कितने प्रद्युम्न के जाने का इंतजार है हमें

जहां शिक्षा बाजार के हवाले कर दी गई है। बाजर मुनाफे का काम करता है। मुनाफे के लिए रीत, नीत, प्रीति किसी का ख्याल नहीं रखता है...

योगेश मिश्र
कितने प्रद्युम्न के जाने का इंतजार है हमें
Pradyumna
योगेश मिश्र

जहां शिक्षा बाजार के हवाले कर दी गई है। बाजर मुनाफे का काम करता है। मुनाफे के लिए रीत, नीत, प्रीति किसी का ख्याल नहीं रखता है। यह बदलाव स्कूल चलाने वालों में आया है भारी भरकम सुविधाओं से लैस स्कूल में मोटी फीस देकर अपने बच्चों को भेजने वाले ऊपरी तबके में तो आया पर अपनी महत्वाकांक्षाओं के नाते किसी तरह जोड़-जुगत करके फीस जुटाने वाले अभिभावकों ने भले ही बच्चों को इन स्कूलों में ड़ाल दिया हो पर वे इस बदलाव के रंग-ढंग में नहीं बदल पाए। इसीलिए इन स्कूलों में जो भी बच्चे यौन शोषण के शिकार हुए इसके चलते उन्होंने अपनी जिंदगी गंवाई वे सब इसकी तरह के लोग हैं। वे बदलाव के संग बह नहीं पाए। जो बदलाव के संग नहीं बहता उसे बदलाव कर देता है।

यह बात महज 19 साल पुरानी होगी। हमारा एक साथ अपने पिता की मोटरसाइकिल से अपने छोटे से शहर की सड़क को रौंद रहा था। तब बाइकर्स नहीं होते थे पर उसकी स्टाइल और गति आज के बाइकर्स सरीखी थी। दूर उसके पिता के एक दोस्त उसकी हरकत पर नजर रखे थे वह करीब आए मोटरसाइकिल रुकवाया और रिक्शेवाले को उसके घर तक पहुंचने का किराया अग्रिम भुगतान कर घर को रवाना कर दिया। मोटरसाइकिल अपने कब्जे में कर ली। जाते समय कहा- अपने पापा से कहना हमसे बात कर लें। वह सज्जन सगे चाचा नहीं थे। पिताजी के मित्र थे पर अंकल भी नहीं थे, चाचा ही थे। उन्होंने अपने दोस्त को बेटे की मोटरसाइकिल चलाने की हरकत बताई। अब न तो चाचा वैसे हैं, न बेटे वैसे हैं न पापा वैसे हैं। 

गांव में तो हर बुजुर्ग आदमी गांव के सभी बच्चों का अभिभावक ही होता था। उसे डांट डपट सकता था, दंड दे सकता था और उसके इस फैसले पर कोई मानवाधिकार संगठन, बच्चे के माता-पिता या रिश्तेदार उंगली नहीं उठाते थे। जो बच्चे गांव में सुरक्षित थे शहरों की सड़कों पर सुरक्षित थे वे आजकल गुरुकुल तक में सुरक्षित नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ माडल शिक्षा का संवाहक समझे जाने वाला रेयान इंटरनेशनल स्कूल में प्रद्युम्न ने दम तोड़ दिया। उसकी मौत एक बड़ी साजिश का हिस्सा ही हो सकती है। प्रद्युम्न तो आज का एक ज्वंलत प्रश्न है। पर स्कूलों में बच्चों का यौन शोषण करना, अध्यापकों का बच्चियों को गर्भवती कर देना, और अप्राकृतिक यौनाचार की निरंतर बढ़ रही यह घटनाएं यह बताती हैं कि सरस्वती का पावन मंदिर भी कितना असुरक्षित है। अब वीणा की झंकार की जगह ऐसे शोषित बच्चों की चित्कार बहुत से स्कूलों में सुनी जा सकती हैं। कुछ की कहानी बेपर्दा है और कुछ की कहानी का खुलना अभी बाकी है। 

