किसानों की आय दुगुनी करने की कार्य योजना 

उत्पादन और बाजार में उत्तरदायित्वपूर्ण निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए कृषि क्षेत्र को उदार बनाने की आवश्यकता है...

किसानों की आय दुगुनी करने की कार्य योजना 
Farmers
डॉ. हनुमंत यादव

उत्पादन और बाजार में उत्तरदायित्वपूर्ण निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए कृषि क्षेत्र को उदार बनाने की आवश्यकता है। इसी प्रकार लघु कृषि व्यवसाय को बढ़ावा देने में फसल उत्पादकों के संगठन और फसल उत्पादक समितियां बड़ी भूमिका निभा सकती है। प्रतिस्पर्धात्मक बाजार और मदद के रूप में सरकारी हस्तक्षेप  से कृषि उपजों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने मात्र से ही बहुत राज्यों में किसानों की आमदनी में अच्छी खासी वृद्धि होना सुनिश्चित है।

केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली द्वारा 25 अगस्त को नीति आयोग द्वारा  बनाई गई 2017-18 से 2019-20 की तीन साल की अवधि कार्य योजना जारी की गई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इच्छानुसार इस कार्य योजना में 2022 तक किसानों की आमदनी दुगुना करने का लक्ष्य रखा गया है। कृषि क्षेत्र की इस कार्य योजना बनाने का श्रेय इसके सदस्य कृषि अर्थशास्त्री प्रो. रमेशचन्द को जाता है जिन्होंने  किसानों की आमदनी दुगुनी करने की संभावनाओं का अध्ययन करके उनकी आमदनी कैसे दुगुनी की जाय इस संबंध में रोडमैप तैयार करके उपयोगी सुझाव दिए है। डॉ. रमेशचन्द के अनुसार किसानों की 2022 तक आमदनी दुगुनी करना चुनौतीपूर्ण कार्य तो है किन्तु असंभव नहीं है। आमदनी दुगुना करना खेती और खेतिहर दोनों के लिए बहुत जरूरी है। भारत की  50 फीसदी आबादी अपनी आजीविका के लिए खेती किसानी पर निर्भर है। इसलिए खेती किसानी के भविष्य को सुरक्षित करने और उस पर आजीविका के लिए आश्रित रहनेवाले किसानों के कल्याण सुधार के लिए उनकी आमदनी बढ़ाया जाना जरूरी है।

किसानों की आय दुगुना करने के लिए कृषि क्षेत्र में विकास पहलों, प्रौद्योगिकी और नीतिगत सुधारों पर केन्द्रित तीन सूत्री कार्यनीति बनाई गई जिसके तहत लक्ष्य को हासिल करने वाले उत्पादन को बढ़ानेवाले संसाधनों की वृद्धि दरों में 33 फीसदी बढ़ोतरी जरूरी है।  देश में गुणवत्तायुक्त बीज, उर्वरक के उपयोग और कृषि क्षेत्र में बिजली की आपूर्ति में क्रमश: 12.8, 4.4 और 7.6  प्रतिशत, बढ़ोतरी की आवश्यकता है। सिंचित क्षेत्र में 1.78 मिलियन हेक्टेयर का विस्तार और दोहरी फसल वाले क्षेत्र में 1.85 मिलियन हेक्टेयर की बढ़ोतरी प्रतिवर्ष की जानी चाहिए। इसके अतिरिक्त फलों और सब्जियों के उत्पादनवाले क्षेत्र में 5 प्रतिशत वृद्धि की जाने की आवश्यकता होगी।  पशुधन के संबंध में, पशुओं की गुणवत्ता में सुधार, बेहतर चारा, कृत्रिम गर्भाधान में बढ़ेातरी, बच्चे देने के अंतराल में कमी, पहली बार बच्चा देने की आयु में कमी करना आमदनी वृद्धि के संभावित श्रोत हैं।

अनुसंधान संस्थानों को प्रौद्योगिकी की महत्वपूर्ण खोज करनी चाहिए ताकि उत्पादन के अवरोधों को पार किया जा सके और निवेश सामग्री के उपयोग में कुशलता लाई जा सके। कृषि उत्पादन और किसानों की आमदनी को पर्याप्त रूप से बढ़ाने के लिए कृषि विज्ञान संबंधी पद्धतियों जैसे परिशुद्ध कृषि के कार्यक्षेत्र के व्यापक होने के साक्ष्य बढ़ रहे हैं। इसी प्रकार आधुनिक मशीनों जैसे भूमि समतल करने की लेजर मशीन, परिशुद्ध बुआई और रोपण मशीन और पद्धतियों जैसे धान गहनता प्रणाली, प्रत्यक्ष बोया गया धान, शून्य जुताई, ऊपर उठी क्यारियों में रोपण और मेढ़रोपण से तकनीकी रूप से उच्च कुशल खेती होती है। यद्यपि सार्वजनिक क्षेत्रक द्वारा विकसित इन प्रौद्योगिकियों की बिक्री बहुत कम होती है। किसानों द्वारा उनको अपनाया जाए, इसके लिए उनका प्रचार-प्रसार करने की जरूरत है। शोध एवं विकास संस्थानों को उनके पैकेजों में जमीनी स्तर के नवोन्मेश और परम्परागत पद्धतियों को भी शामिल करना चाहिए जो लोचदार, संधारणीय और आय में वृद्धि करनेवाली हो।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और प्रदेशों के कृषि विश्वविद्यालयों को कृषि आय पर ध्यान देते हुए एक पैकेज में उनके द्वारा विकसित सभी प्रौद्योगिकियों को शामिल करके विभिन्न प्रकार की समाजार्थिक और जैव भौतिक परिस्थितियों के लिए कृषि प्रणाली के प्रतिरूप विकसित करने चाहिए। इसमें अन्य उपप्रणालियों जैसे फसल क्रम, फल मिश्रण, पशुधन, बागवानी, वानिकी के साथ सभी उप-प्रणालियों के लिए उत्पादन, संरक्षण और फसल कटाई के बाद मूल्यवर्धन को कवर करते हुए प्रौद्योगिकी और उत्तम पद्धतियां शामिल होंगी।


