प्रभावी वामपंथी व जनवादी मोर्चे की दरकार

सीताराम येचुरी : हमारे संगठन की क्षमताएं इन चुनौतियों का मुकाबला करने तथा इनसे उबरने और सांप्रदायिकता तथा नव-उदारवाद के संयुक्त हमले के खिलाफ संघर्षों में जनता को सफलतापूर्वक एकजुट करने के स्तर तक बढऩी चाहिए।...

सीताराम येचुरी

हमारे संगठन की क्षमताएं इन चुनौतियों का मुकाबला करने तथा इनसे उबरने और सांप्रदायिकता तथा नव-उदारवाद के संयुक्त हमले के खिलाफ संघर्षों में जनता को सफलतापूर्वक एकजुट करने के स्तर तक बढऩी चाहिए।
पार्टी संगठन को मजबूत करना जरूरी
पार्टी संगठन को मजबूत करना भी बेहद जरूरी हो गया है। आतंक तथा धौंस पट्टïी की राजनीति के जरिए हमारे मजबूत गढ़ पश्चिम बंगाल में खासतौर से सीपीआई (एम) के खिलाफ दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी तत्वों की गिरोहबंदी द्वारा किए जा रहे निरंतर हमलों के मद्देनजर यह और जरूरी हो गया है। पूरी सीपीआई (एम) के रूप में देश भर की हमारी पार्टी इकाइयों को हमारे मजबूत वामपंथी गढ़ों तथा भारतीय क्रांतिकारी शक्तियों की अग्रिम चौकियों की रक्षा पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इस प्लेनम में अपने पार्टी संगठन को मजबूत करने के लिए हम उस पृष्ठïभूमि में मिल रहे हैं, जिसे हमारी पार्टी कांग्रेस ने नोट किया था कि गतिरोध के रूप में हमारी कमजोरी निरंतर बनी हुई है और कि अगर हमारी पार्टी तथा संगठनों की सदस्यता में कमी नहीं भी आ रही है तो भी उनके गठन में असमानता है और हमारी पार्टी की चुनावी ताकत में भारी कमी आयी है।
संगठन संबंधी पार्टी का पिछला प्लेनम सल्किया प्लेनम था जो,पार्टी की दसवीं कांग्रेस के फौरन बाद, दिसंबर 1978 में हुआ था। यह वह दौर था जब पार्टी उठान पर थी और देश में सबसे मजबूत वामपंथी कम्युनिस्ट ताकत के रूप में उभर कर सामने आयी थी। यह वह दौर था जब पूर्ववर्ती सोवियत संघ के नेतृत्व में समाजवादी शिविर बराबरी की ताकत के साथ विश्व साम्राज्यवाद को चुनौती दे रहा था।  उसकी तुलना में आज हम कोलकाता में हो रहे इस सांगठनिक प्लेनम में ऐसे वक्त में मिल रहे हैं जब साम्राज्यवाद के लिए प्रतिसंतुलनकारी समाजवादी चुनौती विश्विक स्तर पर विखंडित हो चुकी है। हम ऐसे वक्त में मिल रहे हैं जब भारतीय शासक वर्ग का सांप्रदायिकता तथा नव-उदारवादी संयुक्त हमला बढ़ रहा है।
वामपंथी-जनवादी एकता
अपनी स्वतंत्र ताकत बढ़ाने के लिए किए जा रहे प्रयासों के साथ ही साथ पार्टी को देश में वामपंथी पार्टियों तथा शक्तियों की एकता को बढ़ाने तथा मजबूत करने के प्रयास करने की भी जरूरत है। यही वामपंथी एकता वामपंथी तथा जनवादी शक्तियों की एकता की धुरी बनेगी।
मजदूर वर्ग के नेतृत्व में जनता के जनवादी मोर्चे के गठन के लिए सफलतापूर्वक वामपंथी तथा जनवादी मोर्चा बनाना पूर्व शर्त होगी। यह वर्गीय मोर्चा वह ताकत होगी जो देश में जनता की जनवादी क्रांति लाएगी।
इन उद्देश्यों को सफलतापूर्वक हासिल करने के लिए हमें एक मजबूत तथा प्रभावी वामपंथी तथा जनवादी मोर्चे के गठन से शुरूआत करनी होगी। सीपीआई (एम) ने वर्गीय शक्तियों के संतुलन में बदलाव लाने और ऐसी स्थिति-जिसमें लोग दो पूंजीवादी-भूस्वामी पार्टियों के बीच ही चुनाव करने को मजबूर होते हैं तथा मौजूदा व्यवस्था के ढ़ांचे के भीतर कैद होकर रह जाते हैं-को खत्म करने के लिए पहली बार अपनी दसवीं कांग्रेस में एल डी एफ का विचार पेश किया था।
