलग है कि केवल 31 प्रतिशत के बल  पर आपकी पार्टी सत्ता में आ गई और आप प्रधानमंत्री बने। लेकिन हमारे लोकतंत्र की यह विशेषता कह लो कि यहां वोट का प्रतिशत नहीं देखा जाता, संख्या बल से तय होता है। जब अटल बिहारी विश्वास मत में एक वोट से हार गये थे तो कहा था कि मैं संख्या बल से हारा- यह हमारे लोकतंत्र की खूबी भी है। बहरहाल यह अलग मसला है- इस पर संविधानवेत्ता अपनी राय दें। लेकिन आप प्रधानमंत्री हंै तो आपको देश की चिंता तो होगी ही- इसमें कौन सी नई बात है। पं. जवाहर लाल नेहरु से लेकर जितने भी प्रधानमंत्री हुए सबको देश की चिंता रही। रही कि नहीं। रहेगी ही। प्रधानमंत्री को 20-20 घंटे काम करना पड़ता है, अगर यह सही है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। एक समय अशोक मेहता ने कहा था कि जो 18-20 घंटे काम कर सके- रात 12 बजे सोये और तीन बजे उठ जाये वही इस देश का प्रधानमंत्री बन सकता है। अशोक मेहता एक समयकेंद्रीय मंत्रिमंडल में थे। समाजवादी पार्टी से कांग्रेस में आये थे या लाये गये थे। भंडारा से लोकसभा का चुनाव जीता करते थे। बहरहाल प्रधानमंत्री मोदी जी को बार-बार यह क्यों बताना पड़ रहा है कि ‘मुझे देश की चिंता है, चुनाव की नहीं।’ अभी तक तो किसी ने उनकी चिंता पर सवाल उठाया भी नहीं। प्रधानमंत्री हैं तो देश की चिंता करेंगे ही। मुख्यमंत्री रहते राज्य की चिंता करते रहे। बार-बार कहते रहते हंै कि मुझे देश की चिंता है। प्रधानमंत्री घर के उस मुखिया की तरह हो गये हैं जो शानदार कपड़े पहनकर रोज ही घूमने निकल पड़े। अच्छे होटल में डिनर-घर में अन्न नहीं है। बच्चों की फीस नहीं पटी, नाम कटने वाला है, किताबें नहीं हैं। शिक्षा महंगी हो गई है। पिता का इलाज नहीं हो रहा क्योंकि इलाज महंगा हो गया है। लेकिन घर का मुखिया कहता रहे कि मुझे घरकी, परिवार की चिंता है। भाजपा के एक प्रवक्ता ने एक न्यू•ा चैनल में एक अच्छी बात कही थी। न्यू•ा चैनल में चर्चा के दौरान किसी प्रतिपक्ष के प्रवक्ता ने प्रधानमंत्री के 10 लाख वाले सूट पर कुछ तीखी टिप्पणी कर दी तो भाजपा प्रवक्ता ने टोका और झिडक़ते हुए कहा कि आज भाजपा शासन में देश तरक्की कर रहा है, लोग अच्छे-महंगे कपड़े पहन रहे हैं, आप चाहते हैं कि लोग लंगोटी लगाये ही घूमें। भाजपा प्रवक्ता का कहना सही है। अब तो कार्पाेरेट की तरफ देखिये- जमकर कमाई हो रही है और कार्पोरेट चमकदार डे्रस में घूम रहे हैं। बहरहाल प्रधानमंत्री जितना भी कहें कि उन्हें चुनाव की चिंता नहीं है। केवल देश की चिंता है। लेकिन प्रधानमंत्री महोदय हैं तो आपको चुनाव की ही चिंता और यह इसलिये भी कि राज्यसभा में भी आपको बहुमत चाहिए और यह तो विनय कटिहार भी कह चुके कि यू.पी. में जीतना जरूरी है। आपको चुनाव की चिंता है और घोर चिंता है। आपको इसी कार्यकाल में संविधान में पार्टी के विचार पसंद संशोधन कर देने हैं जिससे आप 2019 तक अपने वोट कंसालिडेट करने में सफल हों और 2019 के चुनाव में अपनी इस जीत की उपलब्धि लेकर अपने मतदाताओं के पास पहुंचें-मन में तो है, विचारों में भी है कि चुनाव जीता जाये अन्यथा राज्य विधानसभा के चुनाव में आप प्रधानमंत्री के नाते इतनी सभायें क्यों लेते? पूर्व में राज्य विधानसभा के चुनाव में किसी भी प्रधानमंत्री ने इतनी सभाएं नहीं लीं- एकाध लेते बाकी राज्य की पार्टी सम्भाले।  इसलिये प्रधानमंत्री जी यह तो न ही कहा कीजिए कि मुझे चुनाव की चिंता नहीं है। है, जरूर है और रहनी भी चाहिये। इसमें गलत क्या है। आप भाजपा के सदस्य हंै। भाजपा ने आपको प्रधानमंत्री पद दिया है अत: भाजपा मतलब अपनी पार्टी के लिये चुनाव में चिंता तो करनी ही है, यह आपका राजनीतिक कर्म है। वैसे मुझे चुनाव की चिंता नहीं... कह कर आप सिद्ध क्या करना चाहते हैं। देश की चिंता पर तो आप पर किसी ने संदेह तो किया नहीं। न किसी ने प्रश्न उठाया न ऊंगली उठाई।
