मोदी सरकार पर नज़र रखने में अब तक असफल रही कांग्रेस

यह सच है कि उन दिनों सभ्य समाज में कांग्रेस के प्रति बहुत ही तिरस्कार का भाव था लेकिन संजय गांधी और इंदिरा गांधी ने हिम्मत नहीं हारी। आज के विपक्षी नेताओं की स्थिति बिल्कुल अलग है। ...

मोदी सरकार पर नज़र रखने में अब तक असफल रही कांग्रेस
शेष नारायण सिंह

शेष नारायण सिंह

कांग्रेस का ड्राइंग रूम की पार्टी बन जाना इस देश की भावी राजनीति के लिए अच्छा संकेत नहीं है। कांग्रेस के राहुल गांधी टीम के मौजूदा नेता यह दावा करते हैं कि उनकी पार्टी महात्मा गांधी, सरदार पटेल, जवाहर लाल नेहरू की पार्टी है। बात बिल्कुल सही है। क्यों, जवाहर लाल नेहरू के वंशज उनकी पार्टी के सर्वोच्च नेता हैं। लेकिन क्या इन लुटियन की दिल्ली में रमण करने वाले नए कांग्रेसी नेताओं को मालूम नहीं है कि कांग्रेस के नेताओं ने आन्दोलन को देश की राजनीति का स्थायी भाव बना दिया था।

इसी मई में नरेंद्र मोदी सरकार के तीन साल पूरे हो गए। सरकार और उसके समर्थकों का दावा है कि भाजपा सरकार ने पिछले तीन वर्षों में हर क्षेत्र में सफलता की बुलंदियां हासिल की हैं, विदेश नीति से लेकर महंगाई, बेरोजगारी, कानून व्यवस्था सभी क्षेत्रों में सफलता के रिकार्ड बनाए गए हैं, ऐसा भाजपा वालों का दावा है। यह अलग बात है कि इन सभी क्षेत्रों में सरकार की सफलता संदिग्ध हैं। महंगाई कहीं कम नहीं हुई है, चुनाव अभियान के दौरान भाजपा ने जिन करोड़ों नौकरियों का वादा किया था, वह कहीं भी नज़र नहीं आ रही है। खासतौर से ग्रामीण इलाकों में चारों तरफ बेरोजगार नौजवानों के हुजूम देखे जा सकते हैं। किसानों की हालत जो पिछले 40 वर्षों से खराब होना शुरू हुई थी वह बद से बदतर होती जा रही है। उत्तर प्रदेश और बिहार के अवधी, भोजपुरी इलाकों से नौजवान बड़ी संख्या में देश के औद्योगिक नगरों की तरफ पलायन करते थे और छोटी मोटी नौकरियां हासिल करते थे, वह पूरी तरह ठप्प है। लेकिन भाजपा के प्रवक्ता आपको ऐसे ऐसे आंकड़े दिखा देंगे कि लगेगा कि आपकी जमीन से इकट्ठा की गई जानकारी गलत है, वास्तव में देश तरक्की कर रहा है, चारों तरफ खुशहाली है, नौजवान बहुत खुश हैं और अच्छे दिन आ चुके हैं।

मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने की खुशी में टेलिविजन चैनलों पर बहसों का मौसम शुरू हो गया है। भाजपा के कुशाग्रबुद्धि प्रवक्ता वहां मौजूद रहते हैं और पूरी दुनिया को बताते रहते हैं कि पिछले तीन वर्षों में सब कुछ बदल गया है। ऐसे ही एक डिबेट में शामिल होने का मौका मिला। भाजपा के प्रवक्ता ने अच्छी तरह अपनी बात रखी जो उनको रखना चाहिए। यह उनका फर्ज है।

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इसी डिबेट में कांग्रेस प्रवक्ता भी थे। तेज तर्रार नौजवान नेता। राहुल गांधी की राजनीति के अलमबरदार। लेकिन उनके पास भाजपा के प्रवक्ता का विरोध करने के लिए कोई तैयारी नहीं थी। लगातार नरेंद्र मोदी पर हमले करते रहे। अपने हस्तक्षेप के दौरान कई बार उन्होंने नरेंद्र मोदी या प्रधानमंत्री शब्द का बार-बार उल्लेख किया और बहस में भाजपा सरकार की खामियों को गिनाने के लिए केवल नरेंद्र मोदी का सहारा लेने की कोशिश करते रहे। जब डिबेट में मौजूद पत्रकारों ने उनको याद दिलाया कि अगर आपकी बात को सच मान भी लिया जाए कि पिछले तीन वर्षों में सरकार ने जनहित का कोई काम नहीं किया है और हर मोर्चे पर फेल रही है तो आप लोगों ने सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का कर्तव्य क्यों नहीं निभाया, कांग्रेस ने सरकार की असफलताओं को उजागर करने के लिए कोई जन-आन्दोलन क्यों नहीं शुरू किया। क्यों आप लोग टेलिविजन कैमरों और अपनी पार्टी के दफ्तरों के अलावा कहीं नज़र नहीं आए तो उनके पास बगलें झांकने के अलावा कोई जवाब नहीं था। बड़ी खींचतान के बाद उन्होंने रहस्योद्घाटन किया कि पिछले दिनों जंतर मंतर पर तमिलनाडु से आये किसानों का जो विरोध देखा गया था, वह कांग्रेस द्वारा आयोजित था। जाहिर है और किसी आन्दोलन का जिक्र नहीं किया जा सकता था क्योंकि कहीं कुछ था ही नहीं। ऐसी हालत में एक ऐसे आन्दोलन को अपना बनाकर पेश करने की कोशिश की गई जिसमें कांग्रेस की भूमिका केवल यह थी कि उनके आला नेता, राहुल गांधी किसानों के उन आन्दोलन से सहानुभूति जताने जंतर मंतर गए थे, कुछ देर बैठे थे और उस मुद्दे पर उनकी पार्टी ने बयान आदि देने की रस्म अदायगी की थी।

