बजट : हावी रहेगा 2019 का  चुनाव

विकास और  लोकलुभावनता का मेल किस तरह किया जाए और फिर भी इसे एक जिम्मेदार वित्तीय प्रबंधन का रूप दिया जा सके...

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बजट : हावी रहेगा 2019 का  चुनाव
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- एस सेतुरमन

विकास और  लोकलुभावनता का मेल किस तरह किया जाए और फिर भी इसे एक जिम्मेदार वित्तीय प्रबंधन का रूप दिया जा सके? वित्त मंत्री को आर्थिक सुधारों को पीछे रखने के लिए भी जिम्मेदार ठहराया जाएगा। यह इसके बावजूद के जीएसटी की सार्थक पुनर्रचना के जरिए वह कुछ वाह-वाही हासिल कर लें। सिर्फ  बेहतर राजस्व ही नहीं, बल्कि राष्ट्रव्यापी समान टैक्स के लिए ही इसकी प्रशंसा होना चाहिए। ग्रामीण बदहाली समस्या को सुलझाए जाने का कोई भी तरीका है, ऐसा लगता है कि ढांचा निर्माण (सड़क, बंदरगाह, हवाई अड्डा आदि) पर खर्च बढ़ाने तथा ग्रामीण रोजगार कार्यक्रमों तथा सामाजिक सेवाओं पर खर्च के जरिए रोजगार बढ़ाना विचार करने योग्य है। यह बेहतर होगा कि ग्रामीण तथा शहरी रोजगार की संख्या भी निश्चित की जाए।

वित्त मंत्री अरूण जेटली आने वाले एक फरवरी को पेश कर रहे अपने पांचवी तथा इस सरकार के आखिरी बजट में कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। लोकसभा के 2019 के चुनावों के पहले आ रहे इस बजट में राजनीति पूरी तरह प्रभावी रहेगी। यह बजट अधपकी जीएसटी के लागू होने के कारण नीचे आ गई देश की वित्तीय व्यवस्था और पिछले चार सालों की अवधि में घरेलू निवेश को लगातार जारी रखने में विफल रही मोदी सरकार की विफलता की पृष्ठभूमि में पेश हो रहा है। 

वित्तीय घाटे के खिसकने के साथ-साथ मौजूदा वित्तीय स्थिति के बावजूद, क्या प्रधानमंत्री के गृह राज्य गुजरात में भाजपा की मामूली अंतर से जीत को जेटली नजरअंदाज कर सकते हैं? गंाव की बदहाली सबसे बड़ी चिंता के रूप में सामने आई है। नोटबंदी से प्रभावित एक और क्षेत्र मध्यम तथा लघु उद्योग क्षेत्र, जिसका अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है, को शासद वैसा फोकस नहीं मिले।  औद्योगिक क्षेत्र का पुनजीर्वित भी रुका पड़ा है।

विकास और  लोकलुभावनता का मेल किस तरह किया जाए और फिर भी इसे एक जिम्मेदार वित्तीय प्रबंधन का रूप दिया जा सके? वित्त मंत्री को आर्थिक सुधारों को पीछे रखने के लिए भी जिम्मेदार ठहराया जाएगा। यह इसके बावजूद के जीएसटी की सार्थक पुनर्रचना के जरिए वह कुछ वाह-वाही हासिल कर लें। सिर्फ बेहतर राजस्व ही नहीं, बल्कि राष्ट्रव्यापी समान टैक्स के लिए ही इसकी प्रशंसा होना चाहिए। ग्रामीण बदहाली समस्या को सुलझाए जाने का कोई भी तरीका है, ऐसा लगता है कि ढांचा निर्माण (सड़क, बंदरगाह, हवाई अड्डा आदि) पर खर्च बढ़ाने तथा ग्रामीण रोजगार कार्यक्रमों तथा सामाजिक सेवाओं पर खर्च के जरिए रोजगार बढ़ाना विचार करने योग्य है। यह बेहतर होगा कि ग्रामीण तथा शहरी रोजगार की संख्या भी निश्चित की जाए। 

वैश्विक वित्तीय बहस में ज्यादा सार्वजनिक खर्च जो नौकरी पैदा करने में 'समावेशी' हो को 'विकास अनुकूल' नीतियों में शुमार किया जाता है। एक नतीजा यह है कि कुल मांग तथा उपभोग और राजस्व को बढ़ाने के लिए विकास नीतियों में वित्तीय एकीकरण में सुधार किया जाए। जेटली अभी तक वित्तीय शुद्धतावादी बनने की कोशिश करते रहे हैं, लेकिन अब उन्हें अपना सुर बदलना पड़ेगा।

