योगी के समक्ष चुनौतियां

अरविंद जयतिलक उत्तर प्रदेश के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा यह भरोसा दिया जाना कि उनकी सरकार ‘सबका साथ-सबका विकास’ के नारे को जमीनी आकार देगी ...

देशबन्धु

 अरविंद जयतिलक
उत्तर प्रदेश के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा यह भरोसा दिया जाना कि उनकी सरकार  ‘सबका साथ-सबका विकास’ के नारे को जमीनी आकार देगी और राज्य में सुशासन स्थापित होगा, विकास और सामाजिक सौहार्द्र के प्रति निष्ठा और प्रतिबद्धता को ही रेखांकित करता है। चूंकि योगी की छवि एक हिंदुत्ववादी राजनेता की है ऐसे में उनके लिए और भी आवश्यक है कि उनकी सरकार पहले दिन से ही लोगों का विश्वास जीते और सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता जाहिर करे। सुरक्षा और विश्वास के अभाव में कोई भी राज्य तरक्की नहीं कर सकता। वैसे भी गौर करें तो राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति नाजुक है।  गरीबी, भूखमरी, बीमारी, कुपोषण, भ्रष्टाचार का बोलबाला है। शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के मोर्चे पर स्थिति संतोषजनक नहीं है। बुनियादी सुविधाओं के अभाव में राज्य में कृषि, कल-कारखाने एवं उद्योग-धंधे चौपट हैं और रोजगार का टोटा है। यह सच्चाई है कि मानव संसाधन, उर्वर भूमि और प्राकृतिक समृद्धि-संपन्नता से लैस होने के बावजूद भी उत्तर प्रदेश पिछले साढ़े छ: दशक में वह मुकाम हासिल नहीं कर पाया है जो देश के अन्य राज्यों ने किया है। उत्तर प्रदेश की सूरत बदलने के लिए राज्य सरकार को सबसे पहले कानून-व्यवस्था सुधारना होगा और सडक़, बिजली और पानी के मामले में आत्मनिर्भर बनना होगा। नाकाम कानून-व्यवस्था के कारण ही यहां कोई निवेशक पूंजी लगाने को तैयार नहीं है। राज्य में काम कर रहे उद्योगपति भी पलायन को मजबूर हैं। योगी सरकार को राज्य में कानून-व्यवस्था सुधारने के लिए सबसे पहले नौकरशाही को कसना होगा और आवश्यकतानुसर पुलिसकर्मियों की भर्ती करनी होगी। गौर करें तो उत्तर प्रदेश में महिलाएं सर्वाधिक असुरक्षित हैं। पिछले दिनों कैग की रिपोर्ट से उद्घाटित हुआ कि यूपी में महिलाओं के खिलाफ अपराध में वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2010-11 में यूपी में बलात्कार की जहां 1582 घटनाएं हुई वहीं 2014-15 में यह आंकड़ा बढक़र दोगुना यानी 2945 तक पहुंच गया। इसी तरह 2013-14 के मुकाबले 2014-15 में 43 फीसद महिला अपराध में वृद्धि हुई है। उत्तर प्रदेश में कुल पुलिसकर्मियों की संख्या 1.63 लाख है जिनमें से तकरीबन 7800 महिला पुलिसकर्मी हैं। इस तरह 81 पुलिसकर्मियों के जिम्मे तकरीबन एक लाख की जनसंख्या है, जो कि ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। कानून-व्यवस्था की स्थिति मजबूत होने पर राज्य में आर्थिक विकास की गति स्वत: तेज होगी और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। पूंजी निवेश को नया आयाम मिलेगा और बंद पड़े  कल-कारखानों के ताले खुलेंगे।
