बहसतलब हो ‘बनाना रिपब्लिक’

पुष्परंजन : कुछ दिन पहले ब्लादिमीर पुतिन ने प्रश्न किया था कि क्या अमेरिका ‘बनाना रिपब्लिक’ है? इस प्रश्न की वजह अमेरिका में मची चुनावी अफरातफरी थी।...

पुष्परंजन
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कुछ दिन पहले ब्लादिमीर पुतिन ने प्रश्न किया था कि क्या अमेरिका ‘बनाना रिपब्लिक’ है? इस प्रश्न की वजह अमेरिका में मची चुनावी अफरातफरी थी। उस समय बयानों के ऐसे-ऐसे गोले दगे, जिसका दुष्परिणाम अब सामने आ रहा है। अमेरिका में नस्लवादी हमले के शिकार सबसे पहले भारतीय ही हुए। यकीन नहीं होता कि यह सिलसिला थमेगा भी। जब किसी देश में गैर-जिम्मेदार तरीके से चुनाव लड़े जाएं, चुनाव आयोग मूकदर्शक हो जाए, सामाजिक-राजनीतिक विद्वेष चरम पर हो, बयान गाली-गलौज का रूप ले ले, नेता एक दूसरे के कपड़े फाडऩे पर आमादा हों, तो मान लेना चाहिए कि ‘बनाना रिपब्लिक’ का आगमन हो चुका है।
पांच राज्यों के चुनाव में हमने क्या पाया, उसके लिए चंद घंटे और इंतजार करना है। खोया तो हमने बहुत कुछ है। चुनावी मर्यादा की चिंदी-चिंदी हुई है। नई पीढ़ी को 56 इंच के सीने वाले हमारे विश्व नेता, और प्रांतीय क्षत्रपों ने संदेश दिया है कि अपने विरोधी को परास्त करने के वास्ते आप जमकर अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल कर सकते हैं, चुनाव आयोग कोई कार्रवाई नहीं करेगा। उत्तर प्रदेश के चुनावी परिदृश्य को गिनी•ा बुक में जगह मिलनी चाहिए। चुनाव आयोग से पूछा जाना चाहिए कि पैरा मिल्ट्री फोर्स उतारकर आप दो हफ्ते में भी इस महायज्ञ को क्यों नहीं संपन्न कर सकते थे? यूपी चुनाव को तो सबने मिलकर ‘द ग्रेट जंबो सर्कस’ बना दिया।
नेता लोग धर्म, संप्रदाय को बांटने वाले बयान देते रहे, कोई रोकने वाला नहीं था। जरूरी नहीं कि खून बहे, तभी उसे दंगा करार दिया जाए। शब्दों के जरिये भी दंगे जैसा $िफतनाअंगे्र•ा माहौल बनाया जा सकता है, यह यूपी के चुनाव में साबित हो गया है। इस ‘जुबानी दंगे’ को उत्तर प्रदेश की जनता ही नहीं, पूरा देश भुगत रहा था। इस तरह का खुला खेल फर्रूखाबादी के सामने चुनाव आयोग इतना बेबस, किंकर्तव्यविमूढ़ हो सकता है, ऐसा पहली बार देखा। इस समय मुख्य चुनाव आयुक्त को आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या सही मायने में उन्होंने, और उनकी टीम ने अपने दायित्व का निर्वाह किया है? ऐसे में देश के दसवें मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन की याद क्यों आती है। उत्तर प्रदेश के चुनाव आयुक्त को क्यों नहीं चाहिए था कि गायत्री प्रजापति की उम्मीदवारी ही रद्द कर देते? गिरफ्तारी, हाजिरी जिन्हें करानी है, कराते रहें। ‘कानून अपना काम कर रहा है’, एक ऐसा हास्यास्पद जुमला हो गया है, जिसका इस्तेमाल नेता और प्रवक्ता लगातार करते हुए अपनी खाल बचा रहे हैं।
इस असंतुलन पर विचार होना चाहिए कि क्यों गोवा, मणिपुर जैसे कम चर्चा वाले राज्यों में रिकार्ड तोड़ वोट डाले जाते हैं, और सर्वाधिक चर्चित, हंगामेदार, टेलीवि•ान का सबसे अधिक समय खाने वाले उत्तर प्रदेश में कम वोट पड़ते हैं। क्या राजनीति की गिरती साख, गैरजिम्मेदार व वायदे पूरे न करने वाली अहंकारी सत्ता, बेबस व जनता के बीच नहीं रहने वाला विपक्ष इन सबके लिए जिम्मेदार है? उत्तर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में जब असंतुलित विकास का मंजर दिखता है, तो लगता है कि अलग पूर्वांचल की मांग सही थी। मगर, इससे पहले जो हुआ, उसके परिणाम उल्टे निकले।
