हर क्षेत्र पर हावी है भूमंडलीकरण

गिरीश मिश्र : आज अगर हम अर्थशास्त्र की दुनिया को देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि अर्थशास्त्री दो भागों में बंटे हुए हैं। उनमें से कुछ भूमंडलीकरण के प्रबल समर्थक हैं तो अन्य उसके घोर विरोधी। आइए, हम उनको देखें जो भूमंडलीकरण के पक्ष में खड़े हैं। उन्हीं में से एक हैं मार्टिन उल्फ। वे एक प्रख्यात अर्थशास्त्री हैं और लंदन से प्रकाशित ''फाइनेंशियल टाइम्सÓÓ के स्तंभकार भी हैं। वर्ष 2004 में उनकी पुस्तक ''व्हाई ग्लोबलाइजेशन वक्र्सÓÓ प्रकाशित हुई।...

डॉ. गिरीश मिश्र

आज अगर हम अर्थशास्त्र की दुनिया को देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि अर्थशास्त्री दो भागों में बंटे हुए हैं। उनमें से कुछ भूमंडलीकरण के प्रबल समर्थक हैं तो अन्य उसके घोर विरोधी। आइए, हम उनको देखें जो भूमंडलीकरण के पक्ष में खड़े हैं। उन्हीं में से एक हैं मार्टिन उल्फ। वे एक प्रख्यात अर्थशास्त्री हैं और लंदन से प्रकाशित ''फाइनेंशियल टाइम्सÓÓ के स्तंभकार भी हैं। वर्ष 2004 में उनकी पुस्तक ''व्हाई ग्लोबलाइजेशन वक्र्सÓÓ प्रकाशित हुई।
उनका मानना है कि बाजार अर्थव्यवस्था किसी भी उपलब्ध विकल्प से बेहतर है। फ्रेडरिक हायेक के लेखन ने उन्हें आश्वस्त किया कि एक स्थायी और टिकाऊ जनतंत्र के लिए वह आवश्यक शर्त है। बाजार की अर्थव्यवस्था के अंतर्गत लोग अपनी पसंद-नापसंद को बिना झिझक व्यक्त कर सकते हैं। इस प्रकार वह स्वतंत्रता का एक महत्वपूर्ण आयाम है। यहां यह प्रश्न उठता है कि भूमंडलीय बाजार अर्थव्यवस्था को कैसे संचालित और नियमित किया जाए।
यदि हम पीछे मुड़कर देखें तो 1970 के दशक में तब केंस के दृष्टिकोण को बड़ा धक्का लगा जब बेरोजगारी और मुद्रास्फीति साथ-साथ दिखी। इन दोनों से निजात पाने के लिए मौद्रिक स्थिरता की नीतियां ढूंढी जाने लगीं। 1980 के दशक में ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन विलियम्सन ने ''वाशिंगटन आमरायÓÓ की अवधारणा प्रस्तुत की जिसके अंतर्गत सही राजकोषीय एवं मौद्रिक नीतियों पर जोर दिया गया। व्यापार के क्षेत्र में उदारीकरण पर जोर दिया गया। उल्फ मानते हैं कि किसी भी उन्नत अर्थव्यवस्था और समाज को आगे ले जाने का एक ही रास्ता है: उदारवादी जनतंत्र। उनके अनुसार, बाजार के जरिए विश्व को एक सूत्रबद्ध करने से ही सभी निवासियों का भला होगा। लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए बाजार से कोई बेहतर विकल्प नहीं है। बाजार और राज्य का गठबंधन ही उदारवादी जनतंत्र ला सकता है।
उल्फ के अनुसार विश्व में बहुत कम भूमंडलीकरण हुआ है। हमें कहीं अधिक भूमंडलीय बाजारों की जरूरत है जिससे दुनिया के गरीबों का जीवन स्तर ऊंचा उठ सके। उल्फ मानते हैं कि जो लोग भी जनतंत्र के समर्थक हैं उन्हें एकजुट होकर आगे बढऩा चाहिए।
बाजार आधारित भूमंडलीकरण के आलोचकों का मानना है कि वे अपनी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं को विनियमित करने की क्षमता खो चुके हैं। न वे करों में वृद्धि कर सकते हैं और न ही सार्वजनिक वस्तुओं और समाज कल्याण पर खर्च करने की स्थिति में हैं। अत: जनंतत्र कमजोर हो जाता है और ऐसे नौकरशाहों, निगमों और बाजार का दबदबा बढ़ जाता है जो किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होते। देश के अन्दर विषमता बढ़ती है। भूमंडलीकरण गरीब किसानों और खेतिहरों की रोजी-रोटी छीन लेता है। वह वास्तविक मजदूरी को घटाती है। पर्यावरण को काफी क्षति पहुंचती है।
