कैशलेस इकानॉमी की सीमा

रिजर्व बैंक के लिए कैशलेस इकानॉमी भारी घाटे का सौदा है चूंकि कैश पर ब्याज नहीं देना होता है। डिजिटल इकानॉमी का अर्थव्यवस्था पर अंतिम प्रभाव फिलहाल स्पष्ट नहीं है...

कैशलेस इकानॉमी की सीमा
डॉ. भरत झुनझुनवाला

डॉ. भरत झुनझुनवाला

डिजिटल इकानॉमी का अर्थव्यवस्था पर अंतिम प्रभाव फिलहाल स्पष्ट नहीं है। डिजिटल लेन-देन को अपनाने के पक्ष में दूसरा तर्क अपराध का है। वर्तमान में स्वीडन कैशलेस दिशा में अग्रणी है। इसी देश ने बोफोर्स का घोटाला किया था। लगभग 15 वर्ष पूर्व वर्ल्ड ट्रेड टावर पर अलकायदा के आक्रमण के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने आतंक से जुड़े तमाम संदिग्ध खातों को फ्रीज कर दिया था। परन्तु इस्लामिक स्टेट ने फिर भी उससे भी अधिक सृदृढ़ वित्तीय व्यवस्था बना ली। कहावत है कि ताले शरीफों के लिए होते हैं, चोरों के लिए नहीं। तात्पर्य यह कि अपराध में लिप्त लोग कैशलेस के तमाम विकल्प ढूंढ लेंगे जैसे सोना, हुण्डी, हवाला इत्यादि।

सुप्रीम कोर्ट मे वादों की डिजिटल दाखिले का शुभारम्भ करते समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि डिजिटल इकानॉमी को स्वीकार करने में लोगों की जड़ मानसिकता आड़े आ रही है। श्री मोदी के वक्तव्य को दो स्तरों पर समझना होगा। एक स्तर है सफेद धन के लेन-देन का। जैसे किसी कंपनी द्वारा श्रमिकों को वेतन दिया जा रहा है अथवा इनकम टैक्स अदा किया जा रहा है। इस प्रकार की सफेद रकम का डिजिटल लेन-देन करना निश्चित रूप से हितकारी है। इन्हें समाज सहज ही अपना भी रहा है। जैसे तमाम कंपनियों ने डिविडेंड को सीधे शेयरधारक के खाते में जमा करने का विकल्प पहले ही उपलब्ध कराया है। इस प्रकार के लेन-देन को डिजिटल प्लेटफार्म पर ले जाने से अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। मास्टरकार्ड ने अनुमान लगाया है कि कैशलेस इकानॉमी से देश की आय में 1.5 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। क्रेडिट कार्ड कंपनी वीजा ने इस लाभ का अनुमान 70,000 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष लगाया है।

लेकिन दूसरी तरफ रिजर्व बैंक को घाटा लगेगा। जब आप 2,000 रुपए नगद में अपनी तिजोरी में रखते हैं तो इतनी ब्याज-मुक्त रकम रिजर्व बैंक को उपलब्ध कराते हैं। पाँच साल बाद रिजर्व बैंक आपको 2000 रुपए ही वापिस करेगा। यदि आपने यह रकम रिजर्व बैंक में किसी खाते में जमा कराई होती तो रिजर्व बैंक आपको लगभग 400 रुपए ब्याज अदा करता। एक नोट छापने का खर्च 10 रुपए मान लें तो रिजर्व बैंक के लिए कैशलेस इकानॉमी भारी घाटे का सौदा है चूंकि कैश पर ब्याज नहीं देना होता है।

डिजिटल इकानॉमी का अर्थव्यवस्था पर अंतिम प्रभाव फिलहाल स्पष्ट नहीं है। डिजिटल लेन-देन को अपनाने के पक्ष में दूसरा तर्क अपराध का है। वर्तमान में स्वीडन कैशलेस दिशा में अग्रणी है। इसी देश ने बोफोर्स का घोटाला किया था। लगभग 15 वर्ष पूर्व वल्र्ड टे्रड टावर पर अलकायदा के आक्रमण के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने आतंक से जुड़े तमाम संदिग्ध खातों को फ्रीज कर दिया था। परन्तु इस्लामिक स्टेट ने फिर भी उससे भी अधिक सृदृढ़ वित्तीय व्यवस्था बना ली। कहावत है कि ताले शरीफों के लिए होते हैं, चोरों के लिए नहीं। तात्पर्य यह कि अपराध में लिप्त लोग कैशलेस के तमाम विकल्प ढूंढ लेंगे जैसे सोना, हुण्डी, हवाला इत्यादि।

कैशलेस के पक्ष में एक तर्क काले धन का दिया जा रहा है। अमेरिका ने 1969 में 10,000, 5,000, 1,000 एवं 500 डालर के नोटों को निरस्त कर दिया था। इससे नगद डालर रखने का प्रचलन कम नहीं हुआ है। आज लगभग 1700 अरब डालर के 100 डालर के नोट प्रचलन में है। इनका बड़ा हिस्सा विदेशों में पूंजी को सुरक्षित रखने के लिए किया जा रहा है। बड़े नोटों को निरस्त करने से काले धन कम नहीं हुआ है। एक अनुमान के अनुसार भारत में केवल 6 प्रतिशत कालाधन नगद में रहता है। बिल्डरों के दफ्तर में आपको नगद कम ही मिलेगा। कालाधन सोना, प्रापर्टी अथवा विदेशी बैकों में रखा जाता है। मैंने कोलकाता, कानपुर एवं मुम्बई के चार्टर्ड अकाउन्टेंटों एवं उद्यमियों से बात की। इनके अनुसार, नोटबंदी के बाद नंबर 2 का धन्धा नगद में पूर्ववत चालू हो गया है। उद्यमी पेमेंट को कर्मियों के खाते में डलवा कर नगद निकाल कर रकम को काला बना रहे हैं। नगद में की गई बड़ी बिक्री कई छोटे-छोटे बिलों में काटी जा रही है। कैशलेस के पक्ष में दिए जाने वाले ये तर्क भ्रामक है।


