मोदी सरकार के लिए आरएसएस का एजेंडा

सीताराम येचुरी : आरएसएस के विभिन्न बाजुओं द्वारा फैलाए जा रहे सांप्रदायिक जहर के चलते, धार्मिक अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों पर हमलों में भारी तेजी आई है। सांप्रदायिक असहिष्णुता के इस तरह भड़काए जाने के चलते ही ऐसा वातावरण बन रहा है, जिसमें देश में अल्पसंख्यकों पर भयावह शारीरिक हमले हो रहे हैं। यह सीधे-सीधे उन मौलिक अधिकारों पर हमला है जो भारतीय धर्मनिरपेक्ष, जनतांत्रिक गणराज्य इस देश सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों को देता है।...

सीताराम येचुरी

आरएसएस के विभिन्न बाजुओं द्वारा फैलाए जा रहे सांप्रदायिक जहर के चलते, धार्मिक अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों पर हमलों में भारी तेजी आई है। सांप्रदायिक असहिष्णुता के इस तरह भड़काए जाने के चलते ही ऐसा वातावरण बन रहा है, जिसमें देश में अल्पसंख्यकों पर भयावह शारीरिक हमले हो रहे हैं। यह सीधे-सीधे उन मौलिक अधिकारों पर हमला है जो भारतीय धर्मनिरपेक्ष, जनतांत्रिक गणराज्य इस देश सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों को देता है।
जरा याद करें कि किस तरह भारत के पहले उप-प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री, सरदार वल्लभभाई पटेल ने, महात्मा गांधी की हत्या के कुछ ही समय बाद आरएसएस पर पाबंदी का ऐलान करने के लिए जो विज्ञप्ति तैयार की थी, उसमें कहा गया था कि ''बहरहाल, संघ की आपत्तिजनक तथा नुकसानदेह गतिविधियां लगातार जारी रही हैं और संघ की गतिविधियों से प्रायोजित तथा प्रेरित हिंसा के पंथ ने बहुतों को अपना शिकार बनाया है। उसने ताजातरीन तथा सबसे मूल्यवान बलि खुद गांधीजी की ही ली है।ÓÓ
बेशक, तमाम परिस्थितिगत साक्ष्यों के बावजूद और वास्तव में आगे चलकर खुद नाथूराम गोडसे के भाई द्वारा मीडिया को दिए गए साक्षात्कारों के बावजूद, आरएसएस इसके दावे करना जारी रखे हुए है कि महात्मा गांधी की हत्या में उसका कोई हाथ नहीं था। फिर भी, वह सरदार पटेल द्वारा 4 फरवरी 1948 को जारी विज्ञप्ति की इस बात से कैसे इंकार कर सकता है कि आरएसएस तथा उसके कार्यकर्ता हिंसा के पंथ को आगे बढ़ा रहे थे, जिसने महात्मा गांधी समेत बहुत से लोगों की जानें ली थीं। आज भी देश का माहौल उसी तरफ खिसक रहा है और अगर हमारे गणराज्य के धर्मनिरपेक्ष, जनतांत्रिक आधारों की परवाह करने वाले सभी भारतीय देशभक्तों की एकता इन ताकतों का रास्ता नहीं करती है, ये ताकतें हमारे देश को उसी गड्ïढे में धकेल देंगी।
ऐसी ताजा घटना हाल ही में पश्चिम बंगाल के नादिया जिले के रानाघाट में हुयी, जहां कॉन्वेंट ऑफ जीसस सैंट मैरीज की एक सत्तर वर्षीय नन के साथ हुए घृणित बलात्कार हुआ है। इन पंक्तियों के प्रेस जाने तक एक और युवा पीडि़त भी अपनी जिंदगी के लिए लड़ रही है। इस घटना के खिलाफ क्षेत्र में व्यापक गुस्से और विरोध, जिन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री को स्कूल जाने से रोक दिया, के बावजूद अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गयी है और अभी तक संदिग्धों की कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ते हमलों की पृष्ठïभूमि में हुई इस घटना ने दिखा दिया है कि हमारे देश की एकता और जनता के सामाजिक सद्भाव के लिए खतरा किस हद तक बढ़ रहा है।   
इस तरह के पतित माहौल के कारणों को हम अपने आसपास भली-भांति देख सकते हैं। हाल में 14-16 मार्च 2015 को नागपुर में हुई आरएसएस के निर्णय लेनेवाले सर्वोच्च निकाय-अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा- की बैठक में बहुमुखी तरीके से सांप्रदायिक एजेंडे को आगे ले जाने का निर्णय लिया गया। इस तरह के अभियान के जरिए इस बैठक ने आरएसएस का विस्तार करने और उसकी पंहुच देश के 6.5 लाख गांवों तक करने का आह्वïान किया, जो आज 54 हजार गांवों तक ही है। भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह और विश्व हिंदू परिषद प्रमुख प्रवीण तोगडिय़ा समेत भाजपा के सर्वोच्च नेताओं ने इस बैठक में भाग लिया।