उत्तर भारत का मानचेस्टर कहा जाने वाला कानपुर, जो कि कभी सूती वस्त्र उद्योग के लिए विश्वविख्यात है, सरकार की बेरुखी के कारण उसकी कमर टूट चुकी है। वाराणसी की सिल्क साडिय़ां, फिरोजाबाद का कांच उद्योग, हाथरस व मुरादाबाद का पीतल उद्योग, अलीगढ़ का ताला उद्योग, सीतापुर की दरियां, गाजीपुर का कटवर्क पर्दा, अमरोहा का पाइल वर्क, गोरखपुर का बेडकवर और गाजियाबाद का टेरीटॉवेल लघु उद्योग जिसे देशव्यापी प्रसिद्धि हासिल है वह आज अपना अस्तित्व खो रहा है। छींट व लिहाफों की छपाई के लिए प्रसिद्ध फर्रुखाबाद, जहांगीराबाद, पिलखुआ और मथुरा की हालत खस्ता है। प्रदेश का लगभग 7 करोड़ बुनकर ऋणग्रस्तता का शिकार है। प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण आज खादी ग्रामोद्योग, रेशम, चीनी, पर्यटन, सीमेंट, चमड़ा एवं इलेक्ट्रॉनिक उद्योग जर्जर स्थिति में है। कृषि की हालत भी बहुत संतोषजनक नहीं है। 2011 की जनगणना के अनुसार प्रदेश की कुल कार्यशील जनसंख्या का 59.3 प्रतिशत लोग कृषि एवं उससे संबद्ध क्षेत्र में नियोजित हैं। इसमें 29 प्रतिशत कृषक तथा 30.3 प्रतिशत कृषि श्रमिक हैं। आज भी सिंचाई के अभाव में उत्तर प्रदेश में कृषि की स्थिति दयनीय बनी हुई है।
आंकड़ों पर गौर करें तो यूपी के कुल प्रतिवेदित क्षेत्रफल 240.93 लाख हेक्टयर में से सकल सिंचित क्षेत्रफल 199.01 लाख हेक्टेयर और शुद्ध सिंचित क्षेत्रफल 138.09 लाख हेक्टेयर है। कुल सिंचित क्षेत्र में 18.5 फीसद नहरों से, 73.6 प्रतिशत नलकूपों से तथा 6.8 प्रतिशत कुओं, तालाबों, झीलों, पोखरों तथा शेष अन्य साधनों से होता है। पश्चिमी यूपी के मेरठ, मैनपुरी, एटा, फिरोजाबाद, इटावा, फर्रुखाबाद, बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर एवं अलीगढ़ जिलों में सिंचाई के लिए नलकूपों पर निर्भर रहना पड़ता है। राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सिंचाई महकमा के जरिए असिंचित क्षेत्रों को सिंचाई सुविधाओं से संतृप्त करने के लिए ठोस रणनीति बनाए। कृषि उत्पादों की बात करें तो यूपी में गन्ने का क्षेत्रफल पूरे देश का तकरीबन 50 फीसद है। राज्य में 30 लाख से अधिक गन्ना कृषकों के अलावा, मिल कर्मचारियों, गुड़ तथा खाण्डसारी उद्योग से जुड़े लोग हैं। लेकिन बदहाली का नतीजा यह है कि यूपी राज्य चीनी निगम लिमिटेड जिसके अधीन वर्तमान में 33 मिले हैं, में से 2 दर्जन से अधिक चीनी मिलें बंद हैं। निजी क्षेत्र की चीनी मिलें गन्ना उत्पादकों के साथ मनमानी कर रही हैं। उनके उत्पादों को उचित मूल्य देने से आनाकानी कर रही हैं। हालांकि यूपी की पूर्ववर्ती समाजवादी सरकार ने राज्य में पूंजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए नई औद्योगिक नीति का ऐलान किया था लेकिन बुनियादी सुविधाओं के अभाव और बदतर कानून व्यवस्था के कारण इसे फलीभूत नहीं किया जा सका। राज्य की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए अच्छी सडक़ें और बिजली आवश्यक है। इसके अभाव में न तो कृषि और औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि हो रही है और इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूती मिल रही है। गौर करें तो राज्य के गांव ही नहीं, बल्कि शहर भी बुरी तरह बदहाल हैं। 