दांव पर लगा राजनीतिक दलों का भविष्य

मैं तुम्हें पंत कहूं, तू मुझे निराला’। पटना के गांधी मैदान में प्रकाश उत्सव के आयोजन पर नीतीश और मोदी जब एक-दूसरे की प्रशंसा कर रहे थे ......

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दांव पर लगा राजनीतिक दलों का भविष्य
मैं तुम्हें पंत कहूं, तू मुझे निराला
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मैंतुझे पंत कहूं, तू मुझे निराला’। पटना के गांधी मैदान में प्रकाश उत्सव के आयोजन पर नीतीश और मोदी जब एक-दूसरे की प्रशंसा कर रहे थे, तो यह पुरानी फ़िकरेबाज़ी ताज़ा  हो गई। आप नशाबंदी की तारीफ कीजिए, मैं नोटबंदी की। क्या इसके दूरगामी नतीजे मार्च तक, या उसके बाद दिखेंगे? मंच पर नीतीश के बाजू में बैठे मंद-मंद मुस्कुरा रहे रविशंकर प्रसाद बेहतर बता सकते हैं कि पुराने पार्टनर की पॉलिटिक्स क्या है। राजनीति में गुण-दोष को पहचानने वाले ‘दीदावर’ मुश्किल से मिलते हैं। या तो प्रशंसा के पुल बांधने वाले मिलेंगे, या फिर निंदा की निरंतर बौछार करने वाले। इकबाल के एक मशहूर शेर की आखिरी लाइन है, ‘बड़ी मुश्किल से होता है, चमन में दीदावर पैदा।’ नीतीश कुमार राजनीति के ऐसे ही ‘दीदावर’ हैं, जिनकी वजह से अकेले लालू यादव किंकर्तव्यविमूढ़ नहीं हैं, राज्य से बाहर विपक्ष के बड़े-बड़े दिग्गज वैकल्पिक राजनीति की दिशा को लेकर दिग्भ्रमित हैं।

सुशासन बाबू को इस पर विचार करना चाहिए कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने ऐसा क्यों कहा कि देश में अस्थायी आर्थिक मंदी संभव है, और नोटबंदी से गरीबों की परेशानियां बढ़ी हैं। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बातों को गंभीरता से लेने की जरूरत इसलिए है, क्योंकि वर्तमान वित्त मंत्री अरुण जेटली के मुकाबले, प्रणब दा को योजना आयोग से लेकर वाणिज्य, उद्योग, वित्त, विदेश मंत्रालयों का लंबा अनुभव रहा है।

गुरु गोविंद सिंह की 350वीं जयंती पर जिन राजनेताओं ने पटना के समारोह में शिरकत की उन्हें लगता है कि पंजाब के सिख वोटरों के यहां भी उनकी हाजिरी लग गई। कुछ ऐसे भी तंगदिल नेता हैं, जिन्होंने गुरु गोविंद सिंह को मुगल शासकों का शत्रु होने के नाते उन्हें ‘हिंदुओं का रक्षक’ के रूप में रेखांकित किया है। वोट की राजनीति करने वाले भूल जाते हैं कि शस्त्र और शास्त्र से शब्द की चेतना जगाने वाले गुरु गोविंद सिंह ने सभी धर्मों को सम्मान दिया था। तीन सौ साल पहले ‘मानस की जात सब एकै पहचानो’, जैसे महान संदेश को क्यों इस देश के चुनावी शोर में गुम करने की कोशिश की जा रही है?

यह संयोग है कि गुरु गोविंद सिंह की 350वीं जयंती से चार दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने जाति, धर्म, समुदाय के नाम पर वोट मांगने पर पाबंदी लगाई है। मगर, इसका पालन कौन करेगा? मायावती जाति, धर्म आधारित टिकट बांटने का ऐलान इस तरह कर रही हैं, मानों सुप्रीम कोर्ट की पाबंदी की उन्हें कोई परवाह नहीं है। बहुत संभव है कि सपा, भाजपा, कांग्रेस और शेष दल सूची के आधार पर मतदाताओं को बतायें कि किस जात और धर्म के प्रत्याशियों को उन्होंने कितनी प्राथमिकता दीं हैं।