मंदिर में आदमी की रक्षा भगवान करता है। फिर सरस्वती के इस पावन मंदिर में बच्चे असुरक्षित क्यों हैं। गुरु को भगवान को बड़ा दर्जा हासिल है। गुरु के आसपास बच्चों की असुरक्षा निरंतर बढ़ रही है? इसकी सिर्फ एक वजह है। विद्यालय अब दुकान हो गये हैं। शिक्षा व्यवसाय हो गई है। गुरु सिर्फ टीचर रह गये हैं। नतीजतन, गुरुता का अंत हो गया है। जहां शिक्षा बाजार के हवाले कर दी गई है। बाजर मुनाफे का काम करता है।

मुनाफे के लिए रीत, नीत, प्रीति किसी का ख्याल नहीं रखता है। यह बदलाव स्कूल चलाने वालों में आया है भारी भरकम सुविधाओं से लैस स्कूल में मोटी फीस देकर अपने बच्चों को भेजने वाले ऊपरी तबके में तो आया पर अपनी महत्वाकांक्षाओं के नाते किसी तरह जोड़-जुगत करके फीस जुटाने वाले अभिभावकों ने भले ही बच्चों को इन स्कूलों में डाल दिया हो पर वे इस बदलाव के रंग-ढंग में नहीं बदल पाए। इसीलिए इन स्कूलों में जो भी बच्चे यौन शोषण के शिकार हुए इसके चलते उन्होंने अपनी जिंदगी गंवाई वे सब इसकी तरह के लोग हैं। वे बदलाव के संग बह नहीं पाए। जो बदलाव के संग नहीं बहता उसे बदलाव कर देता है। हालांकि यह बदलाव इतना सकारात्मक नहीं है कि उसके साथ बहा जाय पर जो लोग एक बहुत ऊंचे तबके हैं उनके पास धन है तो संगति के लिए धमकी भी है। धन सुरक्षा का भी बोध कराता है, सामने वाले में भय भी उत्पन्न कर सकता है। आपकी ताकत का जरिया ही हो सकता है। 
प्रद्युम्न के माता-पिता धन की उस सरहद को छू भी नहीं पाए थे जो उनमें इस तरह शक्ति या ऊर्जा दे पाता। प्रद्युम्न ही क्यों इस तरह की

मानसिकता के शिकार हर बच्चे के इतिहास को पलटें तो प्रद्युम्न के माता-पिता कहानी से बहुत साम्यता दिखेगी। लेकिन इस तरह के साम्य वाले लोग भी एकजुट नहीं हैं। वे भी इस तरह के अधिकार सम्पन्न नहीं है कि वे अपने अनुभव के आधार पर दूसरे के बच्चों को मोटरसाइकिल के करतब की मानिंद रोक सकें जो मिलजुल कर आने वाले कई सालों तक यह बता सकें कि उस रेयान सरीखे स्कूलों में अपने बच्चों का दाखिला न कराएं क्योंकि हमारे साथ यह हादसा हुआ है। 


