जनादेश 2019 तक, तो 2022 की बात क्यों?

कहानी को कैसे ट्विस्ट देना है, इस कला में मोदी माहिर हैं। मोदी ने कहा, '1942 अंतिम व्यापक जनसंघर्ष था, जिससे पांच साल की पीठिका तैयार हुई, और 1947 में देश को आज़ादी मिली...

पुष्परंजन
जनादेश 2019 तक, तो 2022 की बात क्यों?
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कहानी को कैसे ट्विस्ट देना है, इस कला में मोदी माहिर हैं। मोदी ने कहा, '1942 अंतिम व्यापक जनसंघर्ष था, जिससे पांच साल की पीठिका तैयार हुई, और 1947 में देश को आज़ादी मिली। वैसा ही कालखंड 2017 से 2022 के बीच तैयार होना चाहिए।उन्होंने दर्जन भर सपने गिनाये, और कहा कि 'हम आज से इन सपनों के लिए संकल्प ले रहे हैं, जिसे 2022 तक पूरा कर लेना है।सवाल यह है कि मोदी पांच साल का यह कालखंड क्यों तय कर रहे हैं?

गुजरात से सबक यही मिला है कि कांग्रेस विरोधियों के 'ओवर कॅान्फिडेंसका लाभ उठाकर वापिस कुर्सी पा सकती है। अहमद पटेल की फतह राहुल गांधी के रणनीतिक कौशल की वजह से नहीं हुई। जयराम रमेश ने सही इशारा किया है कि मुकाबला नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी से है, जिनकी राजनीतिक शैली आक्रामक ही नहीं, बिल्कुल अलग है।

 

युसूफ मेहरली को क्या आप जानते हैं? प्रधानमंत्री मोदी को भी पता नहीं कि युसूफ मेहरली थे कौन! प्रधानमंत्री ने 9 अगस्त को संसद में जो कहा, उसके एक छोटे से हिस्से को ध्यान से समझने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, '... पूरे गांधी के चिंतन, मनन, आचार और विचार को देखें, तो उससे हटकर के घटना घटी। इस महापुरुष ने कहा, करेंगे या मरेंगे। गांधी के मुंह से 'करेंगे या मरेंगे’ शब्द देश के लिए अजूबा था।’ पीएम मोदी संसद में 'करेंगे या मरेंगे’ पर एक तरह से चकित होने का अभिनय करते हुए सवाल भी कर रहे थे कि अहिंसा के पुजारी के मुंह से 'करेंगे या मरेंगे’ जैसी कठोर बात निकली क्यों। एक तरह से महात्मा गांधी की अहिंसा वाली छवि की हत्या शब्दों के ज़रिये हो रही थी। और उस समय पूरी संसद मौन। बिल्कुल मूकदर्शक!

संसद में ज्ञान पीठिका प्रस्तुत कर रहे प्रधानमंत्री को उस युसूफ मेहरली का पता नहीं था, जिन्होंने सर्वप्रथम 'क्विट इंडिया’ (भारत छोड़ो) का नारा दिया था। 'कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ के संस्थापक सदस्य और मुंबई के मेयर रह चुके युसूफ मेहरली ही वह नेता थे, जिन्होंने 'साइमन कमीशन गो बैक’ का नारा दिया था। पीएम मोदी अगस्त क्रांति की सारी कहानी संसद में कह गये, पर जिसने 'क्विट इंडिया’ का क्रांतिकारी शीर्षक दिया था, वह शख्स जंगे आज़ादी की स्मरण पुस्तिका के हाशिये पर भी नहीं था। युसूफ मेहरली का यह हश्र होगा, इस पर हम अफसोस ही व्यक्त कर सकते हैं। मगर, जो एक दूसरा विषय था, वह तो अपेक्षित था कि ऐसा होगा। पीएम की ज्ञान पीठिका से सदा की तरह पंडित नेहरू गायब थे। जो संसद में उनके अभिभाषण के बाद चाय की दुकान से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चा का विषय था।

संसद में प्रधानमंत्री मोदी ने अगस्त क्रांति की 75वीं वर्षगांठ को दो हिस्सों में बांट रखा था। अतीत की उस कहानी में आज़ादी की लड़ाई में शामिल कई सेनानी थे। संसद में रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा लिखा संस्मरण 'जंज़ीरें और दीवारें’ को प्रधानमंत्री मोदी उद्धृत कर रहे थे, और सोहनलाल द्विवेदी को 'राष्ट्रकवि’ के रूप में संसद के रिकार्ड में शब्दांकित कर रहे थे। 'शब्दों की इस सर्जिकल स्ट्राइक’ में वो तमाम स्वतंत्रता सेनानी 'शहीद’ कर दिये गये, जो शाहे वक्त को पसंद नहीं थे।