पहले की ही तरह उत्तर प्रदेश में चुनाव जाति और धर्म के आधार पर लड़ा जाएगा। 2012 में एम-वाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण सपा को रास आया था। पिछले चुनावों से सबक लेते हुए बहन जी ने बहुजन से सर्वजन की तरफ जो ‘पैराडाइम शिफ्ट’ किया है, वह उनकी अवसरवादी राजनीति का आखिरी दांव है। दूसरी ओर भाजपा चौदह साल के राजनीतिक वनवास से मुक्ति चाहती है। आखिरी बार 8 मार्च 2002 तक, एक साल 131 दिनों के लिए राजनाथ सिंह सूबे के मुख्यमंत्री बने थे। फिर उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग गया था।

कांग्रेस का वनवास तो इससे एकदम डबल है। 28 साल तक कांग्रेस का उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर रहना उसके संघर्षशील एवं समर्पित कार्यकर्ताओं के लिए सचमुच कष्टकारक है। कांग्रेस के अंतिम मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की कभी तूती बोलती थी। अब तिवारी जी को ‘मार्गदर्शक मंडल’ में भी शामिल करने तक को कोई कांग्रेसी तैयार नहीं है। यूपी में कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर का गुणा-भाग भी जाति, धर्म के इर्द-गिर्द है। शीला दीक्षित को ब्राह्मण चेहरा बनाकर पेश करने के पीछे किसका दिमाग लगा था? इस दफा प्रशांत किशोर की दुकानदारी भी दांव पर लगी है।  

दिक्कत सर्वे एजेंसियों के साथ भी है जो मुसलमान, दलित, अगड़ा, पिछड़ा वोटरों पर आधारित भविष्यवाणियों से बाहर नहीं निकल पातीं। गाजीपुर से लेकर गाजियाबाद तक के पत्रकार जाति, धर्म के आधार पर राजनीतिक विश्लेषण का सीमांकन करते हैं। केंद्र और राज्य का नेतृत्व नोटबंदी से हुई मौतें, उससे बढ़ी बेरोजगारी, अपराध, महंगाई, भ्रष्टाचार जैसे विषयों को सुनियोजित तरीके से हाशिये पर डालने का प्रयास करेगा। जाति और धर्म के असाध्य रोग से ग्रस्त राजनीति उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। इस बीमारी का विस्तार देशव्यापी है, और बाकी चार चुनावी राज्य भी बुरी तरह इसकी चपेट में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश तो दे दिया, मगर इस पर निगरानी कौन करेगा? और उल्लंघन करने वालों को चुनाव से निषेध के लिए कार्यपालिका-व्यवस्थापिका का कौन सा महकमा बीड़ा उठायेगा?


चुनाव आयोग की भी अपनी सीमाएं हैं। इस समय दो अहम फैसलों को लेकर पूरे देश की नज़र चुनाव आयोग पर है। संसद में आम बजट चुनाव बाद पेश किये जाने पर आयोग सहमत है या नहीं, और सिंबल के रूप ‘साइकिल’ अखिलेश या मुलायम सिंह में से किस खेमे को चुनाव आयोग देता है। अखिलेश ने जिस तरह 221 सपा विधायकों, और साठ एमएलसी के हस्ताक्षर वाले हलफनामा चुनाव आयोग को जमा किया है, उससे साइकिल पर उनकी दावेदारी निश्चित रूप से बढ़ी है।
दरअसल, साइकिल सिंबल से अधिक महत्वपूर्ण सपा नेताओं द्वारा जुटाया सैकड़ों करोड़ का खज़ाना है, जिसे आधिकारिक रूप से घोषित किया जाना बाकी है। जो राशि चुनाव आयोग के संज्ञान में है, उस पर सुना है कि बैंकों से निकासी पर अस्थायी रोक लगा दी गई है। एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफार्म (एडीआर) की सूचना है कि 2004 से 2015 तक समाजवादी पार्टी को 186 करोड़ 80 लाख रुपये चंदे के रूप में मिले थे। यों, पिता-पुत्र और चाचाओं की यह नूरा कुश्ती नई सरकार के गठन और उसके बाद तक चलती रहेगी। बिना ‘पेड न्यूज’ के इससे अच्छा मीडिया कवरेज और कहां मिलेगा?