हादसा झेलने वाले भी एकांकी है और भगवान न करें लेकिन अगले हादसे के निशाने पर आने वाले भी एकांकी ही होंगे। कार्ल मार्क्स ने कम्युनिस्ट मेनीफेस्टों में लिखा है कि पूंजीवादी व्यवस्था के विस्तार में मुद्रा के लेन-देन के संबंध बाकी और मानव संबंधों पर भारी पड़ेंगे। पीड़ित और निशाने पर आने वाले संबंध मुद्रा के नहीं हैं, नहीं होते हैं। 800 साल तक हम विदेशियों के गुलाम रहे। उन्होंने हम पर राज किया। 200 साल तक तो अंग्रेजों ने राज किया पर हमारे गांव के अभिभावक और शहर के चाचा जी की मोटरसाइकिल रोकने के रिश्ते बिल्कुल नहीं टूटे। लेकिन वैश्वीकरण के बाद इन सब रिश्तों का गुड़गोबर हो गया। आपने पीटर मुखर्जी और इंद्राणी मुखर्जी के बीच के रिश्तों की कहानी आप को याद होगी। आज पिता पुत्री को बक्श नहीं रहा है। बहन भाई के साथ सुरक्षित नहीं। चाचा, ताऊ, बुआ, मामा, मौसी यह रिश्ते तो इनके आगे ठहरते ही नहीं है। लंबे समय तक एक-दूसरे के साथ प्रेम करके अपना घर बसाने वाले दंपत्ति को कुछ दिनों बाद ही यह संस्कार रास नहीं आने लगता तभी कानपुर के एक करोड़पति पीयूष अपनी ज्योति की हत्या कर देता है। नोयडा में लिव-इन रिलेशन में रह रही प्रेमिका को शादी के बाद उसका प्रेमी चाकू से 32 बार गोद देता है।  

दिल्ली के फार्महाउस पर बड़े कारोबारी का एक भाई दूसरे पर गोली चला देता है। एक राजनैतिक घराने में वर्चस्व की जंग होती है। विदेश जा बसा बेटा अपने पिता के जन्मदिन पर इन्टरनेट बैंकिंग के मार्फत फूल और केक भिजवा देता है। आईपैड पर भारत में अपने पत्नी गंवाने के बाद अकेला जी रहा पिता विदेश में बसे अपने बेटे के भरे पूरे परिवार के सामने केक काटकर खुश हो जाता है। कटा हुआ केक खाने के लिए उसके बड़े घर में कोई नहीं होता है। और बेटा यह खुश होता है कि उसने पिता का जन्मदिन सेलीब्रेट कर लिया। 

अल्फा फादर्स हो गये हैं। सेरोगेट मदर्स हो गई हैं। हाफ फादर भी हो गये हैं। भारतीय संस्कृति के प्रति चिंतातुर कोई भी व्यक्ति इस बदलाव के कालखंड को पकड़ना चाहे तो उसे देश में वैश्वीकरण के कालखंड को ही चिह्नित करना होगा। वैश्वीकरण ने मूल्य (कास्ट) को तरजीह दी जबकि उससे पहले तक मूल्य (वैल्यू) हमारे जीवन का, हमारे परिवार का हमारे समाज का आधार होता था। ये जो मूल्य थे इनको बनाए रखना इसे अगली पीढ़ी को स्थानांतरित करना भी हम लोग का ही काम है। हम लोग बचपन में थे तो चाचा और ताऊ के सारे बच्चों को मिलाकर यह बताया जाता था कि हमारे कितने भाई-बहन हैं।

हम वैश्वीकरण के कालखंड तक कहा करते थे कि दस बहनें और 9 भाई हैं। लेकिन वैश्वीकरण के कालखंड में हमें यह कहना इसलिए बंद करना पड़ा क्योंकि यह सुनकर लोग हंसने लगते थे। यह बोलते ही मैं हास्य का पात्र हो जाता था। लेकिन सबसे सचमुच भाई-बहन सरीखा ही रिश्ता है। कभी भी किसी भी दुख की घड़ी में खुद को अकेला नहीं पाया अब यह भावबोध मर गया है। 
हम छोटे थे तो लटका हुआ नाड़ा भी खिलखिला के हंसने का मौका दे देता था। आज यह सिर्फ एक स्टाइल बनकर रह गया है। यह बदलाव संवेग का मर जाना है। त्वरित संतुष्टि जीवन का ध्येय और संवेग हो गया है। समाज बाजार बन गया है। आदमी मशीन और रिश्ते उत्पाद। इसके बदलाव का होता नहीं दिख रहा है अंत। पर अब हमें किसी और प्रद्युम्न के जाने का इंतजार किए बिना इस बदलाव के अंत का ऐलान करना चाहिए।     ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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