पाकिस्तान को बस बधाई देते रहिए!

पुष्परंजन :सितंबर के आखिर में प्रधानमंत्री मोदी ने इसका संकल्प किया था कि पाकिस्तान को वह ‘आइसोलेट’ कर के रहेंगे। पाक को अलग-थलग करने की भीष्म प्रतिज्ञा के दो माह पूरे भी नहीं हुए कि प्रधानमंत्री मोदी...

पाकिस्तान को बस बधाई देते रहिए!
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सितंबर के आखिर में प्रधानमंत्री मोदी ने इसका संकल्प किया था कि पाकिस्तान को वह ‘आइसोलेट’ कर के रहेंगे। पाक को अलग-थलग करने की भीष्म प्रतिज्ञा के दो माह पूरे भी नहीं हुए कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने मित्र नवाज शरीफ  को जन्मदिन की बधाई दे डाली। ऐसी ही बधाई राहुल गांधी, सीताराम येचुरी, या प्रतिपक्ष के किसी नेता ने दी होती तो राष्ट्रवादी उनका जीना हराम कर चुके होते। मोदीजी की शुभकामना से यह संदेश पाकिस्तान में गया है कि भारत अब पहले से कहीं ज़्यादा ‘सॉफ्ट स्टेट’ है, और उरी जैसे हमले को भूलने में उसे दो माह से अधिक का समय नहीं लगता है।
हर साल 17 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी अपना जन्मदिन मनाते हैं। मगर, नाशुक्रा नवाज शरीफ ने एक बार भी मोदी को ‘हैप्पी बर्थ डे’ नहीं कहा होगा। नवाज शरीफ  की जफा में किस बात की जुस्तजू मोदी बार-बार कर रहे हैं, यह कूटनीति में माहिर लोगों के लिए एक मुश्किल सवाल है। जन्मदिन की शुभकामनाओं की कीमत भारत को अपने जवानों के खून से चुकानी होती है। पहले भी क्रिसमस के दिन प्रधानमंत्री मोदी लाहौर के जटी उमरा पैलेस में नवा•ा शरीफ को जन्मदिन का मुबारकबाद और उनकी नातिन की निकाह पर बधाई देने पहुंच गये थे। उसके हफ्ते भर बाद ही पठानकोट एयर बेस पर आतंकी हमला हो गया था।
2009 के बाद, 2016 कश्मीर के वास्ते सबसे अधिक खून-खच्चर वाला साल रहा है। दक्षिण एशिया में हिंसा और आतंक का डाटाबेस रखने वाले ‘साउथ एशिया टेररिजम पोर्टल’ के अनुसार, ‘20 नवंबर, 2016 तक जम्मू-कश्मीर में 233 लोगों की मौत हुई है। जिसमें 148 अतिवादी मारे गये, और सुरक्षाबलों के 74 जवान शहीद हुए हैं। शेष आम नागरिक मारे गये हैं।’ नोटबंदी के बाद घाटी में तीन बैंक डकैती, चार छोटे-बड़े आतंकी हमले ढोल की पोल खोल रहा है। एक साल में सिर्फ कश्मीर फं्रट पर भारतीय सुरक्षाबलों के 74 जवानों का शहीद होना मोदी सरकार के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। उधर, इंसानियत के दुश्मन नवा•ा शरीफ इसे अपनी उपलब्धि मानते हैं। पता नहीं, पाकिस्तान को ‘सबक सिखाने’ की सार्वजनिक धमकियां देकर हमारे मंत्री खुद का म•ााक क्यों बनाते हैं!