वास्तविकता से भागने वाले मोदी सरकार के भीतर के लोगों को छोड़कर, नवंबर, 2016 में किए गए नोटबंदी के कारण 2017 में विकास दर में चार साल के सबसे कम विकास दर 6.5 पर आने की संभावना सभी लोगों को दिखाई दे रही थी। कृषि तथा मैन्युफैक्चरिंग, वास्तविक तथा उत्पादक क्षेत्रों में इस साल भारी कमी आई, ऐसा सरकारी अंाकड़ों ने बताया। अगर ज्यादा वास्तविक सकल मूल्य संकलन (ग्रास वैल्यू एडेड), उत्पादों पर शुद्ध टैक्स को लें तथा विकास दर 2016-17 के 6.5 से 2017-18 में 6.1 पर आ गया है। यह नोटबंदी प्रभाव का जारी रहने और जीएसटी का विफल क्रियान्वयन को दर्शाता है, जिसके कारण  आईएमएफ तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को भारत की विकास दर को संशोधित कर 6.2 से 6.6 के बीच रखना पड़ा।  


यह सच है कि दोषनिवारक सुधारों तथा अच्छे आर्थिक प्रदर्शन का अनुमान लगाकर, ये संस्थाएं 2018-19 के वित्तीय वर्ष में 7 से 7.5 प्रतिशत विकास दर का अनुमान लगा रही हैं। हालांकि केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के अंाकड़ों से शर्मिंदा होने के बावजूद जेटली अभी भी 11 से 12 प्रतिशत (वास्तविक अर्थो में 7 से ज्यादा) का अनुमान व्यक्त कर सकते हैं, जो निश्चित तौर पर सकल घरेलू उत्पाद में इस साल के कम आधार के हिसाब से अवश्य बढ़ी हुई होगी।

सुरक्षित राजनीतिक विकल्प अपनाते हुए काफी कुछ राजस्व अनुमानों पर निर्भर करेगा (जिसमें गैर-कर राजस्व पर ज्यादा निर्भरता तथा प्रत्यक्ष कर में मामूली हेरफेर की संभावना है) सार्वजनिक क्षेत्र में सीधे-सीधे निजीकरण  उदाहरणार्थ सार्वजनिक बैंकों में सरकारी संपत्ति को नीचे लाने जैसे कदमों को टाला जाएगा। दूसरे शब्दों में, लोकसभा चुनाव की तैयारी में कोई महा-विस्फोट नहीं होगा।

जीएसटी जिसमें राज्य भी हिस्सेदार हैं, का महत्वपूर्ण राजकोषीय योगदान होगा और ये आने वाले बजट के लिए लाभ के सौदे की निशानी बन सकते हैं। लेकिन चुनाव के पहले के बजट में खर्च वाला हिस्सा ज्यादातर महत्वपूर्ण होता है। विभिन्न मांगों में, ग्रामीण मांग को जेटली को प्राथमिकता मिलेगी। गुजरात के वोटरों ने ग्रामीण बदहाली से भाजपा की दूरी दिखा दी है। 

चिंता का सिर्फ  यही क्षेत्र नहीं हो सकता है। शहर में लाखों लोग बिना रोजगार के हैं और देशभर में वर्ग तथा जाति का संघर्ष चल रहा है। इनका संबंध आर्थिक अवसरों के अभाव से भी उतना ही है जितना दबंग समुदायों के उभार के कारण शुरू हुए संघर्ष से है।   

क्या दो सालों में बिगड़ी व्यापक अर्थव्यवस्था 2018-19 में स्थिरता की ओर आगे बढ़ेगी? 2018 में, निस्संदेह, भारत की विकास-संभावना उत्साहवर्धक नहीं है। उपभोक्ता सामग्रियों, खासकर, तेल की कीमत बढ़ती जा रही है। कृषि में उम्मीद से कम पैदावार के कारण बढ़ रही घरेलू मुद्रास्फीति के साथ तेल की कीमतों के लगभग 65 डालर प्रति बैरल हो जाने का बढ़ जाना ज्यादा चिंताजनक है। रिजर्व बैंक से 2018 में मुद्रा को लेकर किसी सहूलियत की उम्मीद नहीं है।

करीब 400 अरब डालर के विदेशी मुद्रा भंडार के बावजूद भारत का तेल आयात बिल इतना बढ़ेगा कि इसका प्रभाव भुगतान संतुलन और चालू खाता के घाटा पर पड़ेगा। यह पिछले तीन साल में तेल की कीमत में कमी के कारण हुए अप्रत्याशित लाभ के विपरीत दिशा में जाने के कारण होगा जिससे जेटली को बजट संतुलित करने में आसानी होगीे। अमेरिका के फेडरल रिजर्व ने ब्याज दर में बढ़ोतरी की घोषणा कर दी है। इससे ब्याज दर में विश्व स्तर पर ब्याज दर बढ़ रहा है। अमेरिका का वित्तीय बाजार इस पर उत्साहित रहा। भारत जैसी उभरती अर्थ-व्यवस्था को कुछ पूंजी पलायन का सामना करना पड़ सकता है।  पिछले 4 महीनों में मोदी सरकार न तो आंतरिक शांति स्थाापित कर पाई और न युवाओं को वायदा किए हुए रोजगार के साथ आर्थिक विकास कर पाई और दूसरी बार गद्दी पाने के लिए बेकरार प्रधानमंत्री  शायद ही इन चीजों को नजरअंदाज कर सकते हैं। 
 

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