हिन्दू मीडिया द्वारा राहुल गांधी असफल करार

एच.एल. दुसाध : सोलहवीं लोकसभा का चुनाव परिणाम सामने आने के बाद ढेरों राजनीतिक विश्लेषकों ने कांग्रेस के भविष्य में टूटने-बिखरने की जो आशंका जाहिर किया था, वह अब सामने आ रहा है।...

एच.एल. दुसाध

सोलहवीं लोकसभा का चुनाव परिणाम सामने आने के बाद ढेरों राजनीतिक विश्लेषकों ने कांग्रेस के भविष्य में टूटने-बिखरने की जो आशंका जाहिर किया था, वह अब सामने आ रहा है। पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस शासित कई प्रदेशों में पार्टी के कद्दावर नेताओं द्वारा मौजूदा नेतृत्व को नकारने और तरह-तरह से बगावत के सुर बुलंद करने जैसी घटनाएं सामने आईं हैं। सारी स्थिति देखकर ऐसा लगता है जैसे देश की सबसे पुरानी पार्टी डूबता जहाज हो इसलिए वे तरह-तरह का आरोप लगाकर पार्टी से किनारा करना चाहते हैं। हालांकि जिस तरह हाल ही में उत्तराखंड में तीन सीटों पर हुए विधानसभा उपचुनाव में पार्टी को 100 प्रतिशत सफलता मिली है, उससे भगदड़ पर विराम लगना चाहिए था, पर फिलहाल वैसा होता दिख नहीं रहा है।
दरअसल राज्यों के कद्दावर नेताओं का बगावती तेवर तो सीधे तौर पर प्रदेश पार्टी नेतृत्व के खिलाफहै किन्तु परोक्ष में उनके निशाने पर पार्टी हाई कमान, खासकर राहुल गांधी हैं। अभी कुछ दिन पहले ही मध्यप्रदेश के गुरफान आजम, जो सोनिया के बहुत करीबी माने जाते रहे हैं, ने सारी शराफत छोड़कर चैनलों पर राहुल के खिलाफ खुलेआम कह दिया-'कांग्रेस का बुरा हाल उसी के वजह से है। कोई उसको पप्पू बोलता है तो कोई मोदी का मुन्ना बोलता है...Ó कांग्रेस के एच. मुस्तफा ने तो राहुल गांधी को जोकर बोल दिया है। गुरफान और मुस्तफा जैसे और कई हैं जो शराफत की हदें तोड़ते हुए उनकी नेतृत्व-क्षमता पर सवाल उठा रहे है। उनकी देखा-देखी राजनीतिक विश्लेषकों में उनको खारिज करने की होड़ सी लग गई है। बहरहाल देश के साधारण से असाधारण माने जानेवाले राजनीतिक विश्लेषक जिस तरह राहुल को नकारने की प्रतिद्वंदिता में उतर आए हैं उससे लगता है कि उनकी हैसियत एक सतही रिपोर्टर से ज्यादा नहीं है। वे सत्ताधारी पार्टी का प्रिय-पात्र बनने के लिए एक ऐसी राजनीतिक शख्सियत को नकारने की बचकानी हरकत कर रहे हैं जिसे न सिर्फ देश की सबसे बड़ी व पुरानी पार्टी को नेतृत्व देना है बल्कि राष्ट्र के पुनर्निर्माण में महती भूमिका अदा करना है। वे जरा भी यह सोचने की जहमत नहीं उठा रहे हैं जिस राहुल गांधी को उन्होंने 15वीं लोकसभा चुनाव बाद लगभग आज के मोदी के समान ही आदर दिया था, आज कौन से ऐसे हालात सामने आ गए कि वे उन्हें खारिज करने में होड़ लगा रहे हैं। ऐसा क्या हो गया कि कल का एक महानायक आज की तारीख में राजनीति का एक एक्स्ट्रा खिलाड़ी बनकर रह गया है। मैं अल्प-स्मृति के शिकार राजनीति के पंडितों का ध्यान लोकसभा चुनाव -2009 की ओर आकर्षित करना चाहता हूं।
2006 से ही मेरे संपादन में हर वर्ष मुख्यत: आर्थिक मुद्दों पर केन्द्रित हजार-डेढ़ हजार पृष्ठों की डाइवर्सिटी ईयर बुक प्रकाशित होती है। 2009-10 में जो 'डाइवर्सिटी ईयर बुकÓ प्रकाशित हुई थी वह पूरे 1400 पृष्ठों की थी जिसमें 15 वीं लोकसभा चुनाव से जुड़ी पत्र-पत्रिकाओं की सामग्री 41-355  पृष्ठ तक संकलित की गई थी। इसके पृष्ठ 218 पृष्ठ पर एक मशहूर अखबार के रिपोर्टर ने-'राहुल फैक्टर ने दिखाया जादूÓ-शीर्षक से लिखा था-'राहुल गांधी ने मां सोनिया गांधी को राजनीतिक निर्णय लेने में काफी सहयोग किया। टिकट वितरण में भी उनकी भूमिका रही और प्रचार की रणनीति भी उनके बताए हुए ही बनी। राहुल गांधी का गांवों में घूम-घूमकर दलित-आदिवासियों के घर खाना खाना और रात बिताना आज दूसरे नेतंाओं और राजनीति के जानकारों को चिंतन करने को मजबूर कर रहा है। बात इसकी भी की जा रही है कि राहुल गांधी की वजह से नौजवानों का झुकाव कांग्रेस की तरफ रहा है। चुनाव के 35 दिनों में राहुल गांधी ने 122 स्थानों पर रैलियां कीं और 87,000  किमी तक दौरा