उत्तराखंड को यूपी से अलग हुए सोलह साल हो गये, लेकिन अब भी सडक़, स्वास्थ्य, बिजली, पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं पहाड़ तक नहीं पहुंची है। उत्तर काशी से पिथौरागढ़, हलद्वानी से हरिद्वार तक घूम लीजिए अधूरे विकास और इस वजह से राजनीति पर अविश्वास की एक जैसी कहानी है। यह नेशनल टीवी पर चर्चा का विषय नहीं है कि नैनीताल, श्रीनगर गढ़वाल, उत्तरकाशी के गांवों के लोगों ने वोट का बहिष्कार क्यों किया? उत्तर प्रदेश के महराजगंज, फतेहपुर खागा गांव के लोगों ने वोट नहीं डाले, तो यह चुनाव आयोग और निरंकुश केंद्र, राज्य सरकारों के लिए चिंता का विषय क्यों नहीं होना चाहिए? सिस्टम पर अविश्वास, लोगों का उस पर से टूटता भरोसा लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह साबित होगा।
‘बनाना रिपब्लिक’ में यह चिंतन का विषय नहीं है। लोग वोट नहीं देते हैं, तो हमारी बला से। ‘बनाना रिपब्लिक’ को ‘केला गणतंत्र’ कहें तो कई लोगों को आपत्ति हो सकती है। लेकिन दिशाहीन राजनीति और डोलती अर्थव्यवस्था के लिए ‘बनाना रिपब्लिक’ जैसे शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अमेरिकी लेखक ओ. हेनरी ने 1904 में अपनी पुस्तक ‘कैबेज एंड किंग्स’ में की थी। ओ. हेनरी 1896-97 में बैंक घोटाले के एक मामले में अमेरिका से गायब हो गये थे, और होंडुरास में शरण ली थी। उस दौरान मध्य अमेरिकी देश होंडुरास की राजनीतिक-सामाजिक पृष्ठभूमि पर हेनरी ने लघु कथाएं लिखी थीं। होंडुरास ही नहीं, मध्य अमेरिका के चार और देश ग्वाटेमाला, कोस्टारिका, पनामा, और निकारागुआ की राजनीति का रिमोट कंट्रोल भी ‘यूनाइटेड फ्रूट कंपनी’ के हाथों में थी।
 ‘यूनाइटेड फ्रूट कंपनी’ बनाने की पहल अमेरिकी केला व्यापारी माइनर सी.केंथ और ‘बोस्टन फ्रूट कंपनी’ के मालिक एंड्रयू प्रेस्टन ने 1899 में की थी। ‘यूनाइटेड फ्रूट कंपनी’ बनाने से पहले मध्य अमेरिका और दक्षिण अमेरिका में कैरेबियाई सागर से लगे कोलंबिया व उससे सटे इक्वाडोर तक पर इन दोनों अमेरिकी व्यापारियों ने ट्रांसपोर्ट व्यवसाय और केले की खेती पर अपना एकाधिकार जमा लिया था। उस दौर के एक सौ बारह साल गुजर गये। होंडुरास और दूसरे मध्य अमेरिकी देशों में खास बदलाव नहीं हो पाया है, बल्कि दुनिया के कई देश इसी राह पर हैं।
2011 दिसंबर में बर्लिन के हुम्बोल्ट विश्वविद्यालय में ‘बनाना वार, हू इज द विनर’ विषय पर जब बहस हुई, तब पता चला कि यूरोप और अमेरिका के फल और सब्जी व्यापार पर श्वेतों द्वारा संचालित दक्षिण, मध्य अमेरिका और अफ्रीका की कंपनियां अब भी काबिज हैं। यूरोप-अमेरिका में केला कंपनियां राजनीतिक दबाव समूह की शक्ल में हैं। इस समूह ने अपने प्रभामंडल का विस्तार किया, और अब भारत भी इसकी परिधि में है।
संयुक्त राष्ट्र की संस्था ‘फाओस्टाट’ के अनुसार, 2009 में पूरी दुनिया में नौ करोड़ 73 लाख मीट्रिक टन केले की पैदावार हुई थी। उस साल भारत दो करोड़ 60 लाख मीट्रिक टन केले की पैदावार कर विश्व भर में कीर्तिमान स्थापित कर चुका है। दुनिया भर में केले की जितनी खेती होती है, उसका 28 प्रतिशत पैदावार भारत में होती है। उसके बाद 9.3 प्रतिशत फिलीपींस में, चीन में 9.2 प्रतिशत, इक्वाडोर में 7.8 प्रतिशत और ब्राजील में 7 प्रतिशत केले की खेती होती है। कोलंबिया, कोस्टारिका, होंडुरास, गुआटेमाला का नंबर इन देशों के बाद है। अमेरिका में भले ही एक प्रतिशत केले की खेती होती है, पर इस व्यापार पर पहले अमेरिकी और दूसरे नंबर पर यूरोपीय निवेशकों का दबदबा है।
