आतंक की आग में झुलसता पाक

अरविंद जयतिलक : पाकिस्तान के लाहौर स्थित पंजाब प्रांत की विधानसभा के निकट आत्मघाती हमले में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों समेत डेढ़ दर्जन से अधिक लोगों की मौत और प्रसिद्ध सूफी संत लाल शहबाज कलंदर की दरगाह ...

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आतंक की आग में झुलसता पाक
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अरविंद जयतिलक
पाकिस्तान के लाहौर स्थित पंजाब प्रांत की विधानसभा के निकट आत्मघाती हमले में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों समेत डेढ़ दर्जन से अधिक लोगों की मौत और प्रसिद्ध सूफी संत लाल शहबाज कलंदर की दरगाह पर इस्लामिक स्टेट के आतंकियों के हमले में 100 से अधिक लोगों की मौत से पाकिस्तान को समझ में आ जाना चाहिए कि आतंकियों को प्रश्रय देने का नतीजा कितना खतरनाक और पीड़ादायक होता है। एक हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान तालिबान से संबंध आतंकी संगठन जमात-उर-अहरार ने ली है, वहीं दूसरे हमले की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट ने ली है। यह भी संभव है कि इस्लामिक स्टेट पाकिस्तान पोषित आतंकी संगठनों की मदद से हमला किया हो। पर महत्वपूर्ण बात यह है कि पाकिस्तान इस आतंकी हमले से कोई सबक लेगा या आतंकवाद पर अपनी दोहरी नीति से बाज आएगा कहना मुश्किल है। ऐसा इसलिए कि जब भी ऐसे वीभत्सकारी हमले होते हैं पाकिस्तान आतंकी संगठनों से निपटने का तो ताल ठोकता है लेकिन चंद दिनों बाद ही वह आतंकियों को पुचकारने लगता है। इसका ज्वंलत प्रमाण पाकिस्तान का उच्चतम न्यायालय है जो कह चुका है कि नवाज सरकार आतंकी संगठनों के प्रति नरमी बरत रही है। याद होगा पिछले वर्ष जब अक्टूबर माह में पाकिस्तान तालिबान से संबंध आतंकी संगठन लश्कर-ए-झांगवी ने बलूचिस्तान की राजधानी क्वेेटा के पुलिस टे्रनिंग सेंटर को निशाना बनाया तब पाकिस्तान आतंकियों से सख्ती से निपटने का दावा किया था। इसके लिए उसने जांच आयोग भी बिठाया। जांच आयोग ने पाकिस्तान को झिडक़ते हुए अपनी रिपोर्ट में कहा कि पाकिस्तान को आतंकवाद के मामले में अपने दोहरे रवैये से बाज आना चाहिए। इस रिपोर्ट में जांच आयोग ने पाकिस्तान सरकार की इस बात के लिए भी आलोचना की कि उसके गृहमंत्री ने एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन के सरगना से मुलाकात की। मतलब साफ है कि पाकिस्तान सुधरने वाला नहीं है। ध्यान दें तो पाकिस्तान को खून के आंसू रुलाने वाले ये वही संगठन है जो अफगानिस्तान और भारत को समय-समय पर निशाना बनाते हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान उन्हें मदद देता है। ऐसे में इस निष्कर्ष पर पहुंचना बेमानी होगा कि पाकिस्तान ऐसे हमलों से सबक लेते हुए आतंकी संगठनों को खाद-पानी मुहैया कराना बंद करेगा। उसका मूल कारण यह है कि आतंकवाद पर पाकिस्तान की नीति गुड और बैड टेररिज्म में फंसी हुई है।
 यह विचित्र है कि एक ओर पाकिस्तान अपने ही पाले-पोसे गए आतंकी संगठनों से तबाह हो रहा है वहीं वह जैश-ए-मुहम्मद के सरगना मसूद अजहर और जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद को दुनिया के न•ारों से बचाए हुए है। सवाल लाजिमी है कि फिर पाकिस्तान इन आतंकियों को अपने कंधे पर बैठाकर जमात-उर-अहरार, लश्कर-ए-झांगवी और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान जैसे आतंकी संगठनों से मुकाबला कैसे करेगा? सच तो यह है कि अब पाकिस्तान के लिए आतंकी संगठनों से निपटना आसान नहीं रह गया है। यह अनगिनत बार रेखांकित हो चुका है कि पाकिस्तान की सेना एवं खुफिया एजेंसी आईएसआई आतंकी संगठनों से मिली हुई है और उन्हें आर्थिक मदद दे रही है। यह तथ्य भी सामने आ चुका है कि पाकिस्तान की सेना और आईएसआई के कुछ अधिकारी आतंकी संगठनों से मिलकर पाकिस्तान को अराजकता की आग में झोंक देना चाहते हैं और उनका इरादा ऐसे लोगों को खत्म करना भी है जो पाकिस्तान में लोकतंत्र को मजबूत होते देखना चाहते हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि राजनीतिक दलों के कुछ नेताओं का आतंकी संगठनों से संबंध है और वे