किया। रैलियां करने में उन्होंने सावधानी बरती। पंजाब में राहुल गांधी ने मनमोहन सिंह के नाम को भुनाया तो तमिलनाडु में वह जानबूझकर अंतिम चरण में गए। राहुल गांधी के उठाये सारे कदम सही पड़े हैं इसलिए लग रहा है कि कांग्रेस में आने वाले दिनों में उनकी ही चलेगी। यही वजह है कांग्रेस में हर छोटा-बड़ा नेता राहुल गांधी के पीछे खड़ा होने को बेताब है। महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा है कि इस जीत के लिए राहुल गांधी को पुरस्कार मिलना चाहिए। बताया जाता है कि कांग्रेस में उनके लिए कार्यकारी अध्यक्ष का पद बनाया जा सकता है। जहां तक मंत्री बनाने की बात है, उसके लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पहले भी कई बार राहुल से आग्रह कर चुके हैं।Ó बहरहाल, राहुल के विषय में यह राय तो एक रिपोर्टर की है, जरा  देश ही नहीं, विश्व में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अखबार के सम्पादकीय पृष्ठ पर अक्सर छपने वाले एक मशहूर टिप्पणीकार,जो आजकल मोदी की प्रशंसा में पंचमुख हैं, की राय देखी जाय।
ईयर बुक के पृष्ठ 301 पर 'राहुल गांधी का करिश्माÓ नामक आलेख में वह कहते हैं- 'राहुल के रणनीतिक नेतृत्व में कांग्रेस ने जो चुनावी सफलता अर्जित की वह अप्रत्याशित तो है ही, यह संकेत भी दे रही है कि एक राजनेता के रूप में कांग्रेस के युवा महासचिव पर्याप्त परिपक्व हो चुके हैं। कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के लिए यह जीत किसी करिश्मे से कम नहीं। चुनाव के पहले या बाद में किसी सर्वेक्षण में कांग्रेस या संप्रग के लिए ऐसी सफलता का अनुमान नहीं लगाया गया था। यहां तक कि कांग्रेस के अपने आकलन में भी ऐसी जीत की कल्पना नहीं की गई थी। स्वाभाविक है कि कांग्रेस को इन नतीजों पर सहज विश्वास नहीं हो रहा होगा। कांग्रेस और संप्रग की जीत के शिल्पकार निश्चत रूप से राहुल गांधी रहे। कांग्रेस ने पूरा चुनाव उनके ही निर्देशन में लड़ा।Ó
बहरहाल 15 वीं लोकसभा चुनाव में आज के मोदी की भांति ही सफलता का जो श्रेय राहुल गांधी को मिला वह कोई सामान्य बात न होकर स्वाधीन भारत के राजनीतिक इतिहास की एक निहायत ही महत्वपूर्ण घटना थी। कारण, अगर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को छोड़ दिया जाय,जिसे जयललिता ने साल भर के भीतर गिरा दिया था तो 1984 के बाद कांग्रेस की वह पहली ऐसी केंद्र सरकार थी, जिसे जनता ने फिर से चुना और ज्यादा बहुमत से चुना। तो 1984 के बाद कांग्रेस के नजरिए से सबसे यादगार जीत के महानायक रहे राहुल गांधी, जिनके विषय में कांग्रेस के गुरफान आजम और मुस्तफा जैसे लोगों से लेकर देश के तथाकथित बड़े-बड़े राजनीतिक टिप्पणीकारों ने ऐसी ओछी टिपण्णी की है जिसे पढ़कर आने वालों दिनों में राजनीति-शास्त्र का  कोई भी गंभीर विद्यार्थी शर्मसार होगा। ध्यातव्य है कि 1984  में राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी को जो अविस्मणीय सफलता मिली थी, वह उनकी मां महान इंदिरा गांधी की मृत्युजनित सहानुभूति के कारणों से मिली थी। ऐसे में देखा जाय तो 2009 में मिली चुनावी सफलता कांग्रेस के लिहाज से विशुद्ध ऐतिहासिक थी, जिसके प्रमुख शिल्पी 2014 में निहायत ही असफल करार दिए गए राहुल गांधी रहे।
अब सवाल पैदा होता है जो राहुल गांधी 1984  के बाद सबसे बड़ी चुनावी जीत के हीरो रहे उन्हें 2014 में आँख मूंदकर बेरहमी से खारिज करने के बजाय, क्या कुछ ग्रेस मार्क नहीं मिलना चाहिए था? बहरहाल 21 वीं सदी की अन्यतम श्रेष्ठ राजनीतिक प्रतिभा हिन्दू मीडिया द्वारा करुणा की हद तक क्यों तिरस्कृत हुई तथा राहुल के कदमों में कल हिन्दू मीडिया कैसे झुक सकती है, उसकी  विस्तृत व्याख्या दो सप्ताह पूर्व इसी अखबार  में 'कांग्रेस का पुनरुद्धार कैसे हो!Ó नामक आलेख में की गई है।
(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के अध्यक्ष हैं)

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