तो चुनाव की क्या जरूरत?

प्रभाकर चौबे : गोवा और मणिपुर में सरकार बनाने के वास्ते जिस तरह का खेल चला है उसे देखकर यह कहा जा सकता है कि अगर ऐसा ही खेलना है तो चुनाव की क्या जरूरत है हुजूर।...

प्रभाकर चौबे

प्रभाकर चौबे  :
गोवा और मणिपुर में सरकार बनाने के वास्ते जिस तरह का खेल चला है उसे देखकर यह कहा जा सकता है कि अगर ऐसा ही खेलना है तो चुनाव की क्या जरूरत है हुजूर। साफ कहो कि जो खेल में जीते वह सरकार बना ले। लोकतंत्र गुणा-भाग का अखाड़ा बन रहा है। इस हालत में जनता की क्या भूमिका- लोकतंत्र के बारे में यह पढ़ते-सुनते आये हैं कि- ‘जनता द्वारा जनता के लिए जनता की सरकार’- लगता है अब लोकतंत्र के इतने बूढ़े हो जाने पर यह कथन भी पुराना पड़ गया। इसने अपना अर्थ ही खो दिया और इतने वर्षों में इस कथन के चेहरे पर इतनी झुर्रियां आ गईं कि यह कथन अब पहचाना भी नहीं जा रहा। अब तो लोकतंत्र में सरकार की परिभाषा बदल दी जानी चाहिए वैसे पुस्तकों में भले पुरानी परिभाषा रहे लेकिन वास्तविकता में तो यह परिभाषा अब अपना मूल्य खो चुकी। अब लोकतंत्र में सरकार की परिभाषा इस तरह हो- कुछ सजोरों, कुछ सांठ-गांठ में माहिर लोगों द्वारा मिलकर बना ली गई सरकार मतलब लोकतंत्र में सरकार। सोचनीय बात है कि गोवा में मुख्यमंत्री सहित 6 मंत्री हारे और भाजपा पूर्व बहुमत से 8 कम रही लेकिन उसने जोड़-तोड़ कर बहुमत जुटा लिया और सरकार बना लिया। मजेदार बात यह कि राज्यपाल ने सबसे बड़ा दल के नाम पर भाजपा को सफल बनाने का न्यौता भी दे दिया। न देखा, न सुना, न पूछा कि भाई ये सदस्य किस तरह ले आए क्या खेल है? राज्यपाल अभिभूत हुये और शपथ लेने की तारीख तय कर दी। इतना ही करना है तो चुनाव की क्या जरूरत? बहरहाल शहंशाह फिल्म में नायक डायलाग बोलता है-‘ मैं ही पुलिस हूं, मैं ही कानून हूं, मैं ही कोर्ट हूं, मैं ही फैसला सुनाता हूं।’ गोवा में सरकार बनाने के लिए जो कुछ किया गया उसे देख-सुनकर यह डायलाग याद आया। भाजपा को यह डायलाग पूरे देश में बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाकर प्रदर्शित कर देना चाहिए और टी.वी. पर इस आशय का विज्ञापन भी लगा देना चाहिए। भाजपा को ऐलान कर देना चाहिए कि कोई जीते, हमें क्या? सरकार हम ही बनायेंगे। कुली फिल्म का नायक कहता है-‘जहां हम खड़े होते हैं लाईन वहां से शुरू होती है।’ भाजपा जहां है सरकार वही बनाती है। गोवा में कांग्रेस के 17 जीते, भाजपा के 13 लेकिन 17 वाला रह गया 13 वाले ने बहुमत जुटा लिया। राज्यपाल ने 17 को छोड़ा और भाजपा ने 17 वाले को अंगूठा दिखा दिया- यह है लोकतंत्र! इसे ही कहा जा रहा है कि हमारा लोकतंत्र परिपक्व हो रहा है। ऐसी परिपक्वता के गुण गाए जा रहे। फिर चुनाव क्यों हो। चुनाव में कितना तो खर्च होता है, कितनी तो परेशानी होती है। ‘न हो चुनाव, न हो परेशानी।’ सरकार चाहिये न, केन्द्र में जो हो वह डिक्लेयर कर दे, नामिनेट कर दे। कई बार रेफरी भी टीम की ओर से खेलता है। कुछ टीमें रेफरी पर ही निर्भर रहती हैं। एक और बात यह कि चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद और यह मालूम होने के बाद कि गोवा कांग्रेस को 17 सीट मिली है और बहुमत के लिए 21 चाहिए यह लगा था कि  कांग्रेस सरकार बना लेगी- सामान्य समझ। लेकिन जैसे ही खबर आई कि भाजपा गोवा में सरकार बनाने का दावा पेश कर सकती है और केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी गोवा भेजे जा रहे हैं, उसी क्षण यह विचार कौंधा कि अब भाजपा बहुमत जुटा लेगी। श्री गडकरी कोई जादू की छड़ी लेकर जा रहे हैं और जादू की छड़ी घुमाएंगे और भाजपा को सरकार बनाने वाला बहुमत मिल जायेगा। राजनीतिक में जादूगरी का बड़ा रोल होता है।
