आम बजट: रामराज्य आ ही गया!

चिन्मय मिश्र : इस बार आजाद भारत का (संख्या के हिसाब में) कौन सा बजट प्रस्तुत किया गया इस बारे में निश्चित जानकारी नहीं है,...

चिन्मय मिश्र

चिन्मय मिश्र
कबीर इस संसार कौ, समझाऊं कै बार।
पूंछ जो पकड़ै भेड़ की उतरा चाहै पार।।

-कबीर
इस बार आजाद भारत का (संख्या के हिसाब में) कौन सा बजट प्रस्तुत किया गया इस बारे में निश्चित जानकारी नहीं है, परंतु वर्तमान वित्तमंत्री ने लगातार अपना चौथा बजट प्रस्तुत किया। पिछले तीन बजट से तमाम लोग बजट को लेकर उन्हें कुछ-कुछ समझाना चाह रहे हैं, परंतु जेटली साहब भेड़ की नामालूम सी पंूछ के सहारे ही देश को पार लगाने की जिद पर अड़े हुए हैं। इस जिद का परिणाम यह निकल रहा है कि वह नदी के किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं तथा पूंछ छूट जाती है। और भेड़? उसका क्या? वह तो कामधेनु हो नहीं सकती। बहरहाल सन् 2017-18 का क्रांतिकारी बजट प्रस्तुत हो गया। वित्तमंत्री दो घंटे लगातार लोकसभा में पानी पी-पी कर बजट समझाते रहे, परंतु भाषण खत्म होते ही समझ में नहीं आया कि जेटली जी क्या करना और कहना चाह रहे थे। यह तो निश्चित है कि इतना रहस्यमय बजट पहले कभी नहीं आया। अंग्रेजी की एक मजेदार उक्ति का भावार्थ है, ‘मेरा कार्य इतना गुप्त है कि मैं खुद नहीं जानता मैं क्या कर रहा हंू।’ यदि आप गंभीरता के आदी हों तो ईसा को उद्धत कर सकते हैं कि ‘हे ईश्वर इन्हें माफ  कर देना क्योंकि यह नहीं जानते कि यह क्या कर रहे हैं।’
बजट सुनकर यह तो समझ में आया कि अंतत: रामराज्य आ ही गया है क्योंकि 10 लाख तालाब खोदे जा चुके हैं। दिसंबर में दिवंगत हुए अनुपम मिश्र अपने जीवनकाल में इस रहस्योद्घाटन से रुबरु हो जाते तो कितना अच्छा होता।  वे लगभग अचेत ही हो जाते जब उन्हें पता चलता कि इस साल 5 लाख अतिरिक्त  खेत तालाब (क्या खेत में बने गड्ढे को तालाब कहा जा सकता है) खोदे जाएंगे।  फादर आफ  नेशन (यानी राष्ट्रपिता) महात्मा गांधी की इतनी बार इस बजट में दुहाई दी गई कि यदि गांधीवादी अर्थशास्त्री डॉ. कुमारप्पा जिनका 125वां जयंती वर्ष है, जीवित होते तो खुशी से उछल जाते कि बापू द्वारा ग्रामीण भारत के विकास को लेकर देखा गया सपना अब पूरा होने को ही है और साबरमती आश्रम जिसका कि शताब्दी वर्ष है तथा सेवाग्राम को रौशनी से सरोबार कर दिया जाए! परंतु विशेष बात यह है कि पूरे बजट में हाथकरघा व हस्तशिल्प का तो नाम ही नहीं है जो कि कृषि के बाद सर्वाधिक रोजगार देते हैं।  गौरतलब है ऐसी अनदेखी उस कालखंड के बजट में हुई है जबकि नोटबंदी और अन्य तमाम राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय कारणों की वजह से उलट पलायन (रिवर्स माइग्रेशन) यानी बड़ी संख्या में लोग शहरों से वापस अपने गांवों व कस्बों की ओर लौटने को मजबूर हो गए हैं।
वित्तमंत्री ने तमाम तरह से मजाक उड़ाते, उलाहने देते, लानत सलामत देते, गुस्से से और भी जितने रस हो सकते हैं, से भारतीय समाज को गरियाया कि हम एक कर चोरी वाले समाज के हिस्से हैं। मगर गौर करिए अर्जुन सेनगुप्ता समिति की रिपोर्ट के अनुसार भारत के करीब 80 प्रतिशत लोग 20 रुपए प्रतिदिन से कम पर गुजारा करते हैं। चलिए नाक को दूसरे तरीके से पकडिय़े। भारत की 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। यानी इतने लोग आयकर की परिधि में ही नहीं आते! इसके अलावा इस बात की भी गणना कीजिए कि भारत की बेरोजगारी दर कितनी है? भारत की कुल आबादी का करीब 39 प्रतिशत बच्चे हैं। अपनी कमजोरियों को छुपाने के लिए इस तरह के गैरजरूरी आंकड़ेबाजी की कोई आवश्यकता ही नहीं है। भारतीय मध्यवर्ग को बिलावजह त्यागी बताने की प्रक्रिया में वह घमंडी होता जा रहा है और यह मानने लगा है कि उसके द्वारा दी गई कर राशि के बल पर ही देश चल रहा है। जबकि भारत के 95 प्रतिशत श्रमिक अनौपचारिक क्षेत्र में हैं, जो अप्रत्यक्ष करों का भुगतान कर इस देश को आर्थिक गति प्रदान कर रहे हैं। वित्तमंत्री ने आक्सफेम की उस रिपोर्ट को संसद में गर्व से क्यों नहीं बताया कि भारत की 50 प्रतिशत संपत्ति मात्र 56 लोगों के पास है और वे कितना कर भरते हैं?  कबीर कहते हैं:-
देह धरे को दंड है, सब काहू को होय।
ज्ञानी भुगते ज्ञान करि, मूरख भुगते रोय।।

