एक पार्ट-टाईम मुख्यमंत्री

शायद लोगों को यह अच्छी तरह मालूम नहीं होगा कि 1990 के दशक में क्षेत्र की राजनीति पर बोलबाला रखने वाले 1980 के उच्च जाति के माफिया को हटाकर योगी ने किस तरह शोहरत पाई...

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 एक पार्ट-टाईम मुख्यमंत्री
Yogi Adityanath
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कुलदीप नैय्यर

शायद लोगों को यह अच्छी तरह मालूम नहीं होगा कि 1990 के दशक में क्षेत्र की राजनीति पर बोलबाला रखने वाले 1980 के उच्च जाति के माफिया को हटाकर योगी ने किस तरह शोहरत पाई। इस माफिया को काफी संरक्षण था और राजनीतिक पार्टियों से इनके ठोस रिश्ते थे, लेकिन कोई सांप्रदायिक जुड़ाव नहीं था। इस माफिया के पतन ने योगी को जगह दी जिससे जाति आधारित दादागिरी धार्मिक आपराधीकरण में बदल गई। आदित्यनाथ को राजपूत होने के लाभ के साथ दबंग ऊंची जातियों के बीच अच्छे संबंधों के अलावा संतुलन बनाने के लिए ओबीसी और दलितों के साथ सफल गठजोड़ का फायदा भी है। यही वजह है कि 26 साल की उम्र में उन्हें गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र से भाजपा का उम्मीदवार बनाया गया था और जैसा लोग बताते हैं, बाकी इतिहास है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि वह गोरखनाथ मंदिर के प्रमुख पुजारी की ड्यूटी निभाने के लिए हर महीने पांच दिनों की छुट्टी लेंगे। टेलीविजन चैनलों ने उनके भाषण के इस हिस्से को सिर्फ एक बार दिखाया। चैनलों को या तो भारतीय जनता पार्टी ने यह खबर हटाने के लिए बाध्य किया या मुख्यमंत्री ने इतना लज्जित महसूस किया कि उन्होंने अपना बयान वापस ले लिया। यही वजह हो सकती है कि भाषण अखबारों में नहीं आया।

योगी ने जो कहा था वह यह था कि वह प्रमुख पुजारी बने रहेंगे और राज्य के मुख्यमंत्री का काम करते हुए अपने धार्मिक कार्य करते रहेंगे। लेकिन यह तो लोगों को बताने के लिए था। अन्यथा, वह मंदिर के प्रमुख पुजारी बने हुए हैं और मुख्यमंत्री भी।

लेकिन परेशान करने वाली एक बात जो साफ  है हिंदुओं और मुसलमानों के बीच खाई और बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश का आधा हिस्सा पुलिस की निगरानी में है क्योंकि ज्यादातर जगहों में दंगे जैसी स्थिति है। भाजपा के शासन में होने के बावजूद केन्द्र ने स्थिति पर चिंता व्यक्त की है।
दुर्भाग्य से, मुख्यमंत्री योगी खुलेआम महंत की अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं और जिसे वे मुख्यमंत्री का काम समझते हैं, उसे भी। अजीब स्थिति बनी हुई है, और विपक्ष ने सही ही योगी पर मुख्यमंत्री पद के भगवाकरण का आरोप लगाया है। जाहिर है आरएसएस का इतना मजबूत समर्थन है कि मुख्यमंत्री कोई भी संकीर्णता और पक्षपात कर बच निकल सकते हैं।

लेकिन इस पर भौंह सिकोड़ने की जरूरत नहीं है।  हम सभी जानते हैं कि मुख्यमंत्री के रूप में योगी की नियुक्ति से राजनीतिक पर्यवेक्षक आश्चर्यचकित रह गए थे। उत्तर प्रदेश के चुनाव अभियान के प्रमुख प्रचारक नरेंद्र मोदी ने मुख्यत: विकास के एजेंडे पर अपना ध्यान केंद्रित किया था। यह इसके बावजूद सच है कि चुनाव के बीच में हिंदू वोटों को जमा करने के लिए उन्होंने सांप्रदायिक भाषण या शब्दों का इस्तेमाल किया था। सांप्रदायिक दंगा या तनाव की घटना भी नहीं हुई थी, जैसी 2014 के चुनावों के पहले हुई थी। लेकिन, फिर भी यह साफ  हो गया था कि अगर भाजपा अपने वायदे के मुताबिक उत्तर प्रदेश में विकास करती भी है तो 2019 के आम चुनावों के जीतने का रास्ता सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से होकर गुजरेगा। यहीं पर योगी आदित्यनाथ फिट होते थे, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों के विरोध के मद्देनजर हिंदू  खासकर ओबीसी वोट जुटाने के लिए मतदान के पहले की गई अपनी टिप्पणी समेत समय-समय पर की जाने वाली अपनी सांप्रदायिक टिप्पणियों के लिए राष्ट्रीय राजनीति में जाने जाते थे। 1998 से पांच बार चुने गए सांसद को 2014 में दशकों से राजनीतिक मामलों में शामिल रहे गोरखनाथ मठ का महंत बनाया गया।