वामपंथी तथा जनवादी मोर्चे को सिर्फ एक चुनावी मोर्चा नहीं समझा जाना चाहिए बल्कि उसे प्रतिक्रियावादी शासक वर्गों को अलग-थलग करने के जरिए एक आर्थिक तथा राजनीतिक बदलाव लाने की खातिर शक्तियों के लड़ाका गठबंधन के रूप में देखा जाना चाहिए।
इस तरह की वामपंथी तथा जनवादी एकता का गठन, सांगठनिक ताकत में और मेहनतकश अवाम के तमाम तबकों के संघर्षों में अभूतपूर्व बढ़ोतरी की मांग करते हैं। जिसका अर्थ यह है कि पार्टी की ताकत में भारी इजाफा करने की दरकार है।
हमारी स्वतंत्र ताकत में ऐसी बढ़ोतरी के आधार पर 21वीं पार्टी कांग्रेस की राजनीतिक-कार्यनीतिक लाइन ने एल डी एफ के गठन की प्रक्रिया में संयुक्त मोर्चे की कार्यनीति के महत्व को रेखांकित किया है। संयुक्त मोर्चे की क्रांतिकारी कार्यनीति हमेशा ही एकता तथा संघर्ष के सिद्घांतों की एकजुटता की जरूरत पर जोर देती रही है अर्थात इस पर जोर देती रही है कि शासक वर्ग की पार्टियों के भीतर के तबकों के टकराव का इस्तेमाल करते हुए हमारे फौरी उद्देश्यों को हासिल करने और साथ ही साथ इन्हीं पार्टियों द्वारा लागू की जा रही जनविरोधी तथा मजदूरवर्गविरोधी नीतियों के खिलाफ संघर्षों को मजबूत करने के लिए उनमें से कुछ को एकजुट किया जाए। संयुक्त मोर्चा की कार्यनीति का अंतर्निहित लक्ष्य हमेशा ही उस जनता को अपने पक्ष में खींचने, जो अभी तक पूंजीवादी पार्टियों के प्रभाव में हो सकती है, के जरिए वर्ग संघर्षों को आगे बढ़ाना रहा है। पूंजीवादी पार्टियों के भीतर के टकरावों का इस्तेमाल करते हुए स्वतंत्र वर्गीय तथा जन संघर्षों को तेज करना संयुक्त मोर्चा की कार्यनीति को सफलतापूर्वक लागू करने के दो पहलू हैं।
इसके साथ ही साथ 21वीं कांग्रेस की राजनीतिक-कार्यनीतिक लाइन ने इस तथ्य को भी रेखांकित किया है कि राजनीतिक स्थिति में तेजी से हो रहे बदलावों के मद्देनजर सीपीआई (एम) को नमनीय कार्यनीति अपनानी चाहिए। आगे इसमें यह भी कहा गया है कि चुनावी कार्यनीति वामपंथी-जनवादी मोर्चे के निर्माण की प्रमुखता के अनुरूप होनी चाहिए। पार्टी संगठन को इन कामों को पूरा करने में सक्षम होना चाहिए।
ठोस परिस्थितियों में ठोस विश्लेषण
इसके अलावा खासतौर से हमारी चौदहवीं कांग्रेस से ही सीपीआई (एम) निरंतर इस लेनिनवादी सिद्घांत पर जोर देती रही है कि ठोस परिस्थितियों में ठोस विश्लेषण द्वंद्वात्मकता का जीवंत सार है। आज की भारतीय स्थितियों में हमें यह देखना होगा कि चौदहवीं पार्टी कांग्रेस के बाद के इन दो दशकों में ऐसे कौन से ठोस बदलाव आए हैं। इसीलिए केंद्रीय कमेटी ने नव-उदारवादी नीतियों के प्रभाव और मजदूर वर्ग में, भारतीय कृषि में तथा मध्य वर्गों में आए बदलावों का अध्ययन करने के लिए तीन स्टडी ग्रुप गठित किए थे। इन अध्ययनों के निष्कर्षों के आधार पर ही 21वीं कांग्रेस में और केंद्रीय कमेटी में हमारे नारों, हमारे काम की शैली तथा आवश्यक सांगठनिक कदमों पर विचार-विमर्श हुआ था और कुछ निर्णय लिए गए थे। इस आधार पर उन नए सांगठनिक कदमों पर इस प्लेनम में विचार किया जाएगा, जिन कदमों को उठाने की दरकार है।
सांप्रदायिक चुनौती को मात दो
