आगरे का पेठा और चुनाव

ललित सुरजन : यह चुनावों का मौसम है। पिछले एक माह से तमाम टीवी चैनल चुनावी हलचलों का कवरेज करने के लिए आकाश-पाताल एक किए हुए हैं।...

ललित सुरजन
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ललित सुरजन
यह चुनावों का मौसम है। पिछले एक माह से तमाम टीवी चैनल चुनावी हलचलों का कवरेज करने के लिए आकाश-पाताल एक किए हुए हैं। अखबार भी भरपूर सामग्री दे रहे है, लेकिन उसमें वह चाक्षुष आनंद कहां जो चैनलों द्वारा फिल्मी अंदाज में सजाए गए सेटों को देखकर मिलता है। एक चैनल में आगरा का जो दृश्य प्रस्तुत किया गया वह ललचाने वाला था। किसी बड़े से लॉन में टेबलें सजी हुई हैं, पास में भट्ठियों पर गरमागरम भोजन तैयार हो रहा है, चर्चा में आमंत्रित नागरिकों के सामने टेबल पर पूड़ी-कचौड़ी इत्यादि के साथ आगरे के अंगूरी पेड़ों की प्लेटें रखी हुई हैं और बहस चल रही है कि यहां किस पार्टी की विजय होगी। मैं उम्मीद करता हूं कि साल-डेढ़ साल बाद हमारे शहर में भी कोई न कोई चैनल वाला ऐसी व्यवस्था अवश्य करेगा। डर इस बात का है कि बहस बढ़ जाने पर जैसे कुर्सियां फेंकी जाती हैं वैसे ही लोग कहीं एक-दूसरे पर पूड़ी-कचौड़ी न फेंकने लग जाएं।
यह तो हुआ एक दृश्य। आपने भी अपने पसंदीदा चैनल पर कोई न कोई आनंददायक नजारा देखा होगा। उधर पंजाब और गोवा में 4 फरवरी को मतदान प्रारंभ होने के पहले ही मीडिया ने उसके कवरेज के लिए कमर कस ली थी। एक दिन पहले से ही सूचना दी जाने लगी थी कि कल सुबह छह बजे से फलाने-फलाने चुनावी पंडित और पंडिताइनें हमारे चैनल पर उपलब्ध रहेंगे। इन वार्ताकारों के धीरज की दाद देना होगी कि वे कैसे दिन-दिन भर स्टूडियो में बैठे रहते हैं। इस बहाने से ही कुछ लोगों को अस्थायी रोजगार भी मिल जाता है और टीवी पर दिखने का जो सुख है वह तो खैर, अनिर्वचनीय है। यह देखकर कौतुक जागता है कि सुबह आठ बजे जब डाक मतपत्रों की गणना सामने आती है उस समय से पंडित रुझानों का विश्लेषण प्रारंभ कर देते हैं और फिर दिन में दस-दस बार अपने ही पुराने विश्लेषण का खंडन भी कर देते हैं। उन्हें पता है कि दर्शक नादान है। उसके लिए जो इस क्षण सामने है वही सत्य है, बाकी सब मिथ्या।
सच पूछिए तो मुझे अपने देश में चुनावी नतीजों को लेकर कोई भविष्यवाणी करना खासा हास्यास्पद और दुस्साहसिक काम मालूम होता है। यही बात चैनलों पर हो रहे प्रारंभिक सर्वे, पूर्वानुमान, एग्जिट पोल  आदि के बारे में भी कही जा सकती है। लग गया तो तीर, नहीं तो तुक्का वाली कहावत यहां फिट बैठती है। ज्योतिषी हाथ देखकर या कुंडली बांचकर जो भविष्यवाणियां करता है उसमें से दो-चार संयोगवश ठीक निकल जाती हैं, लेकिन अधिकतर गलत साबित होती हैं। जो सही निकल गया उसको याद करके जजमान ज्योतिषी पर और ज्यादा भरोसा करने लगता है; जो सही नहीं निकली वह बात उसके मन से उतर जाती है। कुछ यही सच्चाई अपने यहां होने वाले चुनावी सर्वेक्षणों की है। आप जिससे भी बात करते हैं वह या तो टाल देता है, या अपनी राजनीतिक रुझान के मुताबिक जवाब देता है, या ताड़ लेता है कि पूछने वाला क्या सुनना चाहता है। इस तरह कहें तो सही उत्तर का आंकड़ा तैंतीस प्रतिशत के आसपास होता है।
इसके बावजूद अपने बहस-प्रिय देश में चुनावों की चर्चा करना और परिणामों के बारे में अटकलें लगाना एक दिलचस्प शगल है। खासकर तब जब लोगों के पास समय की कोई कमी न हो। वैसे भी अपने पसंदीदा खेल के लिए समय निकालना कौन सी बड़ी बात है। अब तो कितने सारे दफ्तरों में कम्प्यूटर लग गए हैं। साथ में स्मार्ट फोन भी हैं। इन पर चाहें तो गाने सुनिए, फिल्म देखिए, वर्जित वेबसाइटों का आनंद उठाइए, क्रिकेट मैच देखिए, शेयर बाजार के सौदे कीजिए और नहीं तो इस मौसम में चुनावी लहरों को गिनते रहिए। यही सोचकर मैंने भी तय किया कि आज चुनाव परिणामों को लेकर ही कुछ बात क्यों न की जाए? अखबार का कॉलम है, इसका मतलब ये तो नहीं कि हफ्ते दर हफ्ते गंभीरता का लबादा ओढ़ मैं अपनी अक्ल बघारता रहूं। शायद आप भी थक जाते होंगे और मुझे भी तो कुछ चुहलबाजी करने का हक आपकी ओर से मिलना चाहिए!