ये तथ्य विकसित देशों को ज्ञात है। परन्तु वे फिर भी कैशलेस इकानॉमी की तरफ बढ़ रहे हैं। स्वीडन तथा डेनमार्क लगभग कैशलेस हो चुके हैं। नार्वे तथा दक्षिण कोरिया 2020 तक कैशलेस होने की तरफ बढ़ रहे हैं। इन देशों का कैशलेस होने का कारण नकारात्मक ब्याज दर है। जापान के केन्द्रीय बैंक के पास यदि आप आज 1000 येन जमा करायेंगे तो एक वर्ष के बाद आपको 999 मिलेंगे। बैंक आपकी रकम को सुरक्षित रखने का 0.1 प्रतिशत नकारात्मक ब्याज वसूल करता है। ऐसी परिस्थिति में कैशलेस लाभप्रद हो सकता है। उस परिस्थिति में यदि आपने 2,000 रुपये रिजर्व बैंक में जमा कराए होते तो रिजर्व बैंक को 400 रुपए ब्याज अदा नहीं करना पड़ता। नोट छापने का खर्च भी बचता। नकारात्मक ब्याज दरों की स्थिति में कैशलेस इकानॉमी लाभप्रद है।

यह भी पढ़ें - ऐसे कैसे बनेगा कैशलेस इंडिया : छोटे-छोटे लेनदेन के लिए चढ़ना पड़ती है पहाड़ी...!

भारत में ब्याज दरें सकारात्मक हैं इसलिए रिजर्व बैंक को जमा रकम पर ब्याज अदा करना होगा जो कि अर्थव्यवस्था पर बोझ होगा। दूसरे, अपने देश में असंगठित क्षेत्र बहुत बड़ा है। अफगानिस्तान एवं सोमालिया जैसे देशों में अपराध नियंत्रण के लिए कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा दिया गया है। परन्तु इससे वहां के असंगठित क्षेत्र दबाव में आया है। विकास दर गिरी है। विकास एवं रोजगार के अभाव में आतंकवादी गतिविधियां बढ़ीं हैं। अपने देश में ऐसा ही हो रहा है। तीसरे, अपने टैक्स कर्मी अतिभ्रष्ट हैं। यदि ये ईमानदार होते तो नंबर 2 का धंधा होता ही नहीं। उद्यमियों द्वारा नंबर 2 का धंधा अधिकतर इन कर्मियों का हिस्सा बांधने के बाद ही किया जाता है। नगद लेन-देन पर नकेल लगाने में इन कर्मियों को घूस वसूलने का एक और रास्ता उपलब्ध हो जाएगा। चौथे, भारत में सोने की ललक गहरी है। अत: नगद पर प्रतिबंध बढऩे के साथ-साथ सोने की मांग बढ़ेगी। सम्पूर्ण विश्व में ऐसा ही हो रहा है। वर्ष 2006 में सोने की वैश्विक सप्लाई 3252 टन थी जो 2015 में बढ़ कर 4306 टन हो गई है। यह सप्लाई बड़ी मात्रा में भारत और चीन को जा रही है।

 यह भी पढ़ें - राशन दुकानें कैशलेस, गरीबों की मुसीबत

ब्याज दर सकारात्मक होने से रिजर्व बैंक पर बोझ बढ़ेगा। असंगठित क्षेत्र दबाव में आएगा। इसी में अधिकतर रोजगार बनते हैं। टैक्स कर्मियों का भ्रष्टाचार बढ़ेगा जैसे बैंक कर्मियों का नोटबंदी के दौरान देखा गया है। हमारे नागरिक सोने की खरीद अधिक करेंगे। यह रकम देश के बाहर चली जाएगी। अत: हमें विकसित देशों की कैशलेस चाल का अंधानुकरण नहीं करना चाहिए। अपने देश में सरकारी कर्मियों मे व्याप्त भ्रष्टाचार पर नकेल कसे बिना इन समस्याओं को हल नहीं किया जा सकता है। सरकार को चाहिए कि एक स्वतंत्र जासूस व्यवस्था बनाए जो भ्रष्ट कर्मियों को टै्रप करे। हर पाँच वर्ष पर इनके कामकाज का जनता से गुप्त मूल्यांकन कराया जाए और अकुशलतम 10 प्रतिशत को बर्खास्त कर दिया जाए। इन भ्रष्ट कर्मियों के हाथ में कैशलेस इकानॉमी चोर को थानेदार बनाने जैसा है।

प्रधानमंत्री के कैशलेस इकानॉमी को बढ़ावा देने के मन्तव्य का स्वागत है। सफेद धन का लेन-देन डिजिटल प्लेटफार्म पर लाभप्रद होगा। लेकिन इस कदम के दूसरे प्रभावों के प्रति प्रधानमंत्री को सजग रहना चाहिए।

देशबंधु से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.

डॉ. भरत झुनझुनवाला के आलेख