कहना न होगा कि आज भूमंडलीकरण हर क्षेत्र पर हावी है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष से सम्बद्ध एन्न क्रुगेर मानती हैं कि भूमंडलीकरण ऐसी परिघटना है जिससे विश्व में कमोबेश आर्थिक घटनाक्रम से हर जगह प्रभावित होती है। यह सब बाजार के जरिए होता है। मार्टिन उल्फ मानते हैं कि निजी संपत्ति के फलस्वरूप ही राजनीतिक अनेकत्व का उदय होता है। कालक्रम में बाजार अर्थव्यवस्था जनतंत्र की ओर बढ़ती है। आधुनिक बाजार अर्थव्यवस्था आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा देती है। अत: प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि होती है जिससे सबका भला होता है। उल्फ जोर देकर कहते हैं कि बाजार अर्थव्यवस्था ही एकमात्र मानवीय संस्था है जो स्थायी क्रांति को जन्म देती है। पिछले दो सौ सालों के घटनाक्रम इसके गवाह हैं। व्यक्तियों के स्वार्थ को बाजार जोड़ता है और उन्हें आविष्कार, उत्पादन और बिक्री की दिशा में प्रेरित करता है। यदि बाजार अर्थव्यवस्था कारगर होती है तो उसे पांच समस्याओं से निपटना होगा 1. सूचना बेरोकटोक आए और जाए जिससे लोग आश्वस्त हों कि वे सही खरीदारी कर रहे हैं। 2. हर पक्ष यह मानकर चले कि दूसरा पक्ष अपने वायदों को पूरा करेगा। 3. हर क्षेत्र में प्रतिद्वंद्विता को बढ़ावा मिले। 4. संपत्ति संबंधी अधिकारों की रक्षा हो। 5. किसी तीसरे पक्ष पर इसका बुरा असर यथासंभव न पड़े।
वित्तीय व्यवस्थाएं चार अनिवार्य कार्य करती हंै: 1. वे लोगों की बचतों को बटोरती हैं, 2. वे पूंजी का आबंटन इस प्रकार करती है कि उत्पादक निवेश को बढ़ावा मिले और लोग अपनी वर्तमान आय से अधिक खर्च कर सकें; 3. वे मैनेजरों पर निगाह रखें कि वायदे के अनुसार फंडों को खर्च किया जा रहा है, और 4. वे जोखिमों को इस प्रकार वितरित करें कि जो उनका भार उठाने में अधिक सक्षम हैं उनको प्रेरित करे।
बाजार-आधारित वित्तीय व्यवस्थाओं को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वित्तीय बाजारों को संपूर्ण सूचनाएं प्राप्त न होने के कारण उनका काम ठीक से नहीं चल पाता। विशेषकर बैंक काफी नाजुक स्थिति में होते हैं क्योंकि उनकी देनदारियां अधिकतर अल्पावधिक होती हैं जबकि उनकी परिसंपत्तियां दीर्घकालिक होती हैं और ब्याज की दर, क्रेडिट और समष्टिगत जोखिमें उन्हें प्रभावित करती हैं। वित्तीय बाजार में कार्यरत् अधिकतर लोगों को पर्याप्त सूचना नहीं रहती जिससे वे मनोगत सोच के अनुसार काम करते हैं।
उल्फ का मानना है कि आधुनिक अर्थव्यवस्था के अंतर्गत उत्पादन का परस्पर समन्वय काफी कठिन होता है। यह अनुमान लगाना काफी कठिन है कि हजारों-लाखों लोगों की चाहत क्या है। नियोजनकर्ताओं का मानना है कि कीमतों का लागत से कोई विशेष रिश्ता न होने के कारण यह कहना मुश्किल होता है कि किन वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन बढऩा या घटना चाहिए। उल्फ मानते हैं कि तकनीकी दृष्टि से ठीक-ठाक बनी योजना भी संपदा को विनाश के रास्ते पर ले जा सकती है। इस प्रकार व्यापाक राष्ट्रीय योजना की आवधारणा असंभव है। ऐसी स्थिति में राज्य केवल तीन काम कर सकता है। पहला, वह ऐसी सुविधाएं प्रदान करे जो बाजार स्वयं नहीं जुटा सकता। दूसरा, बाजार की विफलता की स्थिति में वह उसकी मदद करे। और, तीसरा, जो लोग बाजार के कारण दयनीय स्थिति में आ जाते हैं उनकी सहायता करें।
उल्फ का दावा है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आर्थिक गतिविधियों के प्रत्येक क्षेत्र के बारे में काफी जानकारी और अनुभव है। दुनिया भर के सभी देशों, विशेषकर विकासशील देशों के हित में है कि वे विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के जरिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने यहां लाएं और उनके ज्ञान का फायदा उठाएं। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के माध्यम से जो लाभ मिलेगा वह विदेशी पंजी उधार लेकर नहीं प्राप्त किया जा सकता। किसी देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने वाले वहां से आसानी से नहीं भाग सकते भले ही वहां कठिनाइयां आएं। यदि निवेशकों को लाभ प्राप्त होता है तो वे देश विशेष में बने रहेंगे। और वहां की अर्थव्यवस्था में योगदान करेंगे। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण करने के साथ ही कुशल प्रबंधन भी लाता है। विकासशील देशों में मानवीय पूंजी का अभाव होता है, इसलिए विदेशी पूंजी वहां जाने से हिचकिचाती है। यदि विकासशील देशों को अन्य उत्पादकों और कौशलसंपन्न लोगों का साथ मिले तो वे निश्चित रूप से आगे बढ़ सकते हैं।
