जवानों पर जुल्म के लिए कौन जिम्मेदार

पुष्परंजन : सुरक्षाबलों के जवानों द्वारा सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जाना क्या कोर्ट मार्शल की श्रेणी में आएगा? सरकार इस सवाल पर गंभीरता से विचार कर रही है।...

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सुरक्षाबलों के जवानों द्वारा सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जाना क्या कोर्ट मार्शल की श्रेणी में आएगा? सरकार इस सवाल पर गंभीरता से विचार कर रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल एक चैनल पर बाइट दे चुके हैं कि तेज बहादुर और दूसरे जवानों ने शिकायत का जो तरीका अपनाया, वह ठीक नहीं है। संभव है, सेना के जवानों द्वारा सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर शीघ्र ही पाबंदी आयद हो। इस पर देर हुई तो यू ट्यूब, फेसबुक पर शिकायतों की ऐसी सुनामी आनी है, जिसे संभालना सरकार और सेना के अफसरों के लिए मुश्किल होगी। लंबे समय से सुषुप्त ज्वालामुखी से धुंआ निकलने लगा है। तेज बहादुर, जीत सिंह, यज्ञ प्रताप सिंह जैसे जवानों ने सोशल मीडिया के जरिये अफसरों के $िखलाफ  ऐसा मोर्चा खोला है, जिसकी तपिश सत्ता के गलियारे तक पहुंचने लगी है। इस पर पानी डालने का प्रयास सेना और सुरक्षाबलों के बड़े अधिकारी करने लगे हैं।
 जम्मू-कश्मीर में बीएसएफ के 29वें बटालियन में तैनात तेज बहादुर का वीडियो जब वायरल हुआ, तो उसके अफसरों ने उसे कई बार अनुशासन तोडऩे वाला और दिमा$गी रूप से असंतुलित कहा। तेज बहादुर की बीवी शर्मिला यादव ने सही सवाल उठाया है कि यदि उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी, तो उसे बंदूक के साथ सीमा पर तैनात क्यों किया गया? वीडियो के जरिये ऐसी ही शिकायतें सेना और सीआरपीएफ  से मिलने लगी हैं। तो क्या शिकायत करने वाले इन सभी जवानों का दिमा$ग सटक गया है? इस बार शिकायत, खाने को लेकर हुई है। ‘न खायेंगे, न खाने देंगे’ के गगनभेदी नारे लगाने वाले प्रधानमंत्री मोदी से फौजियों को उम्मीद है कि उनके साथ भेदभाव समाप्त होगा, और उनके खाने पीने की सुविधाएं बेहतर की जाएंगी।
मामला सेना का है, इसलिए विपक्ष इस पर फूंक-फूंक कर प्रतिक्रिया दे रहा है। विपक्ष के प्रवक्ता टिप्पणी से पहले यह साफ  कर देते हैं कि हम सेना के मामले में राजनीति नहीं कर रहे। लेकिन सेना में जो कुछ निचले स्तर पर हो रहा है, क्या उसके लिए राजनीति जिम्मेदार नहीं है? इस देश के नेता, फिल्मी सितारे, सेलेब्रिटी क्या सि$र्फ  ‘फोटो ऑपर्चुनिटी’ के वास्ते सेना की बैरकों में जाते हैं? किन्नौर के सुम्दो में प्रधानमंत्री मोदी जब 2016 की दीवाली सेना, आईटीबीपी और डोगरा स्काउट्स के जवानों के साथ मना रहे थे तब लगा था कि सुरक्षाबलों में सबसे निचले स्तर पर जो लोग तैनात हैं, उनके पुरसेहाल के लिए देश के ‘प्रधानसेवक’ संवेदनशील हैं। जवानों के साथ दीवाली मनाने का अभिनय सियाचिन में भी हो चुका है। तब मोदीभक्त बड़े गर्व से कहते थे, देखिये यह प्रधानमंत्री का ‘मास्टर स्ट्रोक’ है! मगर, मोदी जी के उस ‘मास्टर स्ट्रोक’ की हवा जवानों के लिए जली हुई रोटी और पनीली दाल ने निकाल दी है।