91 फीसदी से अधिक नगरों में अभी तक सीवर लाइन की व्यवस्था नहीं है। शहरों में शौचालयों का अभाव है। स्लम आबादी सवा करोड़ के ऊपर पहुंच चुकी है। राज्य सरकार को समझना होगा कि उत्तर प्रदेश के चतुर्दिक विकास के लिए सबसे पहले क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करना होगा। हालांकि आजादी के बाद से ही क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने की मांग उठती रही है और पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा भरोसा दिया जाता रहा है। लेकिन सच कहें तो इन सत्तर सालों में क्षेत्रीय असंतुलन कम होने के बजाय बढ़ा है।
उत्तर प्रदेश का पूर्वी हिस्सा यानी पूर्वांचल राज्य का सबसे पिछड़ा क्षेत्र है। 12 करोड़ आबादी, 28 लोकसभा और 147 विधानसभा वाले इस क्षेत्र में आधी से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। बाढ़ और सूखा इस क्षेत्र की नियति है। यहां स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह चरमराई हुई है। जापानी बुखार के कारण हर वर्ष हजारों बच्चे दम तोड़ रहे हैं। सरकार की ओर से किए गए प्रयास अभी तक नाकाफी साबित हुए हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान एक अरसे से भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलनरत हैं।  उन्हें अपनी भूमि का उचित मुआवजा नहीं मिल रहा है। राजनीतिक दल उनकी मांग पर संजीदगी दिखाने के बजाय सियासी रोटियां सेंकते रहे हैं। बुंदेलखंड की हालत और भी दयनीय है। बुंदेलखंड की यह स्थिति दैवीय प्रकोप का नतीजा नहीं, बल्कि मानवीय उपेक्षा का परिणाम है और इसके लिए पूर्ववर्ती  सरकारें जिम्मेदार हैं। यह विडंबना है कि जब भी बुंदेलखंड सूखे की मार की चपेट में आता है मौजूदा सरकारें पैकेजों का ऐलान कर अपने कर्तव्यों को इतिश्री समझ लेती हैं। जबकि यहां पर्यावरणीय निम्नीकरण द्वारा उत्पन पारिस्थितिकीय असंतुलन तथा उपलब्ध जल संसाधन के विकास में उदासीनता जलाभाव का मुख्य कारण है। बुंदेलखंड में औसतन 70 हजार लाख टन घनमीटर पानी प्रतिवर्ष वर्षा द्वारा उपलब्ध होता है। लेकिन विडंबना है कि इसका अधिकांश भाग तेज प्रवाह के साथ निकल जाता है। योगी सरकार को बुंदेलखंड में जल प्रबंधन के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी। बुंदेलखंड विकास की असीमित संभावनाओं को अपनी कोख में संजोए हुए है। उसके पास इतने अधिक संसाधन है कि वह अपने बहुमुखी उत्थान की आर्थिक व्यवस्था स्वत: कर सकता है। आवश्यकता सिर्फ इस बात की है कि संसाधनों का समुचित दोहन हो। बुंदेलखंड में वास्तु पत्थर के अक्षय भंडार हैं। विदेशों में विशेष रूप से जर्मनी, जापान व इटली में इसकी बहुत अधिक मांग है। बुंदेलखंड में पाए जाने वाले खनिजों में फोस्फोराइट, गैरिक जिप्सम, ग्लैकोनाइट, लौह अयस्क एवं अन्य रत्न उपलब्ध हैं। इनका दोहन कर बुंदेलखंड को आत्मनिर्भर बन सकता है। लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों ने संसाधनों की मची लूट की खुली छूट देकर बुंदेलखंड को विपन्न बना दिया है। उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश की नई सरकार राज्य के विकास के लिए वह सब कुछ करेगी जो पिछले साढ़े छ: दशक में नहीं हुआ है।


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