हमारे प्रधानमंत्री श्री मोदी जी 2014 से आज तक इतनी चुनाव सभाएं ले चुके, सभाओं में बोल चुके कि अब बोलने की उनकी एक स्टाइल डेवलप हो गई है और एक ‘लय’ भी आ गई है। उसी लय में बोलते हैं- लोकसभा में भी उसी लय में भाषण देते हैं जैसा चुनाव सभा में। लगातार एक-सा काम करने पर एक आदत- सी पड़ जाती है।  किसी तबला मास्टर को देखिये उसकी ऊंगली हमेशा जुंबिश करती मिलेगी- धा-धिन-धिन धा  पर चलती-सी। किसी शिक्षक से मिलिये वह कुछ कहने के बाद यही कहेगा समझ में आया कि नहीं...। किसी पत्रकार से मिलिये वह कोई न्यू•ा पढऩे के बाद कहेगा- इसे इस एंगल से लिखा जाना था...। तो हमारे प्रधानमंत्री को चुनाव सभाओं में इतना बोलना पड़ रहा है कि एक खास गति-सी आ गई है उनके भाषणों में और वे लोकसभा में भी उसी गति से बोलते हैं- लगता है जुमलेबाजी उनसे छूट नहीं रही।
प्रधानमंत्री ने लोकसभा में अपनी सरकार के कार्यों की गिनती पेश की। करनी चाहिये, प्रधान हैं तो वे ही रखेंगे- उनका अधिकार है कि वे अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिनायें। पहली लोकसभा में पं. नेहरु एक बार लोकसभा में अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाने लगे तो कम्युनिस्ट नेता हिरेन मुखर्जी ने टोका और कहा- आपकी सरकार ने ये-ये-ये-ये किया माना, लेकिन प्रधानमंत्री महोदय आपकी सरकार ने ये-ये-ये-ये नहीं किया जो जरूरी काम थे- जनता की भुखमरी मिटाने जरूरी थे। तो प्रधानमंत्री जी आपकी सरकार में वे सारे काम किये जिन्हें आप गिनाते रहे। मानते हैं। लेकिन महोदय आपकी सरकार ने देश में गैरबराबरी को और बढ़ाया। गैरबराबरी दूर करने आपकी सरकार ने कुछ नहीं किया- आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और जीवनयापन के क्षेत्र में घोर गैरबराबरी है। कुछ की समृद्धि बढ़ी है। कार्पोरेट ही आपसे खुश है। कार्पोरेट चाहता है कि आप आर्थिक सुधार की गति और तेज करें ओर तेज दौड़ें। आप दौड़ रहे हैं। गरीब पीछे छूट रहे हैं। आपकी आर्थिक नीतियां घोर गैरबराबरी बढ़ा रही है। आपने तय किया कि कांग्रेस हर मामले में कहती है कि ये तो पहले (मतलब कांग्रेस के समय) से था। सही कह रही है कांग्रेस। आपकी सरकार की आर्थिक नीतियां तो कांग्रेस सरकार की आर्थिक नीतियों की कार्बन कापी है- एक भी नयी नीति बताइये। दरअसल भाजपा के पास तो कोई आर्थिक नीति रही नहीं। तो आप स्वीकार कर लीजिए कि आपकी सरकार कांग्रेस की ही आर्थिक नीतियों को आगे ले जा रही है- उसी ट्रेक पर दौड़ रही है, लेकिन तेज दौड़ रही है। आप और आपकी पार्टी व पार्टी की सरकार यह समझ बैठी है कि इन्हीं आर्थिक नीतियों से विकास होगा- विकास हो सकता है लेकिन ऐसा विकास एक पक्षीय होगा। अमीरों के स्कूल अलग, गरीबों के अलग। इस नीति के चलते देश की बड़ी आबादी को आपकी सरकार दया की पात्र ही बना कर रख सकेगी। त्यागिए इन नीतियों को। इनसे समानता का सिद्धांत पूरा नहीं हो सकता-कबीर ने कहा है-
कबीर इनको समझाये कै बार।
भेड़ की पूंछ पकड़ चाहें नदिया पार॥
भेड़ की पूंछ पकड़ कर नदी पार नहीं किया जा सकता। उसी तरह पूंजीवादी आर्थक नीतियों के द्वारा समतावादी समाज नहीं बन सकता। आपकी नीतियां घातक है। लोग पिछड़ जायेंगे- कुछ की ही तरक्की होगी।
हमारे प्रधानमंत्री जी को लोकसभा में भाषण देते हुए हास्य रस के कवि काका हाथरसी याद हो आये। उनकी दो पंक्तियां सुना दीं।
प्रधानमंत्री जी को कबीर याद नहीं आये। विपक्ष पर तंज कसना ही था तो कबीर का यह दोहा सुनाते-
बुरा जो देखन मैं गया, बुरा न मिलिया कोय।
जो देखा निज आपना, मुझसा बुरा न कोय...।
लेकिन प्रधानमंत्री जी भी क्या करें? जगह-जगह हास्य कवि सम्मेलन हो रहे। लोगों को हंसाया जा रहा रहा इसलिए प्रधानमंत्री जी को काका हाथरसी याद आये। प्रधानमंत्री जी लोकसभा में आपने चुनाव सभा- सा भाषण दे दिया। ऐेसे भाषण व्होट दिला सकते हैं। भीड़ को सम्मोहित कर सकते हैं लेकिन देश की जनता को सरकार की नीयत और सरकार के रास्ते की खबर नहीं दे सकते।
prabhakarchaube@gmail.com


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