पाकिस्तान कहीं से ‘आइसोलेट’ नहीं हो सका है। बल्कि एक नये कूटनीतिक त्रिगुट का वह अहम हिस्सा बना है जिसमें रूस, चीन शामिल हैं। मास्को बैठक में अ$फगानिस्तान की रणनीति पर जब इन तीन देशों की बैठक हुई, तो काबुल में इसे लेकर काफी नाराजगी थी कि हमारे देश के भविष्य पर बात हो रही है, और हमें ही शामिल नहीं किया गया। अ$फ$गान संसद के स्पीकर अब्दुल रउफ इब्राहिमी ने $गनी सरकार से कहा कि वह मास्को से इस बारे में सवाल करे कि ऐसा क्यों हो रहा है, और उसकी मंशा क्या है। 2017 के प्रारंभ में ईरान से नाभिकीय नीति को लेकर अमेरिका की बातचीत होनी है। इसे लेकर तेहरान अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है, जिसे उकसाने में यह तिकड़ी सक्रिय है। ईरान,  कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात और तुर्की जैसे देश इस कैंप में जिस तरह से शामिल होते दिख रहे हैं, उससे 2017 में नये धु्रवीकरण के संकेत मिल रहे हैं।
 अ$फ$गानिस्तान में नई रणनीति पर रूस, चीन, और पाकिस्तान की मास्को बैठक में तालिबान से दोस्ती और आइसिस को बढऩे से रोकने को प्रमुख अजेंडा बनाया गया है। इस नई रणनीति ने वाशिंगटन तक को असहज किया है। वॉयस ऑफ अमेरिका के मुताबिक, ‘संयुक्त राष्ट्र में रूसी दूत विटली चुरकिन ने सुरक्षा परिषद् को सूचना दी कि आइसिस आतंकी सीरिया और इराक से भागकर अफ$गानिस्तान जैसे नये ठिकाने की तरफ रुख कर रहे हैं।  इससे रूस और सेंट्रल एशियाई देशों को खतरा है। तालिबान पर प्रतिबंध सुरक्षा परिषद् ने लगाया है, उसे हटाना होगा ताकि आइसिस को रोकने के वास्ते तालिब ताकतों का इस्तेमाल किया जा सके।’
रूसी दूत विटली चुरकिन के बयानों से इसका अंदाजा लग जाना चाहिए कि सुरक्षा परिषद् में तालिबान पर से प्रतिबंध हटाने, उसके नेता मौलवी हैबतुल्ला को मान्यता देने का प्रस्ताव चीन या रूस में से कोई भी स्थायी सदस्य दे सकता है। पाकिस्तान ऐसा इसलिए चाहेगा ताकि नये तालिबान नेतृत्व का इस्तेमाल अपनी सीमाओं से लेकर काबुल तक कर सके। अ$फ$गानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने अमृतसर के हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन में तालिबान, हक्कानी नेटवर्क, जुंदल्ला, लश्करे तैयबा जैसे दर्जनों आतंकी समूहों को एक सांस में गिन दिया था, जो सरहद पार पाकिस्तान से अ$फ$गानिस्तान में आतंक फैलाते हैं। लेकिन उन लफ्•ाों का कोई असर पाकिस्तान पर दिखा नहीं। बल्कि मास्को बैठक के जरिये माहौल ऐसा बना कि अब राष्ट्रपति अशरफ$गनी इस त्रिगुट के आगे हताश दिख रहे हैं।
कुछ हफ्ते पहले तक प्रधानमंत्री मोदी, अमृतसर में नवाज शरीफ के विदेश नीति सलाहकार सरताज अ•ाीज को अशरफ $गनी के माध्यम से खरी-खरी सुनाने को लेकर आत्ममुग्ध थे। मगर, वहां एक ऐसी कूटनीतिक चूक हुई जो ‘सार्क’ की तरह, हार्ट ऑफ एशिया की विफलता का सबब बनेगा। उस समय रूसी दूत जमीर कुवोलोव ने जब यह कहा कि पाकिस्तान की कठोर आलोचना हार्ट ऑफ एशिया के मंच पर ठीक नहीं था, तभी समझ जाना चाहिए था कि पाकिस्तान, अमृतसर में भी हाशिये पर नहीं था। आप पाकिस्तान की आलोचना करके भी उसकी अहमियत को रेखांकित कर रहे थे।
रूसी दूत कुवोलोव ने क्यों कहा, ‘हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन को ‘स्कोरिंग प्वाइंट’ के रूप में भारत और पाकिस्तान को नहीं इस्तेमाल करना चाहिए।’ अमृतसर में जो कुछ हुआ, तुर्कमेनिस्तान, तुर्की, और चीन के प्रतिनिधियों ने भी उत्साहवद्र्धक नहीं माना है। उसकी एक बड़ी वजह ग्वादर के बहाने बलूचिस्तान में जारी ‘ग्रेट गेम’ भी है। ग्वादर, बलुचिस्तान का ऐसा सामरिक बंदरगाह बन चुका है, जिसकी सुरक्षा के वास्ते चीन, रूस, तुर्कमेनिस्तान, ईरान साझा रूप से •िाम्मेदार होंगे, और उनमें खुफिया साझेदारी होगी। ऐसे में बलोच आंदोलन को बंगलादेश की तरह मदद मिलना लगभग असंभव सा दिखने लगा है।