इस बैठक में आरएसएस ने एक बार फिर स्पष्टï रूप से यह घोषणा की है कि भारत में कोई धार्मिक अल्पसंख्यक नहीं हैं। उसके अनुसार सभी भारतीय ''सांस्कृतिक रूप से, राष्टï्रीय रूप से और डीएनए के लिहाज से हिंदू हैं।ÓÓ राष्टï्रीय दैनिकों ने रिपोर्ट किया है कि ''घर वापसीÓÓ ही वह क्षेत्र है जिस पर आज आरएसएस का सबसे ज्यादा जोर है। इन रिपोर्टों के अनुसार आरएसएस ने ''उन क्षेत्रों के रूप में जिन पर उसका सबसे ज्यादा जोर रहेगा जिन क्षेत्रों को सूचीबद्घ किया है, उनमें 'धर्म जागरणÓ शामिल है जो 'घर वापसीÓ का ही दूसरा नाम है।ÓÓ सूत्रों के हवाले से मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार आरएसएस प्रमुख ने कहा है कि ब्रिटिशों ने 14वीं सदी से ही भारत में धर्मांतरण शुरू कर दिया था और अब ''लोग हिंदूवाद में वापस आना चाहते हैं। स्वयंसेवकों को इसमें उनकी मदद करनी चाहिए।ÓÓ (इंडियन एक्सप्रेस, 17 मार्च 2015)
एक और राष्टï्रीय दैनिक (द हिंदू , 16 मार्च 2015) ने रिपोर्ट छापी है कि ''अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा अभी भी एजेंडे पर है।ÓÓ पुनर्निवाचित आएएसएस के महासचिव ने मीडिया को बताया कि ''हमने (यह) मुद्दा छोड़ा नहीं है। यह अभी भी हमारे एजेंडे पर है।ÓÓ आरएसएस प्रमुख ने यह कहा बताते हैं कि पिछले नौ महीने का मोदी का कार्यकाल ''कुल मिलाकर संतोषप्रदÓÓ रहा है।
ऐसा लगता है कि मोदी सरकार को आरएसएस की ओर से ऐसा ही और अनुमोदन चाहिए। मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार अब वह सभी राज्यों में एक कड़ा पशुवध-विरोधी कानून बनवाने के लिए दबाव डालेगी और जिन राज्यों में उसकी सरकार है वहां कानूनी रास्ते को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाएगी। हरियाणा तथा राजस्थान के बाद अब वह बिहार के आगामी चुनावों में इसे पार्टी के चुनाव घोषणापत्र में शामिल करना चाहती है। महाराष्टï्र की भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार पहले ही उन लोगों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने की सिफारिश कर चुकी है जो गोमांस खाते हुए पाए जाएंगे। इसी तरह इस सरकार ने ''मराठोंÓÓ के लिए आरक्षण का पक्ष लेते हुए मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण को खत्म कर दिया है।
भाजपा ने जम्मू-कश्मीर की गठबंधन सरकार में शामिल होने के लिए जिस तरह अवसरवाद का प्रदर्शन किया है, उसे भी आरएसएस की बैठक ने उचित ठहराया है। बहरहाल, वह यह कहना जारी रखे हुए है कि वह अभी भी धारा 370 के खिलाफ है और उस वक्त का इंतजार है जब उसे निरस्त करना सुनिश्चित किया जा सकेगा। आरएसएस के संयुक्त महासचिव ने इस बैठक के बाद यह घोषणा की कि ''धारा 370 पर आरएसएस का रुख बदला नहीं है। हम इस पर कभी समझौता नहीं करेंगे। हम चाहते हैं कि स्थिति में सुधार हो। अगर स्थिति नहीं सुधरती है तो हम फैसला लेंगे।ÓÓ इस बयान में जो संभावित धमकी है, वह गलती से नहीं आई है।
विवादित भूमि अधिग्रहण विधेयक के मामले में आरएसएस ने मोदी सरकार को पूर्ण समर्थन दिया है, जिसे हाल ही में लोकसभा ने पारित कर दिया है। आरएसएस से संबद्घ भारतीय मजदूर संघ (बी एम एस) तथा भारतीय किसान संघ (बी के एस) के ''औपचारिकÓÓ विरोध के बावजूद आरएसएस के संयुक्त महासचिव ने घोषणा की कि ''मुझे नहीं लगता कि यह विधेयक किसान-विरोधी है क्योंकि सरकार जो संशोधन लेकर आयी है वे किसानों के पक्ष में हैं।ÓÓ उसने टकराव टालने की बात कहते हुए अपने मोर्चा संगठनों को सलाह दी कि वे ''संवाद के जरिए सद्भावपूर्ण ढंग सेÓÓ मुद्दों को सुलझाएं। याद कीजिए कि भाजपा के प्रवक्ता भी इलेक्ट्रानिक मीडिया पर यह दावा करते हुए भूमि अधिग्रहण विधेयक में किए गए संशोधनों को उचित ठहरा रहे हैं कि 70 फीसद किसान खेती का काम छोडऩा चाहते हैं, इसलिए मोदी सरकार के संशोधनों का ''स्वागतÓÓ है!
इस तरह आरएसएस ने मोदी सरकार के लिए एजेंडा तय कर दिया है जो उसके ''राजनीतिक बाजूÓÓ की तरह काम करने के  अलावा और कुछ नहीं है। एक तरफ तो वह हमारे आधुनिक भारतीय गणतंत्र की धर्मनिरपेक्ष जनतांत्रिक नींवों को आरएसएस की किस्मवाले कट्टïर असहनशील ''हिंदू राष्टï्रÓÓ में तब्दील करने के अपने प्रयासों में सफल होने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तेज कर रही है और दूसरी ओर उन आर्थिक नीतियों को आगे बढ़ा रही है जो विदेशी तथा घरेलू दोनों ही तरह के कार्पोरेट घरानों को हमारी जनता के व्यापक बहुमत की कीमत पर और हमारे संसाधनों की अंधाधुंध लूट के जरिए अपने मुनाफे बढ़ाने की इजाजत देती हैं।
भारत तथा उसकी जनता को इस विनाशकारी दिशा को पहले रोकना होगा और फिर एक बेहतर भारत का निर्माण करने के लिए लोकप्रिय जनसंघर्षों को आगे बढ़ाने के लिए इसे मात देनी होगी।

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