सवाल यह उठता है कि क्या मुख्य विपक्षी दल का कर्तव्य यहीं खत्म हो जाता है। क्या लोकतंत्र में यह जरूरी नहीं कि सरकार अपनी राजनीतिक समझ के हिसाब से जनहित और राष्ट्रहित के कार्यक्रम लागू करती रहे और अगर उसकी सफलता संदिग्ध हो तो जनता के बीच जाकर या किसी भी तरीके से विपक्षी पार्टियां सरकार की कमियों को बहस के दायरे में लायें या विपक्ष की यही भूमिका है कि वह इस बात का इंतजार करे कि 2019 तक जनता भाजपा से निराश हो जायेगी और फिर से कांग्रेस सहित विपक्षी दलों को सत्ता थमा देगी। फिलहाल यही माहौल है। कहीं कुछ भी विरोध देखा नहीं जा रहा है।


कांग्रेस का ड्राइंग रूम की पार्टी बन जाना इस देश की भावी राजनीति के लिए अच्छा संकेत नहीं है। कांग्रेस के राहुल गांधी टीम के मौजूदा नेता यह दावा करते हैं कि उनकी पार्टी महात्मा गांधी, सरदार पटेल, जवाहर लाल नेहरू की पार्टी है। बात बिल्कुल सही है। क्यों, जवाहर लाल नेहरू के वंशज उनकी पार्टी के सर्वोच्च नेता हैं। लेकिन क्या इन लुटियन की दिल्ली में रमण करने वाले नए कांग्रेसी नेताओं को मालूम नहीं है कि कांग्रेस के नेताओं ने आन्दोलन को देश की राजनीति का स्थायी भाव बना दिया था। 1920 से लेकर 1946 तक कांग्रेस ब्रिटिश साम्राज्य की कमियों को हर मोर्चे पर बेपरदा किया था जहां भी संभव था। 1947 के पहले कांग्रेस के तीन बड़े आन्दोलन राजनीतिक आचरण के विश्व इतिहास में जिस सम्मान से उद्धृत किये जाते हैं उसपर कोई भी देश या समाज गर्व कर सकता है। 1920 का महात्मा गांधी का आन्दोलन इतना जबरदस्त था कि भारत की जनता की एकजुटता को खंडित करने के लिए उस वक्त के हुक्मरानों को सारे घोड़े खोलने पड़े थे। 1920 के आन्दोलन के बाद ही ऐसा माहौल बना था कि अंग्रेजों ने अपने वफादार भारतीयों को आगे करके कई ऐसे संगठन बनवाये जिनके कारण भारतीय अवाम की एकता को तोडऩे में उनको सफलता मिली। कांग्रेस के 1930 के आन्दोलन का ही नतीजा था कि महात्मा गांधी ने अंग्रेजों को मजबूर कर दिया कि वह भारतीयों के साथ मिलकर देश पर शासन करें। 1935 का गवर्नमेंट आफ इण्डिया एक्ट कांग्रेस की अगुवाई में चले आन्दोलन का ही नतीजा था। यह भी सच है कि अंग्रेज़ शासकों ने भारत की राजनीतिक एकता को खत्म करने के बहुत सारे प्रयास किये लेकिन कहीं कोई सफलता नहीं मिली। शायद राजनीतिक आन्दोलन के इसी जज्बे का नतीजा था कि 1942 में जब महात्मा गांधी के साथ खड़े देश ने नारा दिया कि अंग्रेजों 'भारत छोड़ो’ तो ब्रिटिश हुकूमत ने इन शोषित पीड़ित लोगों की आवाज को हुक्म माना और उनको साफ लग गया कि भारत की एकजुट राजनीतिक ताकत के सामने टिक पाना नामुमकिन था। राजनीति की इस परम्परा का वारिस होने का दावा करने वाली कांग्रेस के मौजूदा नेताओं का वातानुकूलित माहौल से बाहर न निकलने का आग्रह समझ परे है।