भाजपा को ऐसी क्या हड़बड़ी थी- कांग्रेस के 17 विधायक थे अगर वह सरकार बनाती तो बना लेने देना था- हाऊस में गिरा देती भाजपा- यह लोकतांत्रिक आचरण होता। अगर कांग्रेस हाऊस में अपना बहुमत सिद्ध नहीं कर पाती तो सरकार जाती। भाजपा को सामने आकर सरकार बनाने का दावा पेश करना था। लेकिन भाजपा हड़बड़ी में है। उसका बड़ा एजेंडा है। वह रुक नहीं सकती इसीलिए मणिपुर में भी सरकार बनाने भिड़  गई। वहां भी चार दिन भाजपा के प्रभारी बैठे रहे। मणिपुर में 69 सीट है भाजपा के पास 21 सीट थी और कांग्रेस के 28- बहुमत के लिये 3 जुटाने की जरूरत थी।
यह भी कि भाजपा इतनी अधीर क्यों हो गई। इस पर गौर किया जाना चाहिए। दरअसल भाजपा की न•ार राज्यसभा पर लगी है। राज्यसभा में उसका बहुमत नहीं है उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत मिला है- वहां से राज्यसभा के लिए सदस्य मिल जाये- उत्तराखंड से मिले, लेकिन उसे अच्छा खासा बहुमत चाहिये। अत: गोवा और अन्य छोटे राज्य भी चाहिये। भाजपा संविधान में बड़ा संशोधन करना चाहती हो शायद। भाजपा ने खुलकर तो कुछ कहा नहीं, लेकिन पूर्ण बहुमत आने पर वह क्या कर ले, कहा नहीं जा सकता। हो सकता है संसदीय प्रणाली ही बदल कर ‘राष्ट्रपति प्रणाली’ स्वीकार कर ले। भाजपा की मंशा की थाह पाना आसान नहीं। वह इशारों में बात करती है। इस तरह संविधान ही संकट में पड़ जायेगा। विविधताओं से पूर्ण देश में ‘एकरसता’ ला दी जायेगी।
लोकतंत्र भाजपा के लिए एक माध्यम है सत्ता तक पहुंचने का। लोकतंत्र को भाजपा एक कल्चर के रूप में स्वीकार नहीं कर सकती और इस दौर में पुन: राजतंत्र आ नहीं सकता अत: लोकतंत्र का फायदा उठा कर राजतंत्र की तरह आचरण वाली सरकार बने। भाजपा को अपना एजेंडा लागू करने की जल्दी है। 2019 पास होकर भी दूर है। एक तरह से अनिश्चित है क्योंकि रोजगार की भयानक स्थिति उपस्थित होने वाली है। पेंशन की, बचत खाते के ब्याजदर में भारी कमी के साथ ही तरह-तरह की वसूली कटौती और नियंत्रण से जनता में उद्वेलन पैदा होगा।  ज्यादा समय तक वह बर्दाश्त नहीं कर पायेगी। अत: भाजपा 2019 से पूर्व ही शायद वह सब कर लेना चाहती है जो उसके एजेंडा में है। इसीलिये प्रधानमंत्री मोदी जी बातें तो मीठी-मीठी करते हैं, मनभावन बातें करते हैं।  लेकिन लाभ कार्पोरेट को पहुंचा रहे हंै। यह सब सामने दिख रहा है पक्षपात पूर्ण मीडिया भी अपने में हास्यास्पद बन रहा है। अब मीडिया पर से भरोसा ही उठ गया है। चुनाव में जीते, चुनाव में हारे लेकिन गुणा-भाग में अव्वल और इसी के दम पर सरकार बना लो- यह हो गया है लोकतंत्र।
अब सवाल है कि गोवा में कांग्रेस क्यों सोई रही। उसने परिणाम आते ही आगे बढक़र सरकार बनाने का दावा पेश क्यों नहीं किया।  और पूर्व में कांग्रेस ने भी तो कई हथकंडे अपनाये हैं। राजनीति के खेल में पुराने खिलाड़ी हैं। परिपक्व है। राजनीति ‘खो’ में तो कांग्रेस नम्बर वन है। कई को ‘खो’ कर चुकी। फिर गोवा में किस तरह पिछड़ गई। एक कहावत है डाल का चूका बंदर और समय का चूका आदमी... दोनों गिरते हैं। फिर सम्भलने में वक्त लगता है।
गोवा और मणिपुर में भाजपा ने जो किया है और राज्यपाल जिस तरह की भूमिका में रहे उस पर खुलकर बात होनी चाहिए। पता नहीं गोवा की स्थिति को कितने लोग ठीक कहेंगे। हो सकता है भाजपा यह तर्क दे कि कुछ ने समर्थन दिया तो समर्थन लिया गया और समर्थन लेना गलत या अनैतिक कैसे हुआ...? यह तर्क सत्ता के मोह और अपना एजेंडा पूरा करने के उद्देश्य को लेकर ठीक हो सकता है। यह भी कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने भी ऐसा ही किया- पूर्व में बार-बार किया। जरूर किया। लेकिन उसका गलत काम करने से अपना गलत सही नहीं हो जाता। कोर्ट के फैसले पर भी खुलकर चर्चा हो- कोर्ट जनता से ऊपर नहीं है। जनता ही ऊपर है। कोर्ट ने कोई फैसला दिया तो चुप रहा जाये यह सामंती सोच है। लोकतंत्र में कोर्ट का फैसला भी चर्चा में आना चाहिये। साथ ही मुक्तिबोध की कविता-
दुनिया को हाट समझ
जन-जन के जीवन का
मांस काट
रक्त मांस विक्रय के
प्रदर्शन की प्रतिभा का
नया ठाठ...
शब्दों का अर्थ जब
नोच-खसोट लूट-पाट।

prabhakarchaube@gmail.com


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