मोदी जी के रणनीतिकारों ने बलूचिस्तान को पाकिस्तान से अलग करने के वास्ते जो ब्यूह रचना की थी, पाकिस्तान उसे अपनी कपट विद्या से तोडऩे में कामयाब भी हो सकता है। यह सच है कि आइसिस सेंट्रल एशिया से लेकर अ$फ$गानिस्तान तक अपनी धमक पैदा कर रहा है। आइसिस 2017 का नया सिरदर्द है, जो अ$फ$गानिस्तान में आया, तो कश्मीर उसका अगला निशाना हो सकता है। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी क्या करेंगे? क्या उन्हें ‘त्रिगुट’ से रणनीतिक साझीदारी करनी होगी? डोनाल्ड ट्रम्प की अफ$गान नीति अपने पूर्ववर्तियों की तरह रूस, चीन को निषेध करने वाली होगी, ऐसा नहीं लगता।
यों, आइसिस को रोकने के वास्ते जो रणनीति त्रिगुट (रूस, चीन और पाकिस्तान) ने रची है, उसे पाकिस्तान का मीडिया खतरनाक मान रहा है। डॉन ने 30 दिसंबर के संपादकीय में लिखा है कि आइसिस से तहरीके तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और अ$फ$गानिस्तान में पुरानी पीढ़ी के तालिबान नेता संपर्क साध रहे हैं, जिससे नये किस्म के संघर्ष का आगाज संभव है। डॉन अपने संपादकीय में लिखता है, ‘जैसा कि पहले एक लड़ाका गुट दूसरे ‘मिलीटेंट’ समूह से लड़ता था, उस कहानी को दोहराने से अच्छा यही होता कि सब मिलकर अफ$गान सरकार को मजबूत करते।’
मगर, नवाज शरीफ  जैसे नेता ऐसी नसीहत पर नजर नहीं डालते। उन्हें अ$फ$गानिस्तान के शासनाध्यक्ष अशरफ गनी से भी हिसाब चुकता करना है, जिनके कारण हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन में सरताज अ•ाीज की किरकिरी हुई थी। तालिबान चाहे आइसिस के समर्थक हों या विरोधी, दोनों का लक्ष्य अ$फ$गानिस्तान की सत्ता को अपने कंट्रोल में लेना है। अशर$फ गनी अपने तरीके से तालिबान नेताओं से निपट रहे थे, जिस वास्ते उन्होंने नवाज शरीफ और उनके सैन्य कमांडरों को किसी भी सलाह और हस्तक्षेप से दूर रखने की चेष्टा की थी। अ$फ$गानिस्तान के वास्ते भारत से निरंतर मिल रहा सैन्य सहयोग, अफ$गान नेशनल आर्मी को प्रशिक्षण, अ$फ$गानिस्तान की 820 में से सौ महिला सैनिकों को भारत में ट्रेनिंग, चीतल हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी रावलपिंडी को चुभती रही है। ओबामा प्रशासन ने परोक्ष रूप से चाहा था कि भारत की हिस्सेदारी अफगानिस्तान में बढ़े। मगर, अमेरिका का नया निजाम वैसा ही चाहेगा, जरूरी नहीं। ऐसे में भारत के पास क्या विकल्प हो सकते हैं, इस पर चिंतन के वास्ते ‘सात लोक कल्याण मार्ग’ के पास पता नहीं कितना समय है।
अफसोस कि मोदी की ‘बधाई कूटनीति’ को प्रेसिडेंट एलेक्ट डोनाल्ड ट्रम्प ने भी भाव नहीं दिया। अमेरिकी चुनाव अब अतीत की बात हो गई है, जब ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’, ‘ट्रम्प अमेरिका के मोदी हैं, मोदी अमेरिका के ट्रम्प’ जैसे हिंदू वोटरों को लुभाने वाले नारे लगे थे। नया निजाम अमेरिका की दक्षिण एशियाई कूटनीति को गुजराती ग्रहपथ से बाहर ले जाएगा, ऐसा भी संभव है। एक्सॉन मोबिल के सीईओ रेक्स टिलरसन के बतौर अमेरिकी विदेशमंत्री शपथ में कुछ दिन बाकी हैं, मगर इसकी संभावना तेज हो गई है कि ‘ग्लोबल फ्री मार्केट फॉर एनर्जी’ के सपने को टिलरसन साकार करेंगे। यह हाहाकारी कदम होगा। यों, तेल उत्पादक देशों का समूह ‘ओपेक’ भी चाह रहा है कि कच्चे तेल की कीमत 2017 में बढ़े। मार्च 2007 में टिलरसन ‘कौंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस’ में ‘ग्लोबल फ्री मार्केट फॉर एनर्जी’ की वकालत कर चुके हैं। तो क्या इससे दुनिया में ऊर्जा व्यापार की प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी? पेट्रोलियम उत्पाद महंगे होंगे? फिर, नोटबंदी, उसके बाद बेनामी संपत्तियों को खोद-खोद कर निकालने में उलझा भारत इस वास्ते कितना तैयार है? सोचिये और मंथन कीजिए!
pushpr1@rediffmail.com


 

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