मौजूदा कांग्रेस नेताओं से गांधी-नेहरू परम्परा की उम्मीद भी नहीं है लेकिन राहुल गांधी की दादी और चाचा की राजनीति की उम्मीद तो की ही जा सकती है। जब 1977 में भारी जनाक्रोश के बाद इंदिरा गांधी की सरकार बेदखल कर दी गई थी तो सत्ता को अपनी हैसियत से जोड़ चुके संजय गांधी के सामने मुश्किलें बहुत थीं। इमरजेंसी के उनके कारनामों की जांच के लिए शाह आयोग बना दिया गया था, जनता का भारी विरोध था, गली-गली में कांग्रेस और इंदिरा-संजय की टोली की निंदा हो रही थी। इमरजेंसी में कांग्रेस के बड़े नेता रहे लोग जनता पार्टी की शरण में जा चुके थे। कांग्रेस के लिए चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा था लेकिन कांग्रेस ने सड़क पर आने का फैसला किया। एक दिन दिल्ली की सड़कों पर चलने वालों देखा कि काले पेंट से दिल्ली की दीवारें पेंट कर दी गई थीं और लिखा था कि 'शाह आयोग नाटक है’ शाह आयोग को इमरजेंसी की ज्यादातियों की जांच करने के लिए मोरारजी देसाई सरकार ने स्थापित किया था। उसी के विरोध से तिरस्कृत कांग्रेस ने विरोध की बुनियाद डाल दी। यह सच है कि उन दिनों सभ्य समाज में कांग्रेस के प्रति बहुत ही तिरस्कार का भाव था लेकिन संजय गांधी और इंदिरा गांधी ने हिम्मत नहीं हारी। बहुत सारे ऐसे नौजवानों को संजय गांधी ने इकट्ठा किया जिनको भला आदमी नहीं माना जा सकता था लेकिन उनके सहारे ही आन्दोलन खड़ा कर दिया और जनता पार्टी की सरकार के विरोधाभासों को बहस के दायरे में ला दिया। इंदिरा गांधी और संजय गांधी जेल भी गए और जब जेल से बाहर आये तो उनके साथ और बड़ी संख्या में लोग जुड़ते गए। नतीजा यह हुआ कि 1980 में कांग्रेस की धमाकेदार वापसी हुई। आज के कांग्रेस के आला नेता किसी आन्दोलन के बाद जेल जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। हां, यह संभव है कि उनको नेशनल हेराल्ड के केस में आपराधिक मामले में जेल जाना पड़ जाए।

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कांग्रेस ने 1999 से 2004 तक सोनिया गांधी के नेतृत्व में भी अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को लगातार घेरने की राजनीति की और सारे तामझाम, सारे मीडिया मैनेजमेंट, सारे शाइनिंग इण्डिया के बावजूद जनता ने कांग्रेस को फिर से सत्ता सौंप दी। सत्ता खंडित थी लेकिन बदलाव हुआ और बदलाव राजनीतिक आन्दोलन के रास्ते हुआ। यह जरूरी नहीं कि आन्दोलन के बाद सत्ता मिल ही जाए। सोशलिस्ट पार्टी के बड़े नेताओं, आचार्य नरेंद्र देव और डॉ. राम मनोहर लोहिया ने विपक्ष में रहते हुए जीवन भर उस वक्त की कांग्रेस सरकारों की खामियों को सड़क पर उतर कर जनता के सामने उजागर करते रहे। उन महान नेताओं को सत्ता कभी नहीं मिली लेकिन लोकतंत्र में जनता को यह अहसास हमेशा बना रहा कि उस दौर की सत्ताधारी पार्टी जो भी जनविरोधी काम कर रही है उसकी जानकारी नेताओं को है और वे उसके लिए संघर्ष कर रहे हैं। आज की सत्ताधारी पार्टी भाजपा भी जब विपक्ष में होती थी तो आम जनता को प्रभावित करने आले मुद्दों पर आन्दोलन का रास्ता अपनाती रही है। दिल्ली में रहने वालों को मालूम है कि जब तक मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे हर हफ्ते भाजपा की अलग-अलग इकाइयों का जंतर मंतर पर कोई न कोई आन्दोलन चलता ही रहता था।

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आज के विपक्षी नेताओं की स्थिति बिल्कुल अलग है। वे टेलिविजन की बाईट देते हैं, प्रेस कान्फ्रेंस करते हैं, लाखों की कारों में बैठकर संसद आते हैं, गपशप करते हैं, कभी कभार कुछ बोल देते हैं और उम्मीद करते हैं कि देश भर में रहने वाली जनता उनके वचनों को तलाश करके निकाले और उनके अनुसार पूरी तरह से नाकाम हो चुकी मोदी सरकार के खिलाफ 2019 में मतदान करे और हरे भरे दिल्ली शहर से बाहर गए बिना इन विपक्षी नेताओं को सत्ता सौंप दे। लेकिन राजनीति में ऐसा नहीं होता। यहां न कोई बिल्ली होती है और न कोई छींका टूटता है इसलिए सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी को अपना कर्तव्य सही तरह से निभाने के लिए जनता के बीच जाना होगा। उनको यह हमेशा ध्यान रखना होगा कि लोकतंत्र में सरकारी पक्ष की भूमिका पर निगरानी रखने और जनता को चौंकन्ना रखने के लिए विपक्ष होता है। आज की स्थिति यह है कि विपक्ष अपना काम सही तरीके से नहीं कर रहा है।

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