शायद लोगों को यह अच्छी तरह मालूम नहीं होगा कि 1990 के दशक में क्षेत्र की राजनीति पर बोलबाला रखने वाले 1980 के उच्च जाति के माफिया को हटाकर योगी ने किस तरह शोहरत पाई। इस माफिया को काफी संरक्षण था और राजनीतिक पार्टियों से इनके ठोस रिश्ते थे, लेकिन कोई सांप्रदायिक जुड़ाव नहीं था। इस माफिया के पतन ने योगी को जगह दी जिससे जाति आधारित दादागिरी धार्मिक आपराधीकरण में बदल गई। आदित्यनाथ को राजपूत होने के लाभ के साथ दबंग ऊंची जातियों के बीच अच्छे संबंधों के अलावा संतुलन बनाने के लिए ओबीसी और दलितों के साथ सफल गठजोड़ का फायदा भी है। यही वजह है कि 26 साल की उम्र में उन्हें गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र से भाजपा का उम्मीदवार बनाया गया था और जैसा लोग बताते हैं, बाकी इतिहास है।

केन्द्र में सत्ता पाने की भाजपा की रणनीति में अस्सी लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश का 2019 में प्रमुख स्थान है और एक प्रमुख ताकत के रूप में उभरने वाले तथा क्षेत्र की राजनीति को सांप्रदायिक बनाने वाले आदित्यनाथ से बेहतर इसमें मदद करने वाला और कोई विकल्प नहीं हो सकता था। फिर भी, इस बारे में काफी कयास थे कि मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह विकास की छवि वाले किसी आदमी को राज्य की कमान देना चाहते थे। लेकिन आरएसएस की चली और इसने मोदी और शाह को आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार करने को राजी किया।

आरएसएस-भाजपा की ओर से उन्हें राज्य का नेतृत्व सौंपने के कई कारण हैं। पहला, 2000 के दशक में भाजपा की ओर से मजबूत गैर-ब्राह्मण हिंदुत्व के निर्माण की कोशिश न केवल उत्तर प्रदेश में बल्कि पूरे देश भर में की गई। 1980 तथा 1990 के पूर्वार्द्ध में भाजपा एक ऊंची जाति वालों की हिंदू पार्टी के रूप में देखी जाती थी और बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी की चुनौती का सामना करने के लिए 1990 के मध्य से भाजपा की ओर से बड़ी संख्या वाले गैर-यादव ओबीसी तथा गैर-जाटव दलितों को इक_ा करने की सचेत कोशिश की गई।

मुख्यमंत्री को गोरखपुर अस्पताल में हुई मौतों और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में हो रहे छात्रों के अंादोलन जैसी वर्तमान में राज्य की ज्वलंत समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। ताजमहल, हमारी विरासत, को उत्तर प्रदेश पर्यटन के आकर्षणों की सूची से निकालने का मुद्दा भी विवादों के अध्याय में जुड़ गया है।

हमें पार्ट-टाईम प्रधानमंत्रियों के तीखे अनुभव हैं। उन्होंने अपनी पार्टी या पार्टियों के समूह को शर्मिंदा किया और बहुत कम काम किया जब कई समस्याएं समाधान का इंतजार कर रही थीं। इसे भाजपा तथा मुख्यमंत्री आदित्यनाथ को याद रखना चाहिए क्योंकि पार्टी ने विकास के नाम पर विधानसभा चुनाव जीता है। मुख्यमंत्री पद को सबसे बड़ा नुकसान होगा अगर यह एक अस्थायी व्यवस्था जैसी चीज के रूप में देखा जाए।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का सभी सुरक्षा के साथ लखनऊ के कार्यालय से दूर होकर पांच दिनों तक प्रमुख पुजारी का धार्मिक कार्य करना सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का उल्लंघन है जिसमें कहा गया है कि सार्वजनिक धन का उपयोग धार्मिक कार्यों के लिए नहीं किया जा सकता है। लोकतंत्र के विचार को इससे जो नुकसान हुआ है उसके विरोध में एक जनहित याचिका दायर किया जाना चाहिए। वैसे भी बड़ा सवाल यह है कि आदित्यनाथ पहले महंत हंै या मुख्यमंत्री?

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