 भारत की राजनीति में केले का कितना रोल है? यह बहस का विषय हो सकता है, और नहीं भी। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अपने देश में 10 वर्षों में केले की कीमत में कई सौ फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। दस साल पहले दिल्ली जैसे महानगर में दस रुपये दर्जन वाला अच्छी किस्म का केला आज की तारीख में 80 से 100 रुपये दर्जन मिल रहा है। बड़े स्टोर और मॉल में पूरे ताम-झाम के साथ ‘इंपोर्टेड केले’ का स्टिकर लगा यह फल गरीबों की रसोई से गायब है, और संपन्न लोगों की डायनिंग टेबल की शोभा बढ़ा रहा है। महानगरों की तो छोडिय़े, गांव-कस्बों में भी केले की कीमत आम आदमी की औकात से बाहर हो गई हैै। केला ही क्यों, दूसरे फल-सब्जियों पर भी बिचौलियों का कब्जा है। बिचौलिये चाहें तो आलू सस्ता मिलेगा, वरना गेहूं की तरह सडक़ों पर पड़ा-पड़ा सड़ जाएगा। किसान, टमाटर सडक़ पर फेंकने को विवश होते रहेंगे। अफसोस कि यह चुनाव का विषय अंत तक नहीं बना, न बनेगा।
होंडूरास में एक सौ बारह साल पहले यही हालत थी। ओ. हेनरी की पुस्तक, ‘कैबेज एंड किंग्स’ पढिय़े, तो लगेगा जैसे तब के होंडुरास की नहीं, बल्कि आज के भारत की चर्चा हो रही है। उस दौर में कागजी मुद्रा ( पेपर मनी ) का इतना अवमूल्यन हो चुका था कि लोग झोली में नोट भरकर ले जाते, और बाजार से मुठ्ठी भर खाने की वस्तुएं लाते थे। होंडुरास में किसानों की जमीनों को निजी कंपनियां हथियाए जा रही थीं। भारत में भी यही हो रहा है। एक वक्त होंडूरास में निजी कंपनियों का इतना हौसला बढ़ चुका था कि सरकारी भूमि तक को हाथ लगाने में उन्हें कोई डर-भय नहीं था। सरकारी फ्राड, घोटाला, गबन, घूसखोरी चरम पर था। मंत्री से लेकर संतरी तक घूस लेना अपना मौलिक अधिकार समझते थे। बजट घाटे को आम करदाता की जेब से जबरदस्ती भरा जाता था। तब नाम के लिए होंडुरास में लोकतांत्रिक सरकार थी, पर लोगों ने इसे चोरों की सरकार (क्लिप्टोके्रसी) कहना आरंभ कर दिया था।
केला कभी राजनीति का भट्ठा बैठा सकता है, यह कोई सोच भी नहीं सकता था। 1950-55 के दस्तावेज बताते हैं कि केले के धंधे पर काबिज यूनाइटेड फ्रूट कंपनी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमैन और आइजनहावर तक के कान फूंकती थी कि ग्वाटेमाला, होंडूरास व कोस्टारिका जैसे देशों में किसकी सत्ता बनाये रखनी है, और किसकी बदलनी है। क्या अंदरखाने ऐसी ही स्थिति भारत में नहीं है?
25 जुलाई 2017 को यहां पर राष्ट्रपति चुनाव संभावित है। राष्ट्रपति चुनाव में मतदान की दृष्टि से उत्तर प्रदेश अहम इसलिए है, क्योंकि इस सूबे से सबसे अधिक 398 निर्वाचक आते हैं, जो बाकी राज्यों से सबसे ज़्यादा है। राज्यसभा में सदस्य संख्या बढ़ाने, और आने वाले दिनों में राष्ट्रपति प्रत्याशी को लेकर जो सियासी गुगली खेली जानी है, उससे कहीं न कहीं आभास होता है कि इस देश की राजनीति का रिमोट कंट्रोल किन्हीें और ताकतों के हाथ में है। क्या सचमुच अपना देश ‘बनाना रिपब्लिक’ की दिशा में बढ़ चला है?
pushpr1@rediffmail.com


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