कार्य योजना के अनुसार फसलों की बेहतर कीमत मिलने, फसल कटाई के बाद कुशल प्रबंधन, प्रतिस्पर्धात्मक मूल्य संर्वद्धन और खेती से संबंद्ध सभी कार्यकलापों को अपनाने से किसानों की आमदनी में एक तिहाई वृद्धि सरलता से हो सकती है। इसके लिए बाजार में व्यापक सुधार, भूमि पट्टा और निजी भूमि पर वृक्षारोपण की आवश्यकता है। आधुनिक पूंजी और आधुनिक ज्ञान के अभाव में भारतीय कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है और किसानों की आमदनी कम रही है। उत्पादन और बाजार में उत्तरदायित्वपूर्ण निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए कृषि क्षेत्र को उदार बनाने की आवश्यकता है। इसी प्रकार लघु कृषि व्यवसाय को बढ़ावा देने में फसल उत्पादकों के संगठन और फसल उत्पादक समितियां बड़ी भूमिका निभा सकती है। प्रतिस्पर्धात्मक बाजार और मदद के रूप में सरकारी हस्तक्षेप  से कृषि उपजों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने मात्र से ही बहुत राज्यों में किसानों की आमदनी में अच्छी खासी वृद्धि होना सुनिश्चित है। 

संघीय व्यवस्था के अंतगत कृषि,  राज्यों के क्षेत्र में होने के कारण अधिकांश विकासात्मक पहलें और नीतियां राज्यों के द्वारा अमल में लाई जाती हैं। सिंचाई सरीखे बहुत से विकासात्मक कार्यों पर केन्द्र की तुलना में राज्यों द्वारा अधिक निवेश एवं परिव्यय किया जाता है। बाजार एवं भूमि पट्टा से संबंधित विभिन्न सुधारों की प्रगति भी राज्यों का विषय है। इसलिए किसानों की आमदनी दुगुना करने के लक्ष्य को अपनाने और उसे हासिल करने के लिए राज्यों और संघ-राज्य क्षेत्रों को जोड़ना बहुत जरूरी है। यदि केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा संगठित होकर मिलकर समन्वित प्रयास किए जाते हैं तो 2022 तक किसानों की आमदनी दुगुना करने का लक्ष्य सरलता से हासिल किया जा सकता है।

किसानों की आमदनी दुगुनी करने की इस कार्ययोजना से आम किसानों की आमदनी दुगुनी होना सुनिश्चित है किन्तु यह जरूरी नहीं है कि आमदनी बढ़ जाने मात्र से लघु व सीमांत किसानों की सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। भारत में कुल जोतों में से लगभग 70 प्रतिशत लघु व सीमांत जोतें   हैं। इनका विभाजन और अपखंडन जारी रहने से ये जोतें अनार्थिक हो गई हैं। इन अनार्थिक जोतों को दूसरों को बंटाई, किराए या लीज पर देना समस्या का हल नहीं है। यदि पांच साल में किसानों की आमदनी में वृद्धि हो भी गई तो छोटे किसानों के भारी  निजी कर्ज, अवसाद व आत्महत्या के प्रकरणों को रोकना संभव नहीं है। किसानों को सामुदायिक सुरक्षा भी चाहिए। मेरी समझ में सामुदायिक या सामूहिक कृषि ही छोटे और सीमांत किसानों को जोड़े रखने और सामुदायिक सुरक्षा का बेहतर विकल्प है। सामुदायिक कृषि सोवियत संघ तथा अन्य साम्यवादी देशों में प्रारम्भ की गई थी इसका मतलब यह नहीं कि वह लोकतांत्रिक देशों में यह संभव नहीं है। इजरायल में साम्यवादी शासन नहीं है किन्तु वहां किबुत्ज बस्तियों में सामुदायिक खेती हो रही है।

भारत में कुछ स्थानों पर छोटे किसान सामूहिक कृषि कर रहे हैं। इसलिए भारत में छोटी जोत के किसानों को बड़े पैमाने पर समझा-बुझाकर सामुदायिक कृषि के लिए प्रेरित किया जा सकता है। भारत में आदिवासी बहुल अंचलों में अंग्रेजों के शासनकाल तक सामुदायिक खेती की जा रही थी। इसलिए सामुदायिक या सामूहिक कृषि के आदिवासी अंचल में सफल होने तथा किसानों की दुगुनी से भी अधिक आमदनी बढ़ने की अच्छी संभावनाएं हैं।       

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