तो जैसा कि हर स्वनामधन्य पत्रकार को करना चाहिए मैं भी पिछले एक माह से पांचों चुनावी प्रदेशों में अपने मित्रों, परिचितों से बात कर राजनीतिक रुझानों को समझने के हठयोग में लगा हुआ हूं। 4 फरवरी को जब मतदान लगभग तीन चौथाई पूरा हो चुका था तब मैंने भी गोवा और पंजाब में दोस्तों को फोन किया कि भाई, बताओ क्या हाल है? तुम्हारे यहां कौन जीत रहा है? दोस्त भी तो इसी दुनिया के लोग हैं। वे अपना आकलन बताने से क्यों चूकते? एक ने कहा- आप पार्टी जीत रही है, दूसरे ने कांग्रेस की सरकार बन जाने की संभावना जतलाई, तीसरे ने त्रिशंकु विधानसभा की बात की। गोवा और पंजाब दोनों से लगभग समान जवाब मिले। इसके बाद मैं खुद संशय में पड़ गया कि किसकी बात को सही मानूं। फिर ध्यान गया कि दोनों प्रदेशों में किसी ने भी यह नहीं कहा कि वर्तमान सरकार लौट रही है। तो क्या मुझे यह मान लेना चाहिए कि गोवा में भाजपा और पंजाब में अकाली-भाजपा मिलीजुली सरकार के जाने का समय आ गया है? परिवर्तन हमेशा रोमांचक और अक्सर आकर्षक होता है। इसलिए मित्रों के आकलन पर विश्वास करने का मन तो होता है किन्तु फिर शंका धीरे से सिर उठाती है कि जिन लोगों से बात की है वे अगर भाजपा-विरोधी हैं तो वे क्योंकर भाजपा की जीतने की बात करेंगे! आखिर उनके भी तो कोई आग्रह हैं।
जो भी हो, मैंने जितनी चर्चाएं सुनीं, जितनी बातें कीं, जितने लेख और संपादकीय पढ़े, उनका संज्ञान लेते हुए मेरी अकल जहां तक दौड़ी उसे आपके साथ साझा करना चाहता हूं। पंजाब और गोवा में आप पार्टी एक नई ताकत के रूप में उभरी है। पत्रकारों का एक बड़ा दल जो कांग्रेस से बहिष्कृत और भाजपा से तिरस्कृत है, वह दोनों प्रदेशों में आप पार्टी की सरकार बनवा रहा है। इस दल में अनेक कथित उदारवादी बुद्धिजीवी भी हैं जो 2014 में कांग्रेस को हराने के लिए प्राणपण से जुटे हुए थे। इन पर कितना भरोसा किया जाए, यह मैं तय नहीं कर पा रहा हूं, लेकिन मेरे अनुमान में ‘आप’ ने पंजाब में दो बड़ी गलतियां कीं- एक तो नवजोत सिंह सिद्धू को धोखे में रखा, दूसरे अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाने का गोपन मंतव्य उजागर कर दिया। तीसरे, अगर केजरीवाल नहीं तो मुख्यमंत्री कौन? इसका कोई जवाब ‘आप’ के पास नहीं है ऐसे में कांग्रेस मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है। गोवा में भी जनता साफ-सुथरी सरकार चाहती है इसलिए उसने ‘आप’ का स्वागत तो किया, लेकिन आधे मन से। मैं एक माह पहले गोवा गया था। वहां लोगों ने कहा कि पहले पुर्तगालियों ने राज किया; क्या अब दिल्ली वाले हम पर राज करेंगे? इस नन्हे प्रदेश में भाजपा की मुश्किल अलग प्रकार की है। मनोहर पार्रिकर एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री थे। वे रक्षामंत्री जैसे अहम पद पर रहते हुए भी हर हफ्ते गोवा आते हैं किन्तु मतदाता खड़ाऊं राज से खुश नहीं है। मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसकर के व्यक्तित्व में चमक नहीं है। प्रदेश में संघ के बड़े नेता सुभाष वेलिंगकर द्वारा नई पार्टी बनाकर चुनाव मैदान में उतरने से एक नया सवाल खड़ा हो गया है कि क्या आरएसएस भाजपा नेतृत्व से खुश नहीं है और क्या वह परोक्ष रूप से कांग्रेस को मदद कर रहा है? जैसा उसने 1980 और 1984 में किया था।
उत्तराखंड की स्थिति भी रोचक है। नारायण दत्त तिवारी का ब्यान्नवे साल की आयु में पुत्रमोह में पडक़र कांग्रेस छोडऩा तो समझ आता है, लेकिन भाजपा की क्या मजबूरी थी कि उन्हें पार्टी में लेती? जबकि वे अपनी प्रणय लीलाओं के चलते खासे बदनाम हो चुके हैं। क्या इससे प्रदेश में भाजपा की छवि को कोई नुकसान नहीं पहुंचा? फिर शक्तिमान घोड़े की बेरहम पिटाई और उसकी मौत के लिए चर्चित गणेश जोशी को दुबारा मैदान में उतारना कितना जरूरी था? कांग्रेस के तमाम बागी विधायकों को तो भाजपा ने टिकट दिए ही हैं, इसके अलावा पार्टी में मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की अविश्वसनीय रूप से लंबी सूची बनी हुई है। मुख्यमंत्री हरीश रावत की सरकार को अपदस्थ करने का जो षड़य़ंत्र किया गया, क्या उसे मतदाताओं ने भुला दिया है? इन सवालों से क्या प्रदेश भाजपा में उबर पाने की क्षमता है? आज की बात यहीं तक। उत्तर प्रदेश में और कहां-कहां चैनल वाले पकवान परोस रहे हैं, चलिए उनको देखकर आते हैं।
lalitsurjan@gmail.com


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