परंतु साहब, हमारे यहां तो अब देह ही दंड हो गई है। कभी बीमार तो होइये। ठीक-ठाक इलाज कराया तो स्वयं तो क्या यदि पड़ोसी और रिश्तेदार अच्छे हुए तो वो भी कर्जदार हो जाएंगे। इस पूरे बजट में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर जिस तरह की बेरुखी और कल्पनाहीनता दिखाई दी वह वास्तव में शार्मिंदा करती है। गौर करिएगा, इस बार यानी सन् 2017-18 के बजट में स्वास्थ्य सेवाओं पर 0.3 प्रतिशत (शून्य दशमलव तीन प्रतिशत) बजट खर्च का प्रावधान है। वित्तमंत्री ने जिन लक्ष्यों को प्राप्त करने की बात की है वह वास्तव में प्रशंसा योग्य हैं, परंतु उनकी प्राप्ति? बजट में गुजरात और झारखंड में नए एम्स खोलने की बात कही गई है। वहीं भोपाल एम्स की स्थिति यह है कि वहां का स्त्री रोग विभाग अभी तक ठीक से संचालित नहीं हो पा रहा है। सभी विद्यार्थी इस विषय के व्यावहारिक ज्ञान हेतु म.प्र. सरकार के भोपाल स्थित ‘सुल्तानिया जनाना अस्पताल’ जाते हैं। भोपाल एम्स परियोजना 300 करोड़ रुपए की थी वह अब 1300 करोड़ रुपए की हो चुकी है और अधूरी है। बजट में चिकित्सा स्नातकोत्तर के लिए स्थान बढ़ाए गए हैं। क्या उनका फायदा ग्रामीण क्षेत्र या सार्वजनिक क्षेत्र को होगा? स्वास्थ्य सेवाओं को स्वास्थ्य बीमा का पर्याय बनाना राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध हो रहा है।
कबीर बहुत समझाते हुए कहते हैं,
सरपहिं दूध पिलाइये, दूधै विष है जाई।
ऐसा कोई नाई मिले, स्यंू सरपैं विष खाई।।

मोदी सरकार ने तमाम वायदे किए थे। परंतु नवाचार व दूरदृष्टि के अभाव में वे एक भी नई योजना ठीक से प्रारंभ नहीं कर सके। नोटबंदी जैसे आत्मघाती कदम ने पहले से ही रोजगार की कमी से जूझते देश को नए संकट में ला खड़ा किया है। किसान को ऋण माफी देने के बजाय वित्तमंत्री ने अंग्रेजी में भाषण देना छोडक़र लोकसभा अध्यक्ष का ध्यान अपनी ओर खींचकर हिंदी में कहा कि हमने इस वर्ष 10 लाख करोड़ रुपए कृषि ऋण का प्रावधान किया है। उन्होंने यह नहीं बताया कि इसमें से कितना ऋण वास्तविक किसानों को और कितना कृषि उत्पाद व्यवसायियों को मिलेगा? अभी किसानों को मात्र 15 प्रतिशत तक ऋण ही प्राप्त हो पाता है।
सरकार ने एक बार पुन: प्राथमिक शिक्षा की पूर्ण अवहेलना की है। शिक्षा का अधिकार कानून और सर्वशिक्षा अभियान का बजट महज 1,000 करोड़ रुपए बढ़ा। वहीं मध्यान्ह भोजन की मद में मात्र 300 करोड़ रुपए की वृद्धि हुई है। क्या इससे उन करोड़ों बच्चों का कुपोषण खत्म हो पाएगा जो कि पाठशाला जाते हैं? एक जरूरी बात छूटी जा रही थी। सरकार ने कहा है कि वह संस्थागत प्रसव के एवं टीकाकरण के बाद संबंधित मां को 6000 रुपए देगी! जिस मां ने घर में बच्चे को जन्म दिया क्या वह इस देश की नागरिक नहीं है? क्या हमारा संविधान ऐसे किसी भेदभाव की इजाजत देता है? यदि किसी महिला को समय पूर्व आकस्मिक प्रसव हो जाए तो? या सोचिए दुर्भाग्यवश: किसी महिला को मृत बच्चा पैदा हुआ या वह टीकाकरण अवधि के पूर्व असमय चल बसा तो? योजना का लाभ देने से पहले उसे न देने की परिकल्पना कर लेने में हमारा तंत्र अत्यन्त चतुर है। जबकि आवश्यकता इस बात की है कि गर्भधारण की अवधि के दौरान सहायता की आधी राशि और प्रसव के दिन ही बाकी की राशि संबंधित मां को दे दी जाए। और क्या लिखंू? जिस तरह आर्थिक सर्वेक्षण जैसा गंभीर दस्तावेज किस्से कहानी में बदल गया, उसी तरह बजट जैसा महत्वपूर्ण नीतिगत प्रपत्र नए किस्म की किस्सागोई को बढ़ावा दे रहा है। रेल जैसे महत्वपूर्ण विभाग की ऐसी दुर्गति कभी सपने में भी नहीं सोची थी। पर कितना लिखें? थोड़े को ज्यादा समझिये! खुद सोचिए, विचारिए और अपने पर तरस खाना छोडिय़े। कबीर होते तो शायद बजट पर यह प्रतिक्रिया देते:-
ऐसा कोई ना मिलै, जासौं रहिए लागि।
सब जग जरता देखिया, अपनी अपनी आगि।।        
 खिडक़ी से बाहर झांकिये रामराज्य अगले मोड़ तक पहुंच गया है।


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