कुंठा छुपाती नर्मदा सेवा यात्रा

नर्मदा बचाओ आंदोलन ने कभी भी अपनी गतिविधियों में हिंसा को कोई स्थान नहीं दिया। वे आज भी संघर्षरत हैं। यदि वे हारते हैं तो यह एक तरह से भारतीय लोकतंत्र मूल्यों की भी हार होगी।...

कुंठा छुपाती नर्मदा सेवा यात्रा
चिन्मय मिश्र

चिन्मय मिश्र

नर्मदा घाटी में बसा समुदाय पिछले 35 वर्षों से बिना थके अपनी लड़ाई लड़ रहा है। सर्वशक्तिमान सरकार के सामने इतने दिन सिर उठाकर संघर्ष करने वालों की जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है। नर्मदा बचाओ आंदोलन ने कभी भी अपनी गतिविधियों में हिंसा को कोई स्थान नहीं दिया। वे आज भी संघर्षरत हैं। यदि वे हारते हैं तो यह एक तरह से भारतीय लोकतंत्र मूल्यों की भी हार होगी। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं कहा है कि उनके इस फैसले को 'नजीरन माना जाए। आने वाले कुछ दिन नर्मदा घाटी के लिए अत्यन्त चिन्ताजनक है। अब जमाना एक-दूसरे की पीठ ठोकने की बजाय पीठ खुजाने का आ गया है। 'जलपुरुषअपनी तरह से नदी बचाना चाहते हैं, और उसमें मनुष्य की कोई हैसियत नहीं है।

अपने जलबिन्दुओं से सिन्धु की उछलती हुई तरंगों में मनोहरता लाने वाली तथा शत्रुओं के पाप समूह के विरोध और कालरूप यमदूतों के भय को हरने वाली, अतएव सब भांति रक्षा करने वाली हे देवी नर्मदा! तुम्हारे जलयुत चरणकमलों को मैं प्रणाम करता हूं।

-नर्मदाष्टाकम (आदि शंकराचार्य)

अंतत: 150 दिवसीय नमामि देवी नर्मदे सेवा यात्रा संपन्न हो गई। उपहारस्वरूप मध्यप्रदेश को दो भयानक पुरस्कार भी प्राप्त हो गए। पहला नर्मदा पर बने सरदार सरोवर बांध जलाशय की डूब में आ रहे 192 गाँवों और कस्बों, निसरपुर और धरमपुरी की संभाव्य जलसमाधि और चुरका परमाणु संयंत्र को केन्द्रीय मंत्रीपरिषद की औपचारिक अनुमति। उधर स्वयंभू जलपुरुष राजेन्द्र सिंह ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को 'नदी नायक’ की उपाधि से विभूषित कर दिया। ऐसी उपाधि देने के पीछे कारण यह है कि मुख्यमंत्री ने 'राजकाज, समाज और संत को जोड़ने का अद्भुत कार्य किया। नीर, नदी और नारी का सम्मान किया है। इतना ही नहीं, इस 150 दिन की यात्रा में उन्होंने स्वयं 49 दिन भाग लिया, अपने अनुभव साझा किए और कहा कि धरती संकट में है। ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेंट चेंज की समस्या से धरती जूझ रही है।’ वास्तव में यह यात्रा अपनी कुंठा को छुपाना भर है।

परन्तु जलपुरुष ने यह नहीं बताया कि पिछले दिनों भोपाल स्थित प्रशासन अकादमी में जब बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने नर्मदा नदी संरक्षण विषय पर आयोजित सेमिनार में किसी भी आदिवासी की उपस्थिति न होने पर प्रश्न उठाया तो उसे एक अतिरिक्त मुख्य सचिव की कितनी लताड़ सहनी पड़ी थी। यह आलेख लिखने के दौरान ही समाचार मिला कि देश के पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे का असामयिक निधन हो गया है। हम (मैं और पत्नी) और वह कॉलेज में एक साथ थे। उनसे भी तमाम प्रश्न करने थे, नर्मदा को लेकर, लेकिन अब संभव नहीं। उन्हें प्रेमपूर्ण श्रद्धांजलि। पुन: मुख्य विषय पर लौटते हैं। इस नर्मदा सेवा यात्रा के वास्तविक निहितार्थ क्या है? यदि अवैध खनन रोकना था, तो वह तो अभी भी निर्बाध जारी है। हरदा जिले में नर्मदाघाटी विकास राज्यमंत्री लालसिंह आर्य के काफिले को स्थानीय भाजपा विधायक कमल पटेल ने रोका और नदी तटों पर ले जाकर दिखाया कि पोकलेन व जेसीबी से अवैध रेत खनन हो रहा है और प्रशासन आंख मुंदे है। विधायक ने अपने नाम से 'कमल सेना’ का गठन किया है, जो अब अवैध खनन को रोकेगी। गौभक्तों के बाद अब रेतभक्तों की सेना भी तैयार है। पुलिस थानों को सिर्फ तालों का इंतजार है।