पाक अतिवादी चाहे मुंबई हमले में मारे गये हों, या फिर कश्मीर सीमा पर, उनके पास से जीपीएस, अत्याधुनिक हथियारों के अलावा जो चीजें हर बार मिली हैं उनमें ड्राई फ्रूट्स और हाई कैलोरी वाले खाद्य पदार्थ भी थे। क्या यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि देश के दुश्मन सूखे मेवे, मुर्गे और ताकत पैदा करने वाली ग़िज़ा खाकर यहां उतरते हैं, दूसरी ओर आतंकवादियों से लडऩे वाले जवानों को जली हुई रोटी और हल्दी-नमक वाली पतली दाल परोसी जा रही है। सरकार और उसके समर्थकों का पूरा अमला इस समय इसकी लीपा-पोती करने में लग गया है। सरकार के जूनियर मंत्री किरण रिजिजू को पूरी रिपोर्ट आने तक मीडिया को शांत रहने, और संयम बरतने को कहा है। सरकार के पास आई अंतरिम रिपोर्ट में क्या है, देश को नहीं पता। पूरी रिपोर्ट कब तक आएगी, इसका भी नहीं पता। जिन अत्याचारी अफसरों, घोटालेबाजो के विरूद्ध मामला बनना चाहिए, उन्हें बचाने में साथी अफसर लग गये हैं, और जिन जवानों ने शिकायत की है उनके परिवार वाले किसी अनहोनी से डरे हुए हैं।
बात केवल राष्ट्र की चिंता करने वाली इस सरकार की नहीं है। 2010 में  नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने सेना में खाद्य सामग्री की सप्लाई में होने वाली हेराफेरी पर सवाल उठाया था। उस रिपोर्ट में सीएजी ने सूचना दी थी कि 82 प्रतिशत $खरीद में तीन से कम ‘कोटेशंस’ लिये गये। सेना के लिए राशन सप्लाई में 36 फीसदी ऐसे मामले थे जिसे ‘सिंगल कोटेशन’ में निपटा दिये गये थे। 2005 से 2008 के बीच दिल्ली में चिकन और मीट सप्लाई करने वाले एक ठेकेदार का उदाहरण सीएजी ने दिया, जिसे पांच करोड़ का सालाना ठेका मिला था। सेना व सुरक्षाबलों के लिए अंडे, मीट, दूध, सब्जियां वैसे लोग सप्लाई कर रहे थे, जो ट्रांसपोर्ट कंपनियां चला रहे थे, या फिर टूर एंड ट्रेवल कंपनियों के मालिक थे। सीएजी की रिपोर्ट के आधार पर संसद में भी मामला गूंजा। फू ड सप्लाई की देख रेख करने वाले आर्मी सर्विस कॉर्प (एएससी) और सेना के लिए $खरीद करने वाली कमेटियां इससे सुधर गईं, ऐसा नहीं हुआ। 2011 में पार्लियामेंट अकाउंट्स कमेटी ने बारह सुझाव दिये, जिसमें से सि$र्फ  दो का पालन हो सका।
यह उस सरकार के समय की बात थी, जिसकी राष्ट्र के प्रति निष्ठा पर सवाल उठाया जाता है। मगर जिनकी राजनीति राष्ट्रवाद से शुरू और उसी पर समाप्त होती है, उनके पौने तीन साल के शासन में भी सेना के जवान खाने को लेकर सुखी नहीं हैं। 2016 में एक बार फिर ‘सीएजी’ ने सेना में जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर में ‘एक्सपायरी डेट’ की घटिया फुड सप्लाई की रिपोर्ट दी, जिसे लेकर संसद में हंगामा हुआ। स्वयं सेना द्वारा कराये सर्वे में स्वीकार किया गया कि 68 फीसद जवान खाने को लेकर असंतुष्ट हैं। तो क्या ये अड़सठ प्रतिशत जवान भी तेज बहादुर की तरह मानसिक रूप से असंतुलित हैं?
भारतीय सेना में 14 लाख, साढ़े आठ हजार की संख्या वाले एक्टिव फोर्स के लिए खाद्य सामग्री पर लगभग 1500 करोड़ सालाना $खर्च होता है। भोजन की गुणवत्ता में सुधार का सवाल अचानक से नहीं उठा है। इस देश में सरकार चाहे किसी की हो, सेना में जो लोग फु ड सप्लाई करते रहे हैं, वह अपना ‘मैच फिक्सिंग’ कर लेते हैं। ये बातें आर्मी हेडचटर, और प्रतिरक्षा मंत्रालय की अभेद दीवारों तक रह जाती हैं।
टीवी बहस में सेना के एक अवकाश प्राप्त अधिकारी कह रहे थे कि यूपीए सरकार ने बीएसएफ  और सीआरपीएफ  जैसे ‘पैरामिल्ट्री फोर्स’ का रूतबा कम कर ‘सेंट्रल आम्र्ड फोर्सेज’ में डाल दिया था। जनरल वी.के. सिंह 31 मार्च 2010 से 31 मई 2012 तक सेनाध्यक्ष रहे हैं। यह मार्च 2011 की बात है, जब गृह मंत्रालय ने उस प्रस्ताव को मान लिया जिसमें सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, सीआईएसएफ, और एसएसबी को ‘सेंट्रल आम्र्ड पुलिस फोर्स’ के रूप में परिभाषित किया गया था। पचास हज़ार की संख्या वाले असम राइफल्स और दस हजार की संख्या वाले स्पेशल फ्रंटियर फोर्स, जो ‘आईबी’ को रिपोर्ट करती है, उसे ‘पैरामिल्ट्री फोर्स’ माना गया था। क्या यह फैसला बिना तत्कालीन सेनाध्यक्ष को भरोसे में लेकर किया गया था? जनरल वी.के. सिंह इस प्रश्न पर बेहतर प्रकाश डाल सकते हैं।
$खराब खाने का यह मामला चल ही रहा था, तभी सेना में सहायक प्रणाली (बैटमैन सिस्टम) पर सवाल उठ गया। लांस नायक यज्ञ प्रताप सिंह ने फेसबुक पर वायरल वीडियो में कहा कि यह एक सैनिक के सम्मान के खिलाफ  है कि उससे जूतों पर पालिश, और अफसरों के बच्चों की देखभाल कराई जाए। ऐसा ही सवाल 2014 में एक और लांस नायक आर. मुरूगन ने उठाया था। मुरूगन ने 2 अक्टूबर 2013 के गांधी जयंती का जिक्र किया था, जब उसे सेना के साहब बहादुरों के लिए शराब और कबाब परोसनी पड़ी थी। पार्टी के बाद उसने उनके जूठे बर्तन मांजे थे। मुरूगन ने कहा कि मैंने सेना की नौकरी इस वास्ते नहीं की थी। यह कौन सी देश सेवा है? मुरूगन का मामला लोग कुछ हफ्तों में ही भूल-भाल गये।
सेना में इस समय लगभग सैंतीस हजार अफसर, और एक लाख तीस हजार के आसपास जेसीओ (जूनियर कमीशंड ऑफिसर) हैं। मेजर से नीचे के अधिकारी को एक ‘सहायक’ की सेवा मिलती है। मेजर को दो सहायक, और जैसे-जैसे रैंक में इजाफा होता है ताबेदारों की संख्या बढ़ती जाती है। अफसरों के बच्चे इन्हें ‘भइया’ कहते हैं। ‘भइया’ का काम अफसरों के बच्चों का पोतड़ा साफ  करने से लेकर मैडम की गुलामी तक की होती है।
2012 में सेना के ‘सीओएएस जनरल’ विजय कुमार सिंह ने प्रस्ताव दिया था कि सैनिकों को ‘भइया’ बनाने से अच्छा है कि अलग से सर्विस असिस्टेंट (एसए) के पद सृजित कर 2358 लोगों को बहाल कर लें, और नॉन कम्बैटेंट असिस्टेंट (एनसीए) के रूप में 22 हजार 620 लोगों को अस्थाई तौर पर रख लिया जाए। मई 2012 में तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था। क्या अजीबोगरीब विकल्प नहीं लगता? सेना के अफसरों को किसी भी सूरत में गुलामी करने वाला क्यों चाहिए? सेना में सेवादार रखने की परंपरा जिन अंग्रेज अफसरों ने शुरू की थी, ब्रिटेन में उसे द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद समाप्त कर दी गई। जर्मन, इतालवी, अमेरिकी सेना में भी सेवादार नहीं हैं।
2007 में डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ  साइकोलॉजिकल रिसर्च ने ‘सहायकों’ के साथ गाली-गलौज, ग़ुलामों जैसा अपमानजनक सुलूक की भयावह रिपोर्ट पेश की थी। 2008 में प्रतिरक्षा मामलों की संसदीय समिति ने भी माना था कि उतनी संख्या में बाहरी व आंतरिक हमलों में सैनिकों की शहादत नहीं होती, जितनी कि बदइंतजामी और अपमान के शिकार सिपाही आत्महत्या कर लेते हैं, या ग़ुस्से में अपने सहकर्मियों की जान ले लेते हैं। 12 जनवरी 2017 को औरंगाबाद में सीआईएसएफ  के एक जवान ने अपने चार साथियों को जिस तरह गोलियों से भून डाला, उससे नौ साल पहले कही बातें ताजा हो जाती हैं!
pushpr1@rediffmail.com


 

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