जहां तक शिशु उद्योग तर्क (इंफेट इंडस्ट्री आरग्रमेंट) का प्रश्न है, उल्फ का मानना है कि वह कारगार नहीं साबित हुआ है। वह अपने उपभोक्ताओं पर भारी बोझ लादता है। साथ ही वह अन्य उद्योगों को घरेलू बाजार तक ही सीमित करता है क्योंकि वे देश के बाहर के बाजारों में नहीं टिक सकते।
दीर्घकाल में वस्तुओं, सेवाओं और उत्पादन के संसाधनों के बाजार की प्रवृत्ति भूमंडलीकरण की दिशा में होती है। उसको पलटा नहीं जा सकता। दीर्घकाल में हम अपने को भूमंडलीय समुदाय से जोड़ते हैं। हम दुनिया में कहीं भी पैदा हुए विचारों और संस्कृति को अपनाते हैं। प्रौद्योगिकी का भूमंंडलीय स्तर पर आवागमन होता है। औद्योगिक क्रांति के पहले भी अर्थव्यवस्था में भूमंडलीकरण की प्रवृत्ति देखी गई। 1260 ई. से 1350 ई. के बीच यह प्रवृत्ति स्पष्टतया देखने में आई।
तत्काल नवउदारवादी भूमंडलीकरण का युग चल रहा है। इसको समझने के लिए सात बातों की ओर ध्यान देना होगा। पहला, धनी देेशों और गरीब मुल्कों की औसत आय के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। दूसरा, धनी और गरीब देशों के बीच जीवनयापन के बीच अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है। तीसरा, व्यक्तियों के बीच असमानता बढ़ती जा रही है। चौथा, चरम गरीबी में डूबे लोगों की संख्या बढ़ रही है। पांचवा, विश्व की कुल जनसंख्या में भयंकर गरीबी में पड़े लोगों का अनुपात बढ़ता जा रहा है। छठवां, दुनिया के गरीबों की हालत आय की निगाह से ही नहीं, बल्कि अन्य दृष्टियों से भी बिगड़ती जा रही है। सातवां, प्रत्येक देश में, विशेषकर जहां अंतरराष्ट्रीय आर्थिक जुड़ाव का जोर रहा है वहां असमानता बढ़ी है। उपर्युक्त बिन्दुओं पर टिप्पणी करते हुए उल्फ का दावा है कि भूमंडलीकरण असमानता को नहीं बढ़ाया है बल्कि उसने उसे घटाया है। उनका कहना है कि यह मूर्खतापूर्ण अवधारणा है कि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक एकीकरण धनी को अपेक्षाकृत धनी और गरीब को कहीं अधिक गरीब बनाता है।
भूमंडलीकरण पर टॉमस लार्सन ने वर्ष 2001 में ''द रेस टू टॉप: द रियल स्टोरी ऑफ ग्लोबलाइजेशनÓÓ प्रकाशित की जिसमें रेखांकित किया गया है कि भूमंडलीकरण के बड़ी तेजी से बढऩे के बावजूद वह पूरी तरह अपनी मंजिल पर नहीं पहुंच सका है। दुनिया के विभिन्न देशों के बीच की दूरियां घटती जा रही हैं जिससे यदि एक भाग में कुछ होता है तो उसका असर कमोबेश सर्वत्र पड़ता है। परिवहन और संचार के क्षेत्र की प्रगति ने दूरियों को घटाया है। टेलीफोन, हवाई जहाज, टेलीविजन और कम्प्यूटर ने विश्व के विभिन्न हिस्सों को एक साथ जोड़ दिया है। इंटरनेट, मोबाईल फोन और ई-मेल दूरियों को निरंतर कम कर रहा है।
वर्ष 1990 के बाद भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने जोर पकड़ा। कई राष्ट्र और उनके नागरिक इस आशा में बैठे थे कि भूमंडलीकररण उन्हें सुनहरे भविष्य की ओर ले जाएगा। किसी जमाने में दुनिया के एक भाग का दूसरे भाग से संपर्क बनाने में महीनों लग जाते थे। आज आप नेट के जरिए अखबार भी पढ़ सकते हैं भले ही तब तक बाजार में अखबार न आया हो।
लार्सन के अनुसार, ज्यों-ज्यों भूमंडलीकरण आगे बढ़ता है त्यों-त्यों विभिन्न देशों की संस्कृतियों, कंपनियों या व्यक्तियों को चाहे-अनचाहे अमेरिकी रहन-सहन और मानकों को अपनाना पड़ता है, अभी अमेरिकीकरण का मानक मैकडोनाल्ड बन गया है। कई लोगों का मानना है कि मैकडोनाल्ड, बर्गर किंग, केंटकी फ्रायड चिकन और टाकोबेल, अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रतीक हैं और वे विश्व की संस्कृतियों को समरूप बनाने की कोशिश करते हैं। इस प्रकार मैकडोनाल्डीकरण सांस्कृतिक विभिन्नता को समाप्त करता है। युगों से चली आ रही उनकी विशिष्ट पहचान समाप्त हो जाती है।


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