'तुम्हारे जल में लीन हुए उन दीन हीन मीनों को अन्य में स्वर्ग देने वाले और कलियुग की पापराशि का भार हरने वाले, समस्त तीर्थों में अग्रगण्य। अत: मच्छ-कच्छ आदि जलचरों तथा चकई चकवा आदि नभचर प्राणियों को सदैव सुख देने वाली हे देवी नर्मदे! तुम्हारे चरणविन्दों को प्रणाम करता हूं।


इसी माह मध्यप्रदेश में नर्मदाष्टक की रचना करने वाले आदि शंकराचार्य की जयंती पूरे प्रदेश में जोर-शोर में मनाई गई। करोड़ों रुपए खर्च किए गए। वैसे यात्रा समापन पर हुए समारोह में भी करीब 40-50 करोड़ रुपए खर्च होने की बात सामने आ रही है। यह भी सुनने में आया है कि नर्मदा सेवा यात्रा पर करीब 500 करोड़ रुपए का खर्च आया है। (मनाना चाहिए कि यह आंकड़ा गलत हो) वहीं नर्मदा बचाओ आंदोलन पुनर्वास स्थलों की मरम्मत को लेकर लगातार आवाज उठा रहा है, लेकिन उसके लिए सरकार के पास पैसा नहीं है। वहां की सड़कें ऐसी बनी हैं कि उनके बीच में बबूल के पौधे अब वृक्ष बन गए हैं। पुलियाएं और ड्रेनेज तो ध्वस्त हो चुके हैं। उद्गम पर सारा शोर मचा रही सरकार जहां मध्यप्रदेश की सीमा पर नर्मदा पहुंचती है, वहां डूब रहे गांवों के निवासियों के दुख सुनने वाला कोई नहीं है। जिला प्रशासन सर्वोच्च न्यायालय का फैसला पढ़े बिना उसकी धौंस बताकर गांव खाली करने की धमकियां दे रहा है।

'सबका साथ सबका विकास परन्तु वास्तविकता यह है, 'किनका साथ और किसका विकास। यात्रा के दौरान न तो मुख्यमंत्री और न ही प्रधानमंत्री ने समापन के दौरान उन 50-60 हजार परिवारों के त्याग को रेखांकित किया जो कि कथित विकास के शिकार हो अपना सब कुछ गंवा रहे हैं। न ही उन 101 सहायक नदियों का जिक्र हुआ जो कि लगातार सूखती जा रही है।

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'महान, भयंकर संसार के प्रलयकाल में महर्षि मार्कण्डेय को आश्रय प्रदान करने वाली देवी नर्मदे। अत्यन्त गंभीर नीर के प्रभाव से पृथ्वी तल के पापों को धोने वाले तथा समस्त पातक रूप शत्रुओं को ललकारते हुए विपत्ति रूप पर्वतों को विदीर्ण करने वाले तुम्हारे पादपद्मों को मैं प्रणाम करता हूं।’ परन्तु हमारे आधुनिक शासकों ने तो नर्मदा से ही प्रलय ला दी है। अकेले सरदार सरोवर बांध जलाशय से 200 किमी से लम्बी झील बन जाएगी। अभी की डूब में आए समुदाय का यथोचित पुनर्वास नहीं हुआ है। पर्यावरणीय शर्तों की पूर्ण अनदेखी की गई है। परन्तु मालिक का मालिक कौन? सरकार तो अब राजशाही की तरह बर्ताव करती नज़र आ रही है। अभी 15 मई को नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण (एनसीए) में नर्मदा बचाओ आंदोलन के धरने के दौरान प्राधिकरण के पुनर्वास प्रमुख ने लजाते-लजाते स्वीकार भी किया था कि पुनर्वास स्थलों की स्थिति ठीक नहीं है। परन्तु वे तो राजा सरकार पर ही निर्भर है। यदि वह स्वयं या स्वतंत्र आकलन के लिए अधिकृत नहीं है तो उनकी या इस प्राधिकरण की आवश्यकता ही क्या थी? बहरहाल विकास के नाम पर बलि चढ़ाए जाने के लिए आदिवासियों, ग्रामीणों, मछुआरों, दुकानदारों, छोटे व्यापारियों, किसानों, स्त्रियों, पुरुषों, बच्चों, पशुओं सभी की गिनती शुरू हो गई है। इतना ही नहीं, उन्हें धमकाया जा रहा है कि बेदखली की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। बर्बरता में मध्यप्रदेश का बेहतरीन रिकार्ड है, जिसे हम हरसूद में देख चुके हैं। वहां के विस्थापित अब भी मर-मर कर जी रहे हैं। अधिकांश के पास न तो रोजगार है और न मकान। परन्तु 'सबका साथ सबका विकास’सतत जारी है।