पाकिस्तान में लोकतंत्र को फलने-फूलने देना नहीं चाहते। उनका मकसद राजनीतिक नेतृत्व को खत्म कर देश में इस्लामी या शरीया कानून स्थापित करना है। पाकिस्तान की सेना का रवैया भी ढेरों आशंकाएं पैदा करने वाला है। अब तो ऐसा प्रतीत होने लगा है कि वह स्वयं आतंकियों को उकसाने का काम कर रहा है। आतंकियों को लेकर पूर्व जनरल रह चुके राहिल शरीफ  की नरमी दुनिया के सामने उजागर हो चुकी है। वे किस तरह हाफिज सईद जैसे आतंकियों को खुलकर खेलने का मौका दे रहे थे उसे दुनिया देख चुकी है। गौर करें तो पाकिस्तान में आतंकियों की बढ़ती ताकत सिर्फ पाकिस्तान के लिए ही चिंता का विषय नहीं है, बल्कि यह विश्व बिरादरी के लिए भी खतरनाक है। इसलिए और भी कि पाकिस्तान एक परमाणु संपन्न देश है और उसके पास 200 से अधिक परमाणु बम और भयंकर आयुधों का जखीरा है। पाकिस्तान की सेना और सैन्य प्रतिष्ठानों पर बार-बार हो रहे आतंकी हमले से यह डर सताने लगा है कि अगर कहीं पाकिस्तान के परमाणु हथियार आतंकी संगठनों के हाथ लग गए तो क्या होगा? इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता कि परमाणु हथियार आतंकी संगठनों के हाथ नहीं लग सकते हैं। अमेरिका इसे लेकर चिंतित है और कहा भी जा रहा है कि वह पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को अपने कब्जे में लेने के लिए किसी आपात योजना पर काम कर रहा है।
 फिलहाल पाकिस्तान बारुद के ढेर पर है और उसे समझना होगा कि वह आतंकवाद को नेस्तनाबूद करके ही स्वयं को सुरक्षित रख सकता है। उसे गौर करना होगा कि मौजूदा दौर में वह आतंकवाद प्रभावित देशों में शीर्ष पर है। उसकी स्थिति इराक, सीरिया और लेबनान से भी बदतर है। उसकी राष्ट्रीय आंतरिक सुरक्षा नीति यानी एनआईएसपी के मुताबिक 2001 से 2015 के बीच हिंसा की 15000 से भी अधिक घटनाएं हो चुकी हैं। गौर करें तो यह आंकड़ा आईएसआईएस प्रभावित देशों मसलन सीरिया और इराक में हुई घटनाओं से कुछ ही कम है। अमेरिकी संगठन स्टार्ट की मानें तो पाकिस्तान में इराक से अधिक हमले हुए हैं। देखा जाए तो इसके लिए पाकिस्तान खुद जिम्मेदार है। वह अपनी धरती पर आतंकियों को प्रश्रय ही नहीं दे रखा है बल्कि विकास के लिए विदेशी संस्थाओं से मिलने वाली मदद को विकास पर खर्च करने के बजाय भारत-विरोधी आतंकी गतिविधियों पर लूटा रहा है। भारत द्वारा बार-बार पुख्ता सबूत दिए जाने के बाद भी वह मुंबई बम विस्फोट के मास्टरमाइंड दाऊद इब्राहिम जो उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई की निगरानी में है और वह उसे भारत को सौंपने को तैयार नहीं है। आतंकवाद पर उसके लचर रवैये का ही नतीजा है कि आज उसके एक बड़े भू-भाग पर परोक्ष रूप से आतंकियों का कब्जा हो चुका है। एक दशक से पाकिस्तान के हुक्मरान दहशतगर्दी को नेस्तनाबूद करने का राग अलाप रहे हैं लेकिन सच्चाई यह है कि वे दहशतगर्दों के खिलाफ नहीं हैं।
गत वर्ष भारत के पठानकोट में हुए आतंकी हमले के लिए जिम्मेदार जैश-ए-मुहम्मद के सरगना मसूद अजहर को बचाने के लिए जिस तरह चीन की शरण लिए हुए है उससे साफ है कि वह आतंकवाद को लेकर गंभीर नहीं है। अभी भी पाकिस्तान के पास वक्त है कि वह अपनी धरती को तबाह होने से बचाने के लिए कड़े फैसले ले और भारत व अमेरिका के साथ मिलकर अपने देश में पसरे आतंकी संगठनों को खत्म करे। उसे भारत-विरोधी नीति का भी परित्याग करना होगा। अगर वह यह सोचता है कि उसकी भूमि पर आश्रय लिए आतंकी संगठन सिर्फ भारत को ही क्षत-विक्षत करेंगे तो यह उसकी भूल है। हाल की खौफनाक घटनाओं को ध्यान में रखते हुए उसे अपनी भूमि पर पसरे आतंकी शिविरों को नष्ट करना चाहिए। उसे समझना चाहिए कि आतंकी संगठनों से मिल रही चुनौती से उसकी संप्रभुता और साख दोनों के लिए खतरा है। उसे भान होना चाहिए कि अब अमेरिका पहले जैसा नहीं रह गया। टं्रप का अमेरिका बदल रहा है और आतंकवाद को प्रश्रय देने वाले देशों के लिए उसका कपाट बंद हो रहा है। अभी तो अमेरिका ने पाकिस्तान के एक सांसद के लिए ही अपना द्वार बंद किया है। अगर पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आया तो उसे और भी भारी कीमत चुकानी होगी।


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