मौजूदा सांप्रदायिक हमले का और राजनीतिक, विचारधारात्मक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक क्षेत्रों संबंधी उसके तमाम आयामों का मुकाबला करना होगा। इन चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए हमारी सांगठनिक क्षमताओं में जबर्दस्त बढ़ोतरी की दरकार है। हमें लोकप्रिय शैली में विचारधारात्मक तथा राजनीतिक सामग्री तैयार करनी होगी और उसे बड़े पैमाने पर वितरित करना होगा।
सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ इस विचारधारात्मक संघर्ष में जोश भरने के लिए हमें बड़े पैमाने पर बुद्घिजीवियों, इतिहासकारों, शिक्षाविदों तथा सांस्कृतिक हस्तियों को लामबंद करना होगा। इन कामों तथा चुनौतियों को पूरा करने के लिए हमें विचारधारात्मक तथा राजनीतिक दोनों ही रूपों से अपने संगठन को मजबूत करना होगा।
सीपीआई (एम) की वैकल्पिक दृष्टिï
सीपीआई (एम) के विजन में यह शामिल है कि एक बेहतर भारत का निर्माण करने के लिए और लोगों को बेहतर जीवन स्थितियां मुहैया कराने के लिए वैकल्पिक नीतियों के जरिए हमारे देश की भौतिक संपदा तथा मानवीय पूंजी दोनों का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
अभी भारतीय शासक वर्ग अपने आपको और समृद्घ बनाने के लिए, अमीर-गरीब के बीच की खाई को और चौड़ा करने के लिए और अंतर्राष्टï्रीय वित्तीय पंूजी को ज्यादा से ज्यादा मुनाफे कमाने के ज्यादा से ज्यादा अवसर मुहैया कराने के लिए इन संसाधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस तरह के विजन को मूर्त रूप देने के लिए हमारी सांगठनिक क्षमताओं में बेहद मजबूती लाना बहुत जरूरी है।
यह महती कार्य सिर्फ सीपीआई (एम) ही कर सकती है जिसे अपने पार्टी संगठन को दुरूस्त तथा मजबूत करते हुए एक नए जोश के साथ उभरकर आगे आना होगा। आज के ठोस हालात में, जब भाजपा के नेतृत्ववाली मौजूदा केंद्र सरकार के तहत साम्राज्यवाद तथा अंतर्राष्टï्रीय वित्तीय पूंजी के हितों को साधने के लिए भारतीय शासक वर्गों की नीतिगत दिशा के रूप में नव-उदारवादी सुधारों तथा हमारे समाज का कट्टïर सांप्रदायीकरण दोनों पहलू मिल गए हों, यह बेहद जरूरी हो गया है।
इस संदर्भ में अपने आपको सीपीआई (एम) की उस विरासत की एक बार फिर यह याद दिलाना जरूरी है जो स्वतंत्रता के लिए भारतीय जनता के संघर्ष के दौरान और उसके बाद के आंदोलनों में निर्मित हुयी। भारत में एक सबसे मजबूत कम्युनिस्ट ताकत के रूप में उभरने में तमाम विचारधारात्मक तथा सांगठनिक विचलनों का मुकाबला करते हुए हमारे कामरेडों की शानदार कुर्बानियां और हमारे बहादुर शहीदों की लंबी सूची हमारी इसी विरासत का हिस्सा हैं। शासक वर्गों के शोषण के खिलाफ विद्रोह करते हुए तमाम शोषित वर्गों से संबंधित आम जनता के उठ खड़े हुए बिना कोई सामाजिक रूपांतरण संभव नहीं और वास्तव में तो उसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती। अंतिम विश्लेषण में यह जनता ही है जो इतिहास बनाती है। क्रांतिकारी इतिहास भी इसका अपवाद नहीं। एक क्रांतिकारी पार्टी के रूप में सीपीआई (एम) जनता के इस उभार का अगुवा दस्ता है। यह हमारी ऐतिहासिक जिम्मेदारी है। आइए, कोलकाता प्लेनम के मौके पर इम इस जिम्मेदारी को पूरा करने के अपने संकल्प को दुगना करें।
जनलाइनवाली पार्टी के रूप में सीपीआई (एम) को मजबूत करो!


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