'सदैव मार्कण्डेय, शौनक आदि मुनियों तथा सुरगुणों से सेवित जब आपके दिव्य जल का दर्शन किया, तभी संसार में बारम्बार जन्म-मरणादि से होने वाले मेरे सभी भय भाग गये। अतएव भव-सिन्धु के दुख से बचाने वाले हे देवी नर्मदे! तुम्हारे पाद-पद्मों को मैं प्रणाम करता हूं।’

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नर्मदाघाटी में बसा समुदाय पिछले 35 वर्षों से बिना थके अपनी लड़ाई लड़ रहा है। सर्वशक्तिमान सरकार के सामने इतने दिन सिर उठाकर संघर्ष करने वालों की जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है। नर्मदा बचाओ आंदोलन ने कभी भी अपनी गतिविधियों में हिंसा को कोई स्थान नहीं दिया। वे आज भी संघर्षरत हैं। यदि वे हारते हैं तो यह एक तरह से भारतीय लोकतंत्र मूल्यों की भी हार होगी। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं कहा है कि उनके इस फैसले को 'नजीर’ न माना जाए। आने वाले कुछ दिन नर्मदा घाटी के लिए अत्यन्त चिन्ताजनक है। अब जमाना एक-दूसरे की पीठ ठोकने की बजाय पीठ खुजाने का आ गया है। 'जलपुरुषअपनी तरह से नदी बचाना चाहते हैं, और उसमें मनुष्य की कोई हैसियत नहीं है। 'नदी नायक’भी अपने हिसाब से नदी बचाना चाहते हैं, जिसमें मनुष्य का कोई मूल्य नहीं। नर्मदा और उसकी सहायक 101 नदियां तथा उन पर निर्भर मध्यप्रदेश की करीब 80 प्रतिशत आबादी आज भयानक विपत्ति में है। नर्मदा पर बने अन्य बड़े बाधों यथा बरगी, इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर, महेश्वर के परिणाम हमारे सामने हैं। अब 1200 किमी का समानांतर हाईवे किनारे-किनारे बन रहा है। हनुवंतैया और सैलानी जैसे मौज-मस्ती के केन्द्र बन रहे हैं। इन सबकी वजह से उजड़ा समाज सिर पर तगाड़ी उठाए, नंगे पांव चिलकती धूप, तेज बारिश और कंपकंपाती ठंड में 'राष्ट्र निर्माण’में, जुटा है। यदि वह ऐसा करने से मना करेगा तो विकास-विरोधी ही नहीं, अब तो राष्ट्रविरोधी भी बना दिया जाएगा। देखना है कि इस मार से बचा समुदाय अब भी उसके साथ आएगा या अपनी बारी का इंतजार करेगा। स्मार्ट शहर से शहरियों की कामना भी जल्दी ही पूरी होगी। नर्मदाष्टक के अंत में कहा है, 'हम लोगों ने शिवजी की जटाओं से प्रकट हुई रेवा के किनारे, भील, भाट, ब्राह्मण, विद्वान और धूर्त नटों के बीच घोर ताप हरनेवाला, अमृतमय यशोगान सुना, अत: प्राणीमात्र को सुख देने वाली हे देवी नर्मदे! तुम्हारे चरणकमलों को मैं प्रणाम करता हूं।’ नर्मदा का कल-कल नाद ही जब रुक जाएगा तो अमृतमय यशोगान कौन गाएगा?

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