खैर! कहानी को कैसे ट्विस्ट देना है, इस कला में मोदी माहिर हैं। मोदी ने कहा, '1942 अंतिम व्यापक जनसंघर्ष था, जिससे पांच साल की पीठिका तैयार हुई, और 1947 में देश को आज़ादी मिली। वैसा ही कालखंड 2017 से 2022 के बीच तैयार होना चाहिए। उन्होंने दर्जन भर सपने गिनाये, और कहा कि हम आज से इन सपनों के लिए संकल्प ले रहे हैं, जिसे 2022 तक पूरा कर लेना है।’ सवाल यह है कि मोदी पांच साल का यह कालखंड क्यों तय कर रहे हैं? उन्हें जनादेश मई 2019 के तीसरे हफ्ते तक का मिला हुआ है, तो 2022 का नाद नरेंद्र भाई मोदी ने क्यों आरंभ कर दिया है? बकौल वेंकैया नायडू, 'न्यू इंडिया को 'टीम इंडिया’ का समर्थन लेना है, जिसमें ब्लॉक से लेकर केंद्र तक का नेतृत्व जुड़ेगा।’ अब तो हर बात में 'इंडिया’-'इंडिया’ सुनते-सुनते पब्लिक पक गई है।

ऐसा लगता है, जैसे मोदी अभी-अभी चुनाव जीत कर आये हैं, और अगले पांच साल राज करेंगे। राज्यसभा में उनकी पार्टी का बहुमत हो जाना, 'समान विचारधारा’ के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति सह ऊपरी सदन के सभापति। और लोकसभा अध्यक्ष भी 'समान विचारधारा’ की।  दूसरी ओर कमज़ोर-बिखरा हुआ, अंतरर्विरोध व विघटन से आतंकित विपक्ष। भारतीय राजनीति के इतिहास में इस तरह की स्वेच्छाचारी सत्ता कभी-कभी किसी पार्टी को नसीब होती है। शुक्रवार से संसद के ऊपरी सदन की सूरत बदल सी गई सी दिखती है। विपक्ष को आगे से कैसे व्यवहार करना है, इसका रोड मैप अरुण जेटली, रविशंकर प्रसाद समेत सत्ता पक्ष के कई लोग कर रहे थे। अमित शाह के आने से राज्यसभा का अगला सत्र आक्रामक होगा, इसे तो तय मानिये। हालांकि, सभापति वेंकैया नायडू धन्यवाद ज्ञापन करते हुए स्पष्ट कर रहे थे कि किसने मुझे वोट दिया-नहीं दिया, यह अतीत का विषय है। अब मैं इस सदन में उपस्थित सभी पार्टियों का अज़ीज़ हूं। इस तरह का प्रवचन सुनने में अच्छा लगता है। मगर, नसीहत देने वाले उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को निष्पक्षता की अग्निपरीक्षा से निरंतर गुज़रना होगा।


दिक्कत की बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्री पिछले तीन साल का हिसाब देना नहीं चाहते। इस सरकार और समर्थकों ने तीन साल यह कहते निकाल लिये कि हम सत्तर साल का कचरा साफ कर रहे थे। अर्थात, 'डिलीवरी’ अब शुरू होगा। पीएम मोदी, 2022 तक जिन सपनों को पूरा करने का संकल्प संसद में ले रहे थे, उसका समय अब शुरू होता है। 'कौन बनेगा करोड़पति’ के उस प्रसिद्ध जुमले की तरह, 'योर टाइम स्टार्ट्स नाउ!’ अजब है, मोदी सरकार। जनता से बिना पूछे उस 'हॉट सीटपर बैठ गई है, और बार-बार 2022 अलाप रही है। यह सुनने के बाद आम आदमी के दिमाग में यही बैठने लगा है कि इस सरकार को 2019 से 2022 तक काम करना है।

मोदी और उनके अमले ने तीन साल में जुमलों का जो पहाड़ खड़ा किया है, उसे सिर्फ उद्धृत किया जाए तो पांच सौ पेज की पुस्तक तैयार हो जाएगी। एक ही कार्यक्रम के कम से कम एक दर्जन नाम। 'जीएसटी’ के शार्ट फार्म रोज़ नये रूप में प्रस्तुत हो रहे थे। 17 अप्रैल 2017 को भुवनेश्वर में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद से 'पी-टू, जी-टू’ चर्चा में है। सुनने में यह चिकनगुनिया और ज़ीका वायरस जैसा कुछ लगता है। यह 'पी-टू, जी-टू’ नाम नितिन गडकरी ने रखा है, जिसका पूरा मतलब है, 'प्रो पीपुल-प्रो एक्टिव, गुड गवर्नेंस’। उस बैठक में गडकरी ने कहा कि न्यू इंडिया-2022 की जो परिकल्पना प्रधानमंत्री मोदी ने कर रखी है, उसे पूरा करने का यह मंत्र है। अब कोई 'पी-टू, जी-टू’ के सूत्रधार गडकरी जी से पूछे कि उन्हीं के शहर नागपुर की सड़कों से मुंबई तक इतने गड्ढे क्यों हैं? उनसे यह भी पूछना चाहिये कि इस बरसात में देश भर में गड्ढों में गिरकर मरने वालों की संख्या में जो बेतहाशा वृद्धि हुई है, क्या वो उसकी ज़िम्मेदारी लेंगे, और क्या उन्हें भरने का काम 2022 में पूरा करायेंगे?