नोटबंदी से देशव्यापी व्यापार और रोजगार का जिस तरह नाश हुआ है, मोदी सरकार मतदान पूर्व बजट के बहाने का डैमेज कंट्रोल चाहती है। पांच राज्यों के मतदाता भी मोदी सरकार की मंशा को अच्छे से समझ रहे हैं। अफसोस कि सरकार अहंकार और •िाद की •ाद से बाहर नहीं निकलना चाहती। रेल बजट अब फाइनेंस बिल (आम बजट) में समाहित है। उसे यदि मतदान के बाद भी सरकार पेश करे, तो हाहाकार नहीं मचना है। 1 फरवरी को अंतरिम बजट पेश कर सरकार खर्चे में आने वाली बाधाओं को दूर कर सकती है। बशर्ते चुनावी फायदे वाली घोषणाएं न हों। ऐसा 17 फरवरी, 2014 को हो चुका है, जब उस समय के वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने अंतरिम बजट पेश किया था।  5 मार्च 2014 को आम चुनाव की घोषणा हुई थी। तब यह मामला चुनाव आयोग की चौखट तक नहीं पहुंचा था। बाद में नई सरकार के गठन के बाद 10 जुलाई, 2014 को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट पेश किया था।

अब तक चुनाव आयोग ने जो कदम उठाये हैं, उससे निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह महकमा दबावमुक्त है। ताज़ा उदाहरण मणिपुर का है, जहां राष्ट्रपति शासन लगाने और चुनाव नहीं कराने का प्रपंच रचा जा चुका था। जिस दिन चुनाव की तारीख की घोषणा होनी थी, उस दिन मणिपुर के मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह अपने विधायकों के साथ नई दिल्ली में थे। साठ सदस्यीय मणिपुर विधानसभा में कांग्रेस के 49 विधायक हैं। मुख्यमंत्री इबोबी सिंह ने राष्ट्रपति और चुनाव आयोग से मिलने का समय मांगा था।  चुनाव आयोग ने दबाव की परवाह न करते हुए मणिपुर में मतदान कराने का फैसला लेकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हरण करने वालों को हतोत्साहित किया है।

9 दिसंबर, 2016 को सात नये जिलों की घोषणा के बाद से इंफाल घाटी सुलग रहा है। नवंबर से ही ‘नगालिम’ समर्थक नेता सदर हिल और •िाबीराम जिले के निर्माण का विरोध कर रहे थे। सात नये जिलों को मिलाकर मणिपुर में कुल सोलह जिले हो जाएंगे। नाकेबंदी करने वाली नगा आबादी को लग रहा है कि इस फैसले की आड़ में उनकी जमीनें छिनेंगी, और आबोदाना-आशियाना के अवसर मारे जाएंगे। नगालैंड, असम, मिजोरम और म्यांमार की सीमाओं से लगे मणिपुर में लगभग दो महीने से नाकेबंदी चल रही है। राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला भी अशांति के सवाल पर राष्ट्रपति शासन लगाने के पक्ष में रही हैं।  इस विचार को और विस्तार देने में मणिपुर भाजपा के इंचार्ज राम माधव की सक्रिय भूमिका रही है।  मैतेई, कुकी, नगा, और पंगल वनवासियों के बीच झगड़े इतने हैं कि इस सूबे की राजनीति का झोल समझना मुश्किल हो जाता है।

मणिपुर की कुल आबादी का 53 फीसद मैतेई हैं, जो घाटी में बसे हैं, जिसमें मैतेई मुसलमान पौने दो लाख हैं। इसलिए सूबे की सरकार कोई भी नीति बनाने से पहले मैतेई समुदाय के फायदे की सोचती है। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को मणिपुर में अपना मुस्तकबिल इसलिए दिखता है, क्योंकि आबादी का बड़ा हिस्सा हिंदू है। दूसरे नंबर पर ईसाई आबादी है। निश्चित रूप से मणिपुर के चुनाव में धार्मिक और कबीलाई भावनाएं भडक़ाई जाएंगी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का क्या होगा?

मणिपुर और उत्तराखंड दो ऐसे राज्य हैं, जहां कांग्रेस सत्ता में है। उसी तरह गोवा में भाजपा, और पंजाब में शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन सत्ता में है। मतलब, यूपी से अलग, दो-दो राज्यों में भाजपा और कांग्रेस को अपना अस्तित्व बचाना है, या फिर अपने प्रतिद्वंद्वी से सत्ता छीनना है। गनीमत है कि इन इलाकों में रणनीति बनाने का ठेका प्रशांत किशोर जैसे लोगों को कांग्रेस ने नहीं दिया है। गोवा और पंजाब में आम आदमी पार्टी का भविष्य दांव पर है, इनमें से एक भी राज्य उसके हाथ नहीं लगा, तो उसके विस्तार पर विराम सा लग जाएगा!

 

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