दरअसल, 2022 का अलाप ज़िम्मेदारी से भागने का ऐसा मार्ग है, जिसे योजनाबद्ध तरीके से प्रचारित किया जा रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं को भक्तगण यही बताएंगे कि न्यू इंडिया 2022 में साकार होगा, यही संकल्प तो 9 अगस्त 2017 को संसद में प्रधानमंत्री ने किया था। मगर, जो लक्ष्य 2019 तक के लिए निर्धारित किये गये थे, उसे सड़क पर साकार होते देखना तो छोडिय़े, क्या वे संसद में भी पूरे हो रहे हैं? उदाहरण के लिए मानसून सत्र है। इस बार संसद में बाधा और बहिष्कार का माहौल कम था, फिर भी 25 में से सिर्फ नौ विधेयक का पास होना सदन की धीमी गति की ओर इशारा करता है। संसद में 'टाइम मैनेजमेंट’, विपक्ष के सवालों और बहस के साथ लंबित बिल का पास होना सबसे बड़ी चुनौती है। वेंकैया नायडू इसी 'टाइम मैनेजमेंट’ पर राज्यसभा में बात कर रहे थे। मगर जब भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में थी, तब क्या कभी सोचा था कि संसद का समय और करदाताओं के करोड़ों रुपये क्यों बरबाद किये? आज का विपक्ष, विरोध का यह हुनर अपने पूर्ववर्ती से ही सीखा है।

प्रश्न यह है कि प्रतिपक्ष प्रधानमंत्री मोदी को 2022 तक का समय देने को तैयार है? इसमें दो राय नहीं कि कांग्रेस ने अहमद पटेल को राज्यसभा में दोबारा भेजने के वास्ते आक्रामक रुख अपनाया था। यही तेवर देश के एक-एक विधानसभा सीट के वास्ते कांग्रेस दिखाती तो आज स्थिति दूसरी होती। कांग्रेस के हर प्रत्याशी की हैसियत अहमद पटेल जैसी नहीं हो सकती, यह 10 जनपथ की राजनीति का एक सच है। इस 'सुलतानी सोच’ को कौन बदलेगा? अच्छा हुआ कि इस पूरी रणनीति में प्रशांत किशोर जैसे लोगों का सहयोग कांग्रेस ने नहीं लिया। गुजरात एक ऐसा अभेद दुर्ग है, जिसे कांग्रेस ने भेद दिया तो 2019 को वह मज़बूती से लड़ पायेगी। कांग्रेस ने अपने 14 विश्वासघाती विधायकों को निकाल बाहर कर कार्यकर्ताओं में ठीक संदेश भेजा है। 182 सदस्यीय गुजरात विधानसभा में कांग्रेस के अब 43 विधायक रह गये हैं। क्या भाजपा के 120 विधायकों के अच्छे दिन एक बार फिर नवंबर-दिसंबर के चुनाव में लौटेंगे? यह सवाल अमित शाह से नहीं, अब अहमद पटेल से पूछना चाहिए। गुजरात में सिर्फ 92 वोट से मोदी का केसरिया कि़ला ढह सकता है। लगातार पराभव के बाद कांग्रेस पांच राज्यों में सिमट कर रह गई। सवाल सिर्फ कांग्रेस का नहीं, पूरे विपक्ष के अस्तित्व का है। 

गुजरात से सबक यही मिला है कि कांग्रेस विरोधियों के 'ओवर कॅान्फिडेंस’ का लाभ उठाकर वापिस कुर्सी पा सकती है। अहमद पटेल की फतह राहुल गांधी के रणनीतिक कौशल की वजह से नहीं हुई। उस क्रेडिट के हकदार वो 43 एमएलए भी हैं, जो क़ैदी की तरह कष्ट काटते नेतृत्व के साथ खड़े रहे। यों, कांग्रेस की मौजूदा लीडरशिप के पास इंदिरा गांधी जैसा कौशल और करिश्मा नहीं है, यह बात निष्पक्ष चिंतन करने वाले कांग्रेसी भी स्वीकार करते हैं। जयराम रमेश ने सही इशारा किया है कि मुकाबला नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी से है, जिनकी राजनीतिक शैली आक्रामक ही नहीं, बिल्कुल अलग है। जयराम रमेश ने 'सुल्तान’ जैसा व्यवहार करने वाले कांग्रेस राजनेताओं की बात बहुत समय पर की है। अगर, अब भी होश में नहीं आये, तो मोदी का मिशन 2022 